भारत में हो रहे महत्वपूर्ण जन सांख्यिकी बदलाव से राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन पर चर्चा कीजिए।
Vinay singh Vinayiasacademy.com
यह परिवर्तन केवल सांख्यिक नहीं होता है बल्कि शासन विकास योजना, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून व्यवस्था, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्र की भावी दिशा पर गहरा असर डालता है। ऐसे में जन सांख्यिकीय परिवर्तन का अध्ययन करने हेतु सरकार ने कई कमिटी बनाने का निश्चय किया है। देश की जनसंख्या के गतिशीलता, असमान प्रजनन दर में गिरावट, व्यापक प्रवासन, तीव्र नगरीकरण, कुछ क्षेत्र में धार्मिक संरचना में बदलाव आबादी के विरुद्ध होने तथा राज्य के बीच सामाजिक आर्थिक असमानता के कारण जटिल होती जा रही है। इन बदलाव का भी विश्लेषण भारत सरकार करने जा रही है। दक्षिणी और पश्चिमी राज्य में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर के निकट पहुंच चुकी है। वहीं कई उत्तर व पूर्वी राज्य में प्रजनन दर अब भी अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा है। यह असमान बदलाव संसाधन के वितरण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, रोजगार अवसर और अवसंरचना की मांग में असंतुलन पैदा करेगा। तीव्र जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों पर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आवास रोजगार सृजन का अत्यधिक दबाव बढ़ जाता है, जबकि वृद्ध होती आबादी वाले राज्य को श्रमिक बल की कमी ,बढ़ती आश्रित आबादी का सामना करना पड़ता है। प्रवासन आबादी में भी परिवर्तन एक अन्य प्रमुख कारक हो जाता है। ग्रामीण से शहरी क्षेत्र तक गरीब से विकसित राज्य की और आंतरिक प्रवासी भी तेजी से बढ़ा है। आर्थिक अवसर, औद्योगिकरण व शहरी आकांक्षा के कारण शहर का विस्तार हो रहा है, परन्तु अवस्थित नगरीकरण से भीड़भाड़, नागरिक सुविधा पर दबाव, अनौपचारिक बस्ती का विस्तार ,बेरोजगारी, सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है. महानगरीय क्षेत्र में आबादी का दबाव आवास, स्वच्छता, परिवहन, कानून व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है। संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में सीमा पार प्रवासन भी रणनीतिक व प्रशासनिक चिंता को जन्म देता है। सीमावर्ती राज्य अक्सर छिद्र युक्ति सीमा, कठिन भौगोलिक परिस्थिति तथा पड़ोसी देशों के साथ सामाजिक आर्थिक असमानता के कारण अधिक संवेदनशील होते हैं। अनियंत्रित प्रवासन पहचान दस्तावेजीकरण, कल्याणकारी योजना तक पहुंच तथा चुनावी प्रक्रिया से संबंधित चिंता पैदा कर देता है, इसलिए सीमावर्ती क्षेत्र के जनसांख्यिकीय पैटर्न का राष्ट्रीय सुरक्षा संसाधन प्रबंधन और सामाजिक एकता की दृष्टिकोण से सावधानीपूर्वक अध्ययन होना चाहिए। आबादी में बदलाव का राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता है। पर्याप्त रोजगार अवसर के बिना बड़ी युवा आबादी निराशा, सामाजिक अशांति तथा अपराध उग्रवाद असामाजिक गतिविधि की ओर झुक जाती है, इसलिए चुनौती यह है कि शिक्षा, कौशल विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, रोजगार सृजन में निवेश के माध्यम से जनसंख्या की क्षमता को मानव पूंजी में परिवर्तित किया जाए। कानून व्यवस्था की स्थिति भी जनसंख्या की गतिशीलता से प्रभावित हो जाती है। तीव्र शहरी विस्तार प्रवासन, बेरोजगारी, सामाजिक आर्थिक असमानता, स्थानीय तनाव, सामुदायिक ध्रुवीकरण, संसाधन पर प्रतिस्पर्धा तथा पहचान आधारित संघर्ष को जन्म दे सकती है . पर्यावरण का दबाव भी जनसँख्या की परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। पारिस्थितिकी दृष्टि से संबंधित क्षेत्र में आबादी का अत्यधिक संकेंद्रण प्राकृतिक संसाधन पर दबाव बढ़ा देता है। जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला प्रवासन, शहरी और तटीय क्षेत्र में आबादी संबंधित दबाव तीव्र कर सकता है, इसलिए सतत विकास योजना में आबादी की वास्तविकता को शामिल करना जरूरी है। जनसंख्या की विश्लेषण का उद्देश्य वैज्ञानिक रूप से प्रवृत्ति को समझना और ऐसी नीति बनाना जो समावेशी विकास, सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय प्रगति को बढ़ावा दे, सरकार द्वारा गठित समिति विश्वसनीय आंकड़ा जुटाने, क्षेत्रीय आबादी पैटर्न की पहचान प्रभासन, प्रवृत्ति का आकलन, सीमावर्ती क्षेत्र की संवेदनशीलता का अध्ययन करने व दीर्घकालिक नीतिगत सुझाव देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसे जनसंख्या आंकड़ा प्रणाली को मजबूत करने, मानव विकास को बढ़ावा देने, रोजगार और अवसर में सुधार संतुलित क्षेत्रीय विकास तथा संवेदनशील क्षेत्र में प्रभावी शासन सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत आज एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकी मोड़ पर खड़ा है। आने वाले दशक निर्धारित करेंगे कि देश अपनी जनसंख्या की क्षमता का सफलतापूर्वक उपयोग कर पाता है या अनियंत्रित जनसंख्या की परिवर्तनों से उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक व सुरक्षा संबंधी चुनौती का सामना करता है।

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