जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन:-
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- वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ती मात्रा व सान्द्रण से उत्पन्न ग्रीन हाउस प्रभाव द्वारा भूमण्डलीय तापमान में वृद्धि एवं जलवायु परिवर्तन को सर्वप्रथम वर्ष 1988 में संयुक्त राष्ट्रीय पर्यावरण कार्यक्रम की बैठक में एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक मुद्दा घोषित किया गया। उसी साल संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम एवं विश्व-मौसम संगठन द्वारा जलवायु परिवर्तन पर इन्टरगवर्नमेन्टल पैनल की स्थापना की गई।
- वर्ष 2000 में नीदरलैंड के शहर हेग में वैश्विक जलवायु पर वार्ता के छठे दौर में व्यापारिक विचार विमर्श के बाद यह तय किया गया कि 21वीं सदी में बढ़ती पर्यावरणीय समस्या एवं उनसे जुड़े कुछ आर्थिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इन पादय गृह गैसों के उत्सर्जन की सही सही आकलन ऐसी प्रबंध तकनीकों का विकास किया जाए जो इन्हें न्यून स्तर पर ले जाने में सक्षम हो।
- आईपीसीसी की तीसरी मूल्यांकन (200ए) रिपोर्ट के अनुसार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन द्वारा अगले 100 सालों में भूमंडल तापमान में 1.5 से 5.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है। इस तथ्य में पर्यावरण व मौसम वैज्ञानिकों के साथ-साथ विश्व समुदाय को खुले दिमाग से चिंतन करने पर मजबूर कर दिया है।
- ग्रीन हाउस गैसों द्वारा भूमंडलीय तापमान में योगदान की दृष्टि से कार्बन डाइऑक्साइड पहले नंबर पर, दूसरे नंबर पर मिथेन तीसरे नंबर पर नाइट्रस ऑक्साइड, और उसके बाद क्लोरो-फ्लोरो कार्बन और अन्य गैस भी आती है। भूमंडलीय तापमान क्षमता की दृष्टि से इनमें इन्फ्रारेड विकिरण या किरणों को शोषित करने की क्षमता में भिन्नता होती है।

- उदाहरण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड की अपेक्षा नित्य में भूमंडलीय उष्मन क्षमता 21 गुना व नाइट्रस ऑक्साइड में 310 गुना होती है। इन गैसों की उष्मन क्षमता भिन्नता प्रचुरता,स्त्रोत, वातावरण में जीवन- अवधि अभिगमन के कारण वैश्विक तापन प्रभिवित होता है।
- वैश्विक तापन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न मौसम एवं जलवायु में परिवर्तन आज वैश्विक समस्याओं में से एक है। आर्थिक एवं विकासात्मक गतिविधियों का विस्तार बढ़ती जनसंख्या और जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल आदि ऐसे कारण है जिसमें मानव द्वारा या मानव जनित ग्रीन हाउस गैसों का अत्यधिक उत्सर्जन हो रहा है।
- जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी अनुमानों से संकेत मिलता है कि विकासशील देशों पर कई तरह के दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं जिनसे अतिवादी घटनाओं जैसे लू चलने और भारी वर्षा होने की आवृत्ति, अवधि और तीव्रता मैं बदलाव आ जाते हैं। जलवायु परिवर्तन से मानव स्वास्थ्य को रोगवाहकों (मच्छर आदि) से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

- जलवायु परिवर्तन का विकासशील देशों पर विषमतापूण दुष्प्रभाव पड़ेगा और इससे स्वास्थ्य क्षेत्र भोजन स्वच्छ जल और अन्य संसाधनों तक पहुंच के मामले में पहले से जारू असमानता और भी अधिक बढ़ जाएगी।भारत की जलवायु परिवर्तन के मामले में विशेष तौर पर गंभीर रूप से चिंतित है क्योंकि यह जलवायु की दृष्टि से आजीविका के लिए कृषि एवं वानिकी जैसे क्षेत्रों पर निर्भर हो जो जलवायु की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है।
- ‘पृथ्वी के तापमान के बढ़ने तथा धरती की जलवायु में परिवर्तन से केवल समुद्र तल के ऊपर उठने की ही समस्या का सामना होगा, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। इसके अतिरिक्त सूखा का प्रभाव बढ़ेगा, खासकर दक्षिणी यूरोप में मध्य एशिया में, सहारा के नीचे वाले भाग में अफ्रीका में, दक्षिण पश्चिम अमेरिका, मैक्सिको आदि में।
- इन सभी क्षेत्रों में सूखा के कारण कृषि उपज में कमी आएगी, साथ ही मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया, जो इन सभी क्षेत्रों में पहले ही एक बड़ी समस्या है, वह और भी तीव्र हो जाएगी। इसका परिणाम होगा कि लोग बड़ी संख्या में ऐसे क्षेत्र से पलायन करेंगे और स्वाभाविक है, कि उनका पलायन अन्य क्षेत्रों के लिये भी समस्या उत्पन्न करेगा। अनुमान है कि वर्ष 2080 के बाद प्रत्येक वर्ष 10 करोड़ लोग केवल बाढ़ से प्रभावित होंगे और जब अधिक तीव्र तूफान तथा टाइफून भी आएँगे तो समस्या और भी गम्भीर होगी।
- सन 1896 में स्वान्ते आरहीनियस ने पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन की सम्भावना की भविष्वाणी की थी। उनकी भविष्यवाणी का आधार था कि तेजी से बढ़ रहा उद्योगीकरण और उसके फलस्वरूप वायुमंडल में अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का पहुँचना। उनका विश्वास था कि जिस प्रकार जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा था उसका परिणाम केवल यही हो सकता था कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा निरन्तर बढ़ेगी।

- उस समय भी उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि कार्बन डाइऑक्साइड के वायुमंडल में बढ़ने से पृथ्वी के तापमान में अन्तर होगा। उन्होंने यह भी बताया कि अगर वायमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा दुगनी होती है तो धरती का तापमान कई डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। परन्तु इस बात पर लोगों ने अधिक ध्यान नहीं दिया। उस समय तो बस यही एक चिन्ता थी कि किसी भी तरह विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाये। यही कारण था कि एक ओर जहाँ कोयला, खनिज तेल, गैस इत्यादि की खपत बढ़ती गई, दूसरी ओर वनों का क्षेत्र कम होता गया, समुद्र में रहने वाले जीव जो वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करते हैं, उनकी मात्रा में भी कमी होती गई और नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन तथा सी.एफ.सी. जैसे पदार्थ भी वायुमंडल में जाते रहे।