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संविधान की आपातकालीन उपबंध :-
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1.संविधान के भाग XVIII 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन उपबंध उल्लिखित हैं। ये उपबंध केंद्र को किसी भी असामान्य स्थिति से प्रभावी रूप से निपटने में सक्षम बनाते हैं।
संविधान में इन उपबंधों को जोड़ने का उद्देश्य देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता, लोकतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था तथा संविधान की सुरक्षा करना है।

2.आपातकालीन स्थिति में केंद्र सरकार सर्व-शक्तिमान हो जाती है, तथा सभी राज्य, केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाते हैं। ये संविधान में औपचारिक संशोधन किए बिना ही संघीय ढांचे को एकात्मक ढांचे में परिवर्तित कर देते हैं। सामान्य समय में राजनैतिक व्यवस्था का संघीय स्वरूप से आपातकाल में एकात्मक स्वरूप में इस प्रकार के परिवर्तन भारतीय संविधान की अद्वितीय विशेषता होती है। इस परिप्रेक्ष्य में “डाॅ. बी. आर. अंबेडकर” ने संविधान सभा में कहा था कि-

3.अमेरिका सहित सभी संघीय व्यवस्थाएं संघवाद के एक कड़े स्वरूप में हैं। किसी भी परिस्थिति में ये अपना स्वरूप और आकार परिवर्तित नहीं कर सकते हैं। दूसरी ओर भारत का संविधान, समय एवं परिस्थिति के अनुसार एकात्मक व संघीय दोनों प्रकार के हो सकते है। यह इस प्रकार निर्मित किया गया है, कि सामान्यतः यह संघीय व्यवस्था के अनुरूप कार्य करता है। परंतु आपातकाल में यह एकात्मक व्यवस्था के रूप में कार्य करते है।

संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल को निर्दिष्ट किया गया है-

  1. युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह के कारण आपातकाल (अनुच्छेद 352 ), को राष्ट्रीय आपातकाल के नाम से जाना जाता है। किंतु संविधान ने इस प्रकार के आपातकाल के लिए ‘ आपातकाल की घोषणा ‘ वाक्य का प्रयोग किया गया है।
  2. राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता के कारण आपातकाल को राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) के नाम से भी जाना जाता है। इसे दो अन्य नामों से भी जाना जाता है -राज्य आपातकाल अथवा संवैधानिक आपातकाल। किंतु संविधान ने इस स्थिति के लिए आपातकाल शब्द का प्रयोग नहीं किया है ।
  3. भारत की वित्तीय स्थायित्व अथवा साख के खतरे के कारण अधिरोपित आपातकाल, वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) कहा जाता है।

राष्ट्रीय आपातकाल:-

घोषणा के आधार पर

  • यदि भारत की अथवा इसके किसी भाग को सुरक्षा को युद्ध अथवा बाहय आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह के कारण खतरा उत्पन हो गया हो तो अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकते है। राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा वास्तविक युद्ध अथवा बाहध आक्रमण अथवा सशक्त विद्रोह से पहले भी कर सकते है। यदि वह समझे कि इनका आसन खतरा है ।
  • राष्ट्रपति युद्ध, बाहध आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह अथवा आसन खतरे के आधार पर वह विभिन उद्घोषणाए भी जारी कर सकता है। चाहे उसने पहले से कोई उद्घोषणा की हो या न की हो या ऐसी उद्घोषणा लागू हो। यह उपबंध 1975 में 38वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा जोड़ा गया है।
  • जब राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा युद्ध अथवा बाहय आक्रमण के आधार पर की जाती है, तब इसे बाहय आपातकाल के नाम से जाना जाता है। दूसरी ओर, जब इसकी घोषणा सशस्त्र विद्रोह के आधार पर की जाती है, तब इसे श् आंतरिक आपात काल श् के नाम से जाना जाता है ।
  • राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा संपूर्ण देश अथवा केवल इसके किसी एक भाग पर लागू हो सकती है। 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम ने राष्ट्रपति को भारत के किसी विशेष भाग पर राष्ट्रीय आपातकाल लागू करने का अधिकार प्रदान किया है।
  • प्रारंभ में संविधान ने राष्ट्रीय आपातकाल के तीसरे आधार के रूप में श् आंतरिक गड़बड़ी श् का प्रयोग किया था, किंतु यह शब्द बहुत ही अस्पष्ट तथा विस्तृत अनुमान वाला था। अतः 1978 के 44 वें संशोधन अधिनियम द्वारा आंतरिक गड़बड़ी शब्द को श् सशस्त्र विद्रोह श् शब्द से विस्थापित कर दिया गया। अतः अब आंतरिक गड़बड़ी के आधार पर आपातकाल की घोषणा करना संभव नहीं है, जैसा कि 1975 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने किया था। किंतु राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा केवल मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश प्राप्त होने पर ही कर सकते है। इसका तात्यर्य यह है कि आपातकाल की घोषणा केवल मंत्रिमंडल की सहमति से ही हो सकता है न कि मात्र प्रधानमंत्री की सलाह से। 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बिना मंत्रिमंडल की सलाह के राष्ट्रपति को आपातकाल की घोषणा करने की सलाह दी और आपातकाल लागू करने के बाद मंत्रिमंडल को इस उद्घोषणा के बारे में बताया। 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम ने प्रधानमंत्री के इस संदर्भ में अकेले बात करने और निर्णय लेने की संभावना को समाप्त करने के लिए इस सुरक्षा का परिचय दिया है।
  • 1975 के 38वें संशोधन अधिनियम ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा न्यायिक समीक्षा की परिधि से बाहर रखा था। किंतु इस प्रावधान को 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम द्वारा समाप्त कर दिया गया। इसके अतिरिक्त मिनर्वा मिल्स मामले 1980 में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को अथवा इस आधार पर कि घोषणा को कि वह पूरी तरह बाह्मय प्रभाव तथा असंबद्ध तथ्यों पर या विवेक शून्य या हठधर्मिता के आधार पर की गयी हो तो अदालत में चुनौती दी जा सकती है ।

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