भारत के शिक्षा प्रणाली में हो रहे बदलाव का विवेचना करें।
Vinay singh Vinayiasacademy.com
भारत आज एक शैक्षिक विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। एक और देश दुनिया की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और कृत्रिम बुद्धिमत्ता एआई जैसी नई तकनीक के युग में प्रवेश कर रहा है। दूसरी ओर हमारी शिक्षा व्यवस्था अब भी ऐसे विद्यार्थियों को तैयार करने में व्यस्त है जो प्रश्न पूछने से अधिक उत्तर याद रखने में दक्ष हो। हाल ही के वर्षों में नीट जेईई,सीयूईटी, यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षा को लेकर जो माहौल बना है, उसने शिक्षा को लगभग पूरी तरह एक परीक्षा उद्योग में बदल दिया है। लाखों छात्र वर्षों तक कोचिंग संस्थान में बैठकर एक ही लक्ष्य के लिए तैयारी करते हैं। एक परीक्षा पास करना शिक्षा का अर्थ ज्ञान अर्जन से अधिक अंक अर्जन बन गया है। मूल प्रश्न आज भी वही है जो सदी से पहले था कि क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना होना चाहिए या फिर एक ऐसा नागरिक को तैयार करना चाहिए जो समाज विज्ञान, लोकतंत्र और मानवता और भविष्य देश राष्ट्र निर्माण, समाज निर्माण के लिए सोच सकते हैं, शिक्षा का अगर देखा जाए तो दो उद्देश्य होता है आंतरिक और साधनात्मक उद्देश्य आंतरिक उद्देश्य व्यक्ति के विवेक, उसकी संवेदना, उसकी नैतिकता, उसकी कल्पनाशीलता विचारधारा ,उसका आत्मबोध का विकास है, जबकि साधनात्मक उद्देश्य शिक्षा को रोजगार ,आय और आर्थिक उन्नति का माध्यम मानता है। समस्या यहीं से शुरू हो जाती है। जब साधनात्मक उद्देश्य पूरी तरह से शिक्षा के व्यवस्था पर प्रभाव डालने के लिए हावी हो जाता है, तब कोई भी विद्यार्थी यह नहीं पूछता, स्वयं से कि वह क्या समझ रहा है, क्यों पढ़ रहा है? और इसका उद्देश्य क्या है? शिक्षक भी यह नहीं सोचते हैं कि जो पढ़ाया जा रहा है वह क्यों पढ़ाया जा रहा है और इससे राष्ट्र को ,समाज को और उस बच्चे के भविष्य में क्या प्रभाव पड़ेगा? दुनिया तेजी से बदल रही है। एआई अब सेकेंड में वह जानकारी उपलब्ध करा सकती है जिसे याद करने में कोई भी स्टूडेंट कई वर्ष लगा देते हैं। मशीन तथ्य याद रख सकते हैं, गणना कर सकती है और उत्तर खोज सकती है। मनुष्य की विशिष्ट क्षमता का आखिर क्या होगा? निश्चित रूप से रटकर याद रखना नहीं, मनुष्य की वास्तविक शक्ति, उसकी कल्पना, उसका नवाचार, उसका नैतिक निर्णय ,उसकी जटिल समस्या के समाधान में है। हमारी परीक्षा प्रणाली अब भी स्मृति की बुद्धिमत्ता मानने की भूल कर रही है। नीट और जेई जैसी परीक्षा की तैयारी कर रहे लाखों छात्र का जीवन इसका उदाहरण है। छात्र कई वर्ष तक प्रश्न के पैटर्न को याद करते हैं, उसे रटते हैं, संभावित उत्तर का अभ्यास करते हैं। निर्धारित ढांचे के अनुरूप पढ़ाई करते हैं, लेकिन जब उनसे वास्तविक जीवन की किसी समस्या का समाधान पूछा जाता है तो वे मुंह छुपाते हुए नजर आते हैं। असहज महसूस करते हैं, इसका मूल कारण शिक्षा व्यवस्था है क्योंकि ऐसी चीजों की और न तो पैरेंट्स का ध्यान जाता है और न स्कूल एवं कॉलेज का आज बच्चों को दो साल में स्कूल की सीढ़ी पर छोड़ दिया जाता है, सिर्फ parents इसी से खुश रहते हैं कि उनके बच्चे ने आज अंग्रेजी का एक लाइन बोल दिया है. क्या इससे उसके जीवन में कोई प्रभाव पड़ जाएगा? जब तक इसे नहीं सोचा जाएगा। भारत में अंक और प्रमाण पत्र मिलते रहेंगे, लेकिन रोजगार मिलना मुश्किल हो जाएगा। भारत के प्राचीन ज्ञान परंपरा इससे बिलकुल अलग था। उपनिषद में शिक्षा संवाद के माध्यम से होती थी। प्रश्न पूछना एक अधिकार होता था और यह आधार था आर्यभट्ट, चरक, सुश्रुत और पाननी जैसे विद्वान ने इस धारणा को चुनौती देकर नए ज्ञान का निर्माण किया। महात्मा गांधी ने भी नई शिक्षा के माध्यम से इसी विचार को आगे बढ़ाया था।