भूकंपीय तरंगें
Vinayiasacademy.com
भूकंपीय तरंगे तीन प्रकार के होते हैं,P,S, और L .
P तरंगें: इनका संचरण ध्वनि के समान होता है। इसमें अणुओं का कपन्न तरंगों की की दशा में आगे पीछे होता है इन तरंगों की गति ठोस से सर्वाधिक होती है।
S तरंगे: इन्हें गौण तरंगें भी कहते हैं इसमें अणुओं की गति की दिशा के समकोण होते हैं।इन तरंगों का मार्ग अव्वल होता है।
L तरंगे : L तरंगी जो होती है वह लंबी अवधि वाली तरह की होती है। इनका भ्रमण पर्थ उव्वल होता है यह जैसे भी बुक कर गुजरते हैं और यह बेहद खतरनाक होते हैं।
ज्वालामुखी:
Vinayiasacademy.com
ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर उपस्थित ऐसे दरार या मुख होते हैं जिससे पृथ्वी के भीतर का गर्म लावा गैस रात आदि बाहर आते हैं। वस्तुतः पिया पृथ्वी की ऊपरी परत मैं एक विभंग (rupture) होते हैं। जिसके द्वारा अंदर के पदार्थ बाहर निकलते हैं। जिसे हम ज्वालामुखी कहते हैं।
ज्वालामुखी का संबंध प्लेट विवतर्तनिकी से है क्योंकि यह पाया गया है कि बहुधा ये प्लेटों की सीमाओं के सहारे पाए जाते हैं क्योंकि यह प्लेट सीमाएँ पृथ्वी की ऊपरी परत में विभिन्न उत्पन्न होने हेतु कमजोर स्थल उपलब्ध करा देती है। ज्वालामुखी द्वारा निःसृत इन पदार्थों के जमा हो जाने से निर्मित शंक्वाकार स्थल ग्रुप को ज्वालामुखी पर्वत कहा जाता है।
इनके अलावा और भी कुछ अन्य स्थलों पर भी ज्वालामुखी पाए जाते हैं जिनकी उत्पत्ति मैंटल प्लूम से माना जाता है और ऐसे स्थलों को हॉटस्पॉट की संज्ञा दी जाती है।
ज्वालामुखी की आकस्मिक घटना को भू-आकृति विज्ञान के रूप में देखा जाता है। और पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन लाने वाले बलों में इससे रचनात्मक बल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। क्योंकि इनसे बहुत सारे स्थलरूपों का निर्माण भी होता है, तो वहीं दूसरी ओर पर्यावरण भूगोल इनका अध्ययन एक प्राकृतिक आपदा के रूप में करता है,क्योंकि इससे पारितंत्र और जान-माल का नुकसान होता है।Vinayiasacademy.com

ज्वालामुखी के प्रकार:
ज्वालामुखी के विस्फोट के समय लावा,टेफ्रा और विभिन्न गैस से ज्वालामुखी से निकलती है तो वहीं ज्वालामुखी विशेषज्ञों ने ज्वालामुखी विस्फोट ओके अनेक प्रकार का वर्णन किया है इनका नामकरण प्रसिद्ध ज्वालामुखियों के नाम पर किया गया है जिसमें अनेक प्रकार का व्यवहार देखने को मिला था।
कई प्रकार की ज्वालामुखी विस्फोट जिसके द्वारा लावा टेफ्रा( राख लैपिली ज्वालामुखी बम तथा ज्वालामुखी ब्लॉक ) और मिश्रित गैसों को ज्वालामुखी फिशर या वेंट निष्कासित कर दिया जाता है। ज्वालामुखीविदों द्वारा प्रतिष्ठित किया गया है। इमली अक्षय प्रसिद्ध ज्वालामुखी के नाम पर रखा जाता है यहां उस प्रकार का वह बार देखा गया है। कुछ ज्वालामुखी गतिविधि की अवधि के दौरान केवल एक विशेष प्रकार का विस्फोट का प्रदर्शन करते हैं या प्रदर्शन कर सकते हैं जबकि अन्य एक विस्फोटक श्रृंखला में सभी प्रकार के पूरे अनुक्रम प्रदर्शित कर सकते हैं।Vinayiasacademy.com
तीन अलग प्रकार के विस्फोट भी होते हैं। जिनमें सबसे अच्छी तरह से मनाया जाता है मैग्मैटिक विस्फोट मैग्मा के भीतर गैस का डिकंपप्रशन भी शामिल होता है जो इसे आगे बढ़ाता है।Phreatomagmatic विस्फोट एक और प्रकार का ज्वालामुखी विस्फोट है जिसमें मैगमा के भीतर गैस के संपीड़न से प्रेरित है,प्रक्रिया के प्रत्यक्ष विपरीत मैग्मैटिक गतिविधि को शक्ति देता है। तीसरा विस्फोटक प्रकार अग्नि विस्फोट है जो मैग्मा के संपर्क के माध्यम से भाप के अति ताप द्वारा संचालित होता है; इन विस्फोटक प्रकार अक्सर मौजूदा रॉक के दाने के कारण, कोई भी मैग्मैटिक रिलीज प्रदर्शित नहीं करते हैं।इन व्यापक परिभाषित विस्फोटक प्रकारों के भीतर कई उपप्रकार हैं। सबसे कमजोर हवाईयन और पनडुब्बी हैं, फिर स्ट्रॉम्बोलियन, इसके बाद वल्कानियन और सुरत्सियन। मजबूत विस्फोटक प्रकार पेलेन विस्फोट होते हैं, इसके बाद प्लिनियन विस्फोट होते हैं; सबसे मजबूत विस्फोटों को “अल्ट्रा-प्लिनियन” कहा जाता है।
विस्फोटक ताकत का एक महत्वपूर्ण उपाय ज्वालामुखीय विस्फोटक सूचकांक (वी॰ई॰आई॰) है, जो 0 से 8 तक के आयाम पैमाने का क्रम होता है जो प्रायः विस्फोटक प्रकारों से संबंधित होता है।Subglacial और phreatic विस्फोट उनके विस्फोटक तंत्र द्वारा परिभाषित किया गया है, और ताकत में भिन्नता है। Vinayiasacademy.com

ज्वालामुखी के प्रकार:
ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं।
क. सक्रिय ज्वालामुखी: सक्रिय या जागृत ज्वालामुखी जैसे एक्टिव ज्वालामुखी (active volcano)भी कहा जाता है- इस प्रकार के ज्वालामुखियों से बहुधा उद्गार होते रहते हैं. इस प्रकार के ज्वालामुखियों से बहुधा उद्गार होते रहते हैं. मिसली द्वीप पर इटली के एटना व स्ट्रॉमब्ली सक्रिय ज्वालामुखी है.
ख.प्रसुप्त ज्वालामुखी: सुषुप्त ज्वालामुखी (डॉर्मेंट वोल्केनो) dormant volcanoes -ये ऐसे ज्वालामुखियों से कुछ समय की सुषुप्ति के पश्चात पुनः उद्गार होते रहते हैं, वैसे ही एक उदाहरण इटली के विसुवियस इसी प्रकार का ज्वालामुखी है, जिसमें सन 1631,1812,1906, 1943 में उद्गार हो चुके हैं.

ग.मृत ज्वालामुखी: मृत या शांत ज्वालामुखी एक्सटिंक्ट वोल्केनो
(Extinct volcano)- जिस ज्वालामुखियों में दीर्घ अवधि से कोई उद्गार नहीं हुए एवं ज्वालामुख में जलादि भर जाते हैं उन्हें शांत ज्वालामुखी कहते हैं,म्यानमार का माउंट पोपा, ईरान का कोहे सुल्तान आदि शांत मृत ज्वालामुखी के उदाहरण है।Vinayiasacademy.com
ज्वालामुखी शंकु के अंग या भाग
एक मिश्रित ज्वालामुखी के विभिन्न भाग :
- विशाल मैग्मा कोष्ठ
- आधारशैल
- नाली (पाइप)
- आधार
- सिल
- भित्ति (डाइक)
- ज्वालामुखी द्वारा उत्सर्जित राख की परतें
- पार्श्व
9.ज्वालामुखी द्वारा उत्सर्जित लावा की परतें - गला
- परजीवी शंकु
- लावा प्रवाह
- निकास
- विवर (क्रेटर)
- राख के बादल
निःसृत पदार्थ ज्वालामुखी छिद्र के चारों ओर जमा होने लगता है तो ज्वालामुखी शंकु का निर्माण होता है। और जब यहां और अधिक जाम हो जाता है तो या शंकु बेहद बड़ा हो जाता है और या एक पर्वत का रूप ले लेता। जिससे हम ज्वालामुखी पर्वत कहते हैं और इस पर्वत के मध्य में जो छिद्र होता है उसे हम ज्वालामुखी छिद्र कहते है,मुख अथवा विवर भी कहते है।यह छिद्र नीचे से एक नली द्वारा जुड़ा हुआ होता है जिसे हम ज्वालामुखी नली कहते हैं।

प्लेट विवर्तनिकी :
Vinayiasacademy.com
प्लेट विवर्तनिकी-(Plate tectonics): जो पृथ्वी के स्थलमण्डल में बड़े पैमाने पर होने वाली गतियों की व्याख्या प्रस्तुत करता है। साथ ही महाद्वीपों, महासागरों और पर्वतों के रूप में धरातलीय उच्चावच के निर्माण तथा ज्वालामुखी और भूकंप जैसी घटनाओं के भौगोलिक वितरण की व्याख्या करता है या करने का प्रयास करता है।
बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में अभिकल्पित महाद्वीपीय विस्थापन नामक संकल्पना से विकसित हुआ है जब की 1960 मैं ऐसे नवीन साक्ष्यों की खोज की गई जिसमें महाद्वीपों की स्थिर होने की बजाय उनमें गतिशील होने की अवधारणा को बल मिला। इनमें सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्यों में पुराचुम्बकत्व से सम्बन्धित साक्ष्य जिनसे सागर नितल प्रसरण की पुष्टि हुई। हैरी हेस के द्वारा सागर नितल प्रसरण की खोज से इस सिद्धान्त का प्रतिपादन आरंभ माना गया है।और विल्सन, मॉर्गन, मैकेंज़ी, ओलिवर, पार्कर इत्यादि विद्वानों ने इसके पक्ष में प्रमाण उपलब्ध कराते हुए इसके संवर्धन में अपना योगदान भी दिया है।Vinayiasacademy.com

इस सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी की ऊपरी लगभग 80 से 100 कि॰मी॰ मोटी परत, जिसे स्थलमण्डल कहा जाता है,और जिसमें भूपर्पटी और भूप्रावार के ऊपरी हिस्से का भाग शामिल हैं, कई टुकड़ों में टूटी हुई है जिन्हें प्लेट कहा जाता है। और ऐसे प्लेट नीचे स्थित एस्थेनोस्फीयर अर्धपिघलित परत पर तैर रहीं होती हैं और सामान्यतया लगभग 10-40 मिमी/वर्ष की गति से गतिशील होती है जबकि इनमें कुछ की गति 160 मिमी/वर्ष भी है। इन प्लेटों के गतिशील होने से पृथ्वी के वर्तमान धरातलीय स्वरूप की उत्पत्ति और पर्वत निर्माण की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है और ये भी देखा गया है कि प्रायः भूकम्प इन प्लेटों की सीमाओं पर ही आते हैं और ज्वालामुखी भी इन्हीं प्लेट सीमाओं के सहारे ही पाए जाते हैं।
प्लेट विवर्तनिकी में विवर्तनिकी शब्द यूनानी भाषा के (tectonicus)से बना है। जिसका अर्थ निर्माण से सम्बंधित है।”प्लेट” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कनाडा के भूविज्ञानी टुजो विल्सन (Wilson) ने किया था और प्लेट टेक्टोनिक्स शब्द का पहली बार प्रयोग मोर्गन (Morgan) द्वारा किया गया था।