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मगध साम्राज्य का उदय:-मगध साम्राज्य का उदय छठी शताब्दी ईसा पूर्व कीसबसे महत्वपूर्ण घटना थी।मगध साम्राज्य का सबसे पहला शासक “वृहद्रथ”था इसका उल्लेख महाभारत एवं पुराणों से प्राप्त होता है इस ने प्रारंभ में अपनी राजधानी वसुमति या गिरीवव्रज को बनाया था। इस के पुत्र का नाम जरासंघ था, जो अत्यंत प्रतापी शासक हुआ।इसमें अपने साम्राज्य का विस्तार किया श्री कृष्ण की निर्देशानुसार भीम ने इसे मल युद्ध में परास्त किया था इसका उल्लेख महाभारत में भी मौजूद है।मगध साम्राज्य का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्व वेद में मिलता है अभियान चिंतामणि के अनुसार मगध को “कीकट “कहा गया है। 16 महाजनपदों में से मगर राजनीतिक सर्वोच्चता प्राप्त कर साम्राज्यवाद केअस्तित्व को अंगीकृत कर चुका था। बाद में इसी की नींव पर चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने साम्राज्य की स्थापना की गौतम बुध के समय में मगध एक शक्तिशाली राजतंत्र के रूप में उभरा था यह दक्षिणी बिहार में स्थित था बाद में या भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली महाजनपद बन गया दूसरे सभी महाजनपदों को अपने साम्राज्य में मिलाकर मगध भारत का शक्तिशाली राज्य बन कर उभरा था। राज्य की सीमा उत्तर में गंगा से दक्षिण विंध्य पर्वत तक पूर्व के चंपा से पश्चिम में सोन नदी तक फैला हुआ था इस पर आक्रमणकारी गतिविधियां संभावित नहीं थी उसका मूल कारण इस की भौगोलिक स्थिति थी यहां के शासकों को बाहरी आक्रमणकारियों से विशेष परेशानी नहीं थी मगध की प्राचीन राजधानी राज गिरी थी यह पांच पहाड़ियों से घिरा हुआ था।बाद के समय में इसकी राजधानी पाटलिपुत्र को बनाया गया मगध राज्य के पास दूसरे महाजनपदों की तुलना में गज सेना शिवसेना और अत्याधुनिक हथियार मौजूद थे ,जिसके दम पर मगध महाजनपद दूसरे राज्यों को युद्ध में परास्त कर अपनी सीमाएं बढ़ाता चला गया। मगध महाजनपद की आर्थिक परिस्थितियां काफी मजबूत थी मगध राज्य में तत्कालीन शक्तिशाली राजाओं में बिंबिसार अजातशत्रु शिशुनाग आदि शासक मौजूद थे इन्होंने मगध साम्राज्य के उदय में काफी महत्वपूर्ण योगदान प्रदान किया। मगध का अंतिम शासक रिपुंजय था और यह आयोग भी था इसकी योग्यता ही उसकी मृत्यु का कारण बना उसकी मृत्यु अपने ही मंत्री के द्वारा कर दी गई जिससे मगध साम्राज्य का पतन हो गया और इसका स्थान एक नए राजवंश ने ले लिया। vinayiasacademy.com

लिच्छवि:—इस जाति का उदय ईशा पूर्व छठीं सदीं मैं बिहार प्रदेश के उत्तरी भाग मुजफ्फरपुर जिले के वैशाली नगर में निवास करते थे। मनुस्मृति के अनुसार यह लोग व्रात्य क्षत्रिय थे यह लोग वैदिक घर में के विरोधी हुआ करते थे मगर वैशाली में जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी हुए और कौशल की शाक्य शाखा में गौतम बुध का उदय हुआ।जिस प्रकार हिंदुओं के संस्कृत ग्रंथों में इस वंश को ही माना गया है उसी प्रकार बुध और जैन ग्रंथों में इस वंश को उच्च माना गया है गौतम बुध के समकालीन मगध साम्राज्य के राजा बिंबिसार ने वैशाली के लिच्छवि लोगों से संबंध बनाए थे,आगे चलकर गुप्त सम्राट ने भी लिच्छवि कन्याओं से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। पाली साहित्य के अनुसार लिच्छवी वज्जि संघ की प्रधान जाती थी लिच्छवी जाति की राजधानी वैशाली थी इसका उल्लेख रामायण में भी मौजूद है इक्ष्वाकु के पुत्र धर्मात्मा राजा “विशाल”ने इसका निर्माण कराया था इसी कारण से इस नगर का नाम वैशाली रखा गया लिच्छवियों की आस्था बॉडी से जुड़े होने के कारण इनके महापरिनिर्वाण के उपरांत उस स्थान पर स्तूप का निर्माण किया जो वैशाली की खुदाई से प्राप्त होते हैं।

बौद्ध धर्म की द्वितीय संगीति भी वैशाली में हुई थी,माना जाता है कि बुद्ध ने आजाद शत्रु को सचेत किया था कि लिच्छवी संघ अजेय हैं उसे को भी परास्त नहीं कर कर सकता मगर अपनी मंशा पूरी करने के लिए अजातशत्रु ने लिच्छवी राजवंश पर सीधे आक्रमण ना कर उसके मंत्रिमंडल में फूट डालना प्रारंभ कर दिया और इस चाल में अजातशत्रु सफल रहा। गुप्त साम्राज्य का प्रादुर्भाव लिच्छवियों के सहयोग से संभव हो सकता था इसकी जानकारी गुप्त अभिलेखों तथा स्वर्ण मुद्राओं से प्राप्त होता है।गुप्त काल के स्वर्ण मुद्राओं में चंद्रगुप्त एवं श्री कुमार देवी के नाम से प्रसिद्ध एक स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुए हैं इसके एक भाग में राजा रानी की आकृति हैं और दूसरे भाग में सिंह की पीठ पर बैठी अंबिका की मूर्ति है। दाहिनी ओर “लिच्छवय:”मुद्रा लेख पढ़ा गया है। (vinayiasacademy.com). शिशुनाग वंश या हर्यक वंश:—-पुराणों के अनुसार इसे शिशुनाग वंश या जैन बौद्ध ग्रंथों के अनुसार इसे हर्यक वंश कहा गया है। मगर मगध साम्राज्य की नींव रखने वाले शासक बिंबिसार या जो हर्यक वंश का सबसे प्रतापी राजा माना जाता है इसे नागवंश की ही एक उपशाखा माना जाता है बिंबिसार ने राजगृह (“गिरीवव्रज”) को अपनी राजधानी बनाई इसके व्यावहारिक संबंध कौशल नरेश प्रसनजीत की बहन महाकौशल आ और वैशाली के चेतक की पुत्री खेलना तथा पंजाब की राजकुमारी 6 मा थी इसने विभाग की नीति को अपनाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया वह अत्यंत कुशल कूटनीतिज्ञ और दूरदर्शी शासक था बिंबिसार का राज्यअभिषेक 14वर्ष की अल्पायु मैं हो गई थी 544 इसवी पूर्व में माना जाता है कि इसके हरम में 500 रानियां थी इसने अंग राज्य को जीतकर अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया और वहां अपने पुत्र अजातशत्रु को उप राजा नियुक्त किया। बिंबिसार महात्मा बुद्ध का संरक्षक था। विनय पिटक के अनुसार किस ने बौद्ध धर्म को अपनाया था इसने अपने जीवन के 52 वर्षों तक शासन किया बौद्ध और जैन ग्रंथों के अनुसार उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसे बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया था जहां उसकी मृत्यु हो गई। बिंबिसार की न्याय व्यवस्था काफी कठोर मानी जाती थी मृत्युदंड अंग भंग एवं शारीरिक यातना का प्रावधान था, ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था में ग्राम के मुखिया को “ग्राम भोजक “कहा जाता था।इसका प्रमुख कार्य ग्राम की शांति व्यवस्था को स्थापित करना था लगान वसूली का कार्य भी इसी का हुआ करता था मगर इस पर केंद्र का पूर्ण नियंत्रण होता तथा प्रशासनिक पदाधिकारियों में सभासतत्तक, सेनानायक और वोहारिक(न्यायाधीश) का महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था। (vinayiasacademy.com)।

बिंबिसार (544-492) ईस्वी पूर्व:—बिंबिसार के पिता दक्षिण बिहार के एक छोटे से सैनिक अधिकारी हुआ करता था।बिंबिसार को गौतम बुध के सबसे बड़े संरक्षक के रूप में माना जाता है इसने अंग के राज्यों को जीतकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। पुराणों के अनुसार बिंबिसार को श्रेणिक कहा गया था बिंबिसार ने मगध के साम्राज्य का विस्तार व्यवहारिक संधियों एवं विज्यों के माध्यम से काफी बढ़ाया। बिंबिसार ने अंग के राजा बृहमदंत को परास्त किया था और इस राज्य को अपने राज्य में मिला लिया था। बिंबिसार ने अवंती के राजा चंद प्रधोत, जो पीलिया से पीड़ित था इलाज प्रसिद्ध वैद्य “जीवक” के द्वारा करवाया था। बिंबिसार द्वारा बनाए गए न्याय व्यवस्था अत्यंत कठोर सजा का प्रचलन था मृत्यु दंड अंग भंग एवं शारीरिक यातना का प्रावधान था। इसके राज्य में 80,000 गांव थेअतः इतनी बड़ी संख्या में गांव का होना यह दर्शाता है कि बिंबिसार के राज्य का विस्तार दूर-दूर तक फैला हुआ था। बिंबिसार का अंतिम समय बहुत दुखद बिता,बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बिंबिसार ने अपने पुत्र अजातशत्रु को युवराज घोषित कर दिया था, मगर इस के पुत्र ने जल्दी राजा बनने की लालच में अपने पिता बिंबिसार का वध कर दिया। उसे ऐसा घिनौना कार्य करने के लिए बुदद्ब के चचेरे भाई देव दत्त ने उकसाया था। (विनय आईएएस अकैडमी)। अजातशत्रु (492 से 462 ईसवी) पूर्व:–बिंबिसार की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अजातशत्रु राजा बना इसका कार्यकाल (492 से 462) ईसवी पूर्व माना जाता है अजातशत्रु का वास्तविक नाम कुणीक था। अजातशत्रु के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना बुद्ध का महापरिनिर्वाण था बुद्ध की मृत्यु 483 ईसवी पूर्व मानी जाती है आगे चलकर सप्तपणीं गुहा से बौद्व संघ की प्रथम संगीति हुई जिसमें सुप्त पिटक और विनयपिटक का संपादन हुआ। यह कार्य भी अजातशत्रु के ही संरक्षण में हुआ था। अजातशत्रु का विवाह राजकुमारी वजीरा से हुआ था। यह कौशल नरेश प्रसनजीत की पुत्री और अजातशत्रु की ममेरी बहन थी। इसमें अपनी सीमा की सुरक्षा के लिए किलेबंदी को सुदृढ़ किया और साथ ही साथ एक चारदीवारी का निर्माण राजगृह में करवाया।पाटलिपुत्र में एक दुर्ग का निर्माण करवाया इसमें काशी ग्राम का राजस्व कौशल के द्वारा रोक दिए जाने के कारण अजातशत्रु ने इस पर आक्रमण किया था परंतु बाद में आपसी समझौता हो जाने के कारण युद्ध की समाप्ति हो गई। अजातशत्रु के काल में मगध महाजनपद से साम्राज्य बन गया था अजातशत्रु ने अपने सैनी हथियारों में काफी नए-नए आविष्कार किए थे जिनमें रथमूसल जो गधा युक्त रथ हुआ करता था। तथा महाशिला कंटक जो पत्थर फेंकने वाली मशीन थी इसका आविष्कार कर अपनी सैन्य शक्तियों को काफी मजबूत किया था। 462 ईसवी पूर्व अजातशत्रु को भी इस के पुत्र ने मार दिया। (vinayiasacademy.com)।

उदायिन(462 से 440 ईसवी पूर्व):— उदयीन ने पाटलिपुत्र कुसुमपुर की स्थापना की थी। इसे अपनी राजधानी बनाई यह गंगा और सोन नदी के संगम पर स्थित था, उदयन का वास्तविक नाम “उदयभद्र”था। अवंती और मगध के बीच युद्ध में उदायीन ने 3 अन्य राजाओं की सहायता प्राप्त किया था मगर इसका परिणाम आ संतोषजनक रहा। इस के शासनकाल में प्रगति अंश मात्र भी नहीं हुआ पुराणों के अनुसार नंदी वर्धन और महानंदी उदयीन के पश्चात मगध के सम्राट बने इन शासकों ने लगभग 32 वर्षों तक शासन किया था मगर अंतिम समय में शिशुनाग ने मगध साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले लिया और यही समय था जब नागवंश अस्तित्व में आए। (Vinay IAS academy)। शिशुनाग वंश(412 -344 ईसवी पूर्व):—मगध के नए राजवंश के रूप में शिशुनाग वंश का उदय हुआ। हर्यक वंश के समय में माना जाता है कि शिशुनाग बनारस में मगध के राजा का गवर्नर हुआ करता था। बौद्ध ग्रंथों और पुराणों में इसके शासन को लेकर अलग-अलग मत प्राप्त होते हैं बौद्ध ग्रंथों के अनुसार इसका कार्यकाल 18 वर्षों का था और पुराणों के अनुसार 40 वर्षों का था। महावंश के अनुसार, वह लिच्छवी राजा के वैश्या से उत्पन्न पुत्र था। मगर पुराणों के अनुसार वह क्षत्रिय था। सर्वप्रथम किसने अवंती वर्धन के विरुद्ध विजय प्राप्त किया शिशुनाग ने अपने राज्य में दो राज निधियों का निर्माण करवाया था। प्रथम गिरीब्रिज (राजगृह)और दूसरा वैशाली था। (Vinay’s IAS academy):–. कालाशोक:—बनारस और गया के पूर्व प्रशासक कालाशोक, शिशुनाग वंश के प्रथम शासक शिशुनाग के बाद मगध का शासक बन गया। महा वंश में इसे कालाशोक और पुराणों में इसे “काकवर्ण “के नाम से जाना जाता है।इसके कार्यकाल की महत्वपूर्ण घटनाओं में से प्रथम घटना वैशाली में दूसरी बौद्ध संगीति का आयोजन है बाणभट्ट के द्वारा रचित हर्ष चरित्र में लिखा गया है कि पाटलिपुत्र में घूमते समय महापहमनंदन नामक व्यक्ति ने कालाशोक को चाकू मारकर इसकी हत्या कर दी थी। महाबोधि वंश के अनुसार इसके 10 पुत्र थे इसकी मृत्यु के उपरांत नंद वंश का उदय 344 ईसवी पूर्व हुआ। (Vinay’s IAS academy)। महापदमनंद:—नंद वंश का उदय शिशुनाग वंश के उपरांत हुआ इसके संस्थापक का नाम उग्रसेन या महापदम नंद था। इसकी जाति की स्पष्टता प्राप्त नहीं होती है। इस एनीमिया शूद्र जाति का बताया गया है। मगर इतिहास में इसे भारत का प्रथम सम्राट माना गया है विशाल दत्त के द्वारा रचित मुद्राराक्षस से इसकी जाति का प्रमाण मिलता है इसने कई उपाधियां धारण की थी कलिंग विजय के संबंध में खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख से पता चलता है कि उसने एकराट् की भी उपाधि धारण की थी, इसकी सेना बहुत विशाल थी और इसी के दम पर उसने कई लड़ाइयां लड़ी और अपने साम्राज्य का विस्तार करता चला गया।इसने लगभग 28 वर्षों तक शासन किया मगर महापदम नंद की मृत्यु के बाद नंद वंश का पतन होना आरंभ हो गया नंद वंश का अंतिम शासक धनानंद था वह अत्यंत दुष्ट शासक था धनानंद के अत्याचारों को समाप्त करने के लिए कौटिल्य की सहायता से चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य की नींव रखी नंदों की राजधानी पाटलिपुत्र हुआ करती थी।(vinayiasacademy.com

विदेशी आक्रमण:—इस समय की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में विदेशी आक्रमण सबसे महत्वपूर्ण घटना माना गया है विदेशी आक्रमणकारियों में सबसे महत्वपूर्ण यूनानी आक्रमण था। वैसे तो यूनानी आक्रमण के पूर्व इरानियों ने भी भारत पर विजय प्राप्त की मंशा से आक्रमण किए थे। मगर इन विदेशी आक्रमणों में यूनानीयों द्वारा किया गया आक्रमण इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। यूनानीयों द्वारा भारत पर किए गए आक्रमण का नेतृत्व मकदुनिया के शासक फिलिप के पुत्र सिकंदर ने किया जो उस समय मकदूनिया का सम्राट था। सिकंदर के पिता की इच्छा थी कि वह विश्व विजय बने और अपने पिता के सपने को साकार करने का जिम्मा उसके पुत्र सिकंदर ने अपने कंधों पर लिया था।जिस समय सिकंदर भारत पर आक्रमण करना चाहता था उस समय भारत की राजनीतिक स्थिति दयनीय थी और सिकंदर इस मौके को खोना नहीं चाहता था। सिकंदर के भारत विजय अभियान में लगभग 327 ईसवी पूर्व से प्रारंभ हुआ, इतिहास में उसे एक कुशल शासक के रूप में माना जाता है ऐसा माना जाता है कि गृक लोगों को जितनी भी भूमि के बारे में जानकारी थी,उन सभी में से आधे से अधिक भूमि को सिकंदर ने अपने जीवन काल में जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया था मगर इसके विजय रथ को रोकने का कार्य भारत के राजा पोरस का नाम आता है। 326 ईसवी पूर्व में सिकंदर सिंधु नदी को पार कर तक्षशिला की तरफ बढ़ गया मगर वहां के शासकों ने उसके सामने आत्मसमर्पण कर दिया मगर पोरस झेलम नदी के तट पर सिकंदर का अकेला ही रास्ता रोककर खड़ा हो गया। पोरस की विजय के बाद सिकंदर ने वहां दो राज्यों का निर्माण किया उन नगरों में से बुकेफल में सिकंदर के प्रिय घोड़े की मृत्यु हो गई, व्यास नदी सिकंदर का अंतिम पड़ाव था इसके बाद सिकंदर की सेना आगे बढ़ने से इनकार कर दिया और यहीं से उसे वापस लौटना पड़ा सिकंदर ने व्यास नदी के तट पर 12 वैदिक स्तंभों का निर्माण यूनानी देवताओं के नाम पर करवाया, सिकंदर ने अपने जीते हुए राज्यों को मित्रों के रूप में स्थापित कर दिया सिकंदर ने अपनी वापसी के समय अपनी सेना को दो टुकड़ों में विभाजित कर दिया, एक टुकड़ी को नियाकर्श के नेतृत्व में उसने समुद्री मार्ग से यूनान भेजा और दूसरी टुकड़े को क्रेटेरस के नेतृत्व में स्थल मार्ग से बोलनदर्रा से गुजर कर बेबी लोन पहुंचा, मगर बेबीलोन तक पहुंचते-पहुंचते सिकंदर की तबीयत खराब होने लगी थी और 323 ईसवी पूर्व में यही इसकी मृत्यु हो गई। सिकंदर के आक्रमण से तिथि क्रम को एक निश्चित आयाम मिला 326 ईसवी पूर्व के बाद का इतिहास तिथि क्रम एवं क्रमबद्ध होना इसी आक्रमण के फलस्वरूप संभव हो सका इसके आक्रमण के फल स्वरुप भारत और यूनानी संबंधों में काफी निकटता आ गई। (Vinay’s IAS academy)


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