भारतीय समाज में गृहिणी की योगदान की आर्थिक मूल्य का विश्लेषण कीजिए।
Vinay singh Vinayiasacademy.com
भारतीय समाज में गृहिणी को सदैव परिवार का धूरी माना गया है। वह घर संभालती है, बच्चों का पोषण करती है, बुजुर्गों की देखभाल करती है, परिवार की जरूरत का प्रबंधन करती है और अनेक पर परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए भावनात्मक सहारा भी बनती है, फिर भी उसके श्रम को अक्सर आर्थिक दृष्टि से 0 माना जाता रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गृहणी के योगदान का मूल्यांकन करते हुए उसे प्रति महीने ₹30000 के बराबर मानना केबल एक न्यायिक निर्णय नहीं बल्कि भारतीय समाज की सोच में परिवर्तन का संकेत है। न्यायालय ने कहा कि गृहणियों ने केवल घर को ही नहीं संभाला बल्कि वे राष्ट्र के निर्माता हैं या उस वास्तविकता की स्वीकारुक्ति है जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जाता है। किसी भी राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण इकाई परिवार है, परिवार के सुचारू संचालन में गृहणी की भूमिका केंद्र में है। भारत सहित विश्व के अधिकांश देश में सकल घरेलू उत्पाद की गणना केवल उन गतिविधियों को ध्यान में रखकर किया जाता है जिनका प्रत्यक्ष आर्थिक लेनदेन होता है, घर के भीतर किए जाने वाले श्रम चाहे वह भोजन बनाना हो, बच्चों को शिक्षित करना हो, बुजुर्गों की सेवा करना हो या घरेलू संसाधनों का प्रबंधन करना हो, आर्थिक आंकड़ों में दिखाई नहीं देता है। इस कारण करोड़ों महिलाओं का प्रतिदिन किए जाने वाले श्रमिक को अदृश्य श्रम की श्रेणी में रख दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इसी अदृश्य श्रम को दृश्य बनाने का प्रयास है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि किसी गृहिणी का निधन हो जाता है तो वह दुर्घटना के कारण अपने कार्य करने में असमर्थ हो जाती है तो परिवार को केवल भावनात्मक क्षति ही नहीं होता बल्कि घरेलू सेवा की भारी हानि हो जाती। इन सेवा की पूर्ति के लिए परिवार को घरेलू सहायक देखभाल करने वाले और अन्य पेशेवर सेवा का व्यय करना पड़ता है। ऐसे में गृहिणी के योगदान को आर्थिक मूल्य देना न्यायसंगत और आवश्यक है। यह निर्णय लैंगिक समानता के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. समाज में महिला के कार्य को अक्सर पुरुष के रोजगार की तुलना में कम महत्व दिया जाता है, जबकि गृहणी प्रतिदिन 8 से 12 घंटे तक विभिन्न प्रकार के कार्य में लगी रहती है। तो उनका आर्थिक योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाएगा। प्रश्न है कि क्या केबल दुर्घटना मुआवजा मामले में एक गृहिणी इसको श्रम की मान्यता मिलनी चाहिए या सामाजिक और आर्थिक नीति में भी इसकी उचित गणना की जानी चाहिए। यह समय की मांग है, सरकार और नीति निर्माता घरेलू श्रम के मूल्यांकन पर गंभीरता से विचार करें। महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा पेंशन बीमा अन्य कल्याणकारी योजना को दृष्टिकोण से परिभाषित करने की जरूरत है, हालांकि इस निर्णय को केवल महिला तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। आधुनिक समाज में ऐसे अनेक पुरुष भी है जो पुणकालिक रूप से घरेलू जिम्मेदारी के लिए वहन करते हैं, इसलिए घरेलू श्रम का मूल्यांकन के आधार पर नहीं खर्च, के आधार पर किया जाना चाहिए। इससे समाज में श्रम के प्रति सम्मान की भावना और अधिक मजबूती होगी। न्याय पालिका ने इससे पूर्व भी कई अवसर पर गृहिणी की योगदान को महत्वपूर्ण बताया, किंतु इस बार आर्थिक मिलकर स्पष्ट निर्धारण एक नया मानक स्थापित करता है। भविष्य में मोटर दुर्घटना दावा नहीं अधिकरण, अन्य न्यायिक मंच को अधिक यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करेगा, घरेलू कार्ड फ्री में नहीं होता है। ज़िम्मेदारी इसके लिए तैयार हुई बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला यह श्रम है. जब देश का सुप्रीम कोर्ट गृहणी को राष्ट्रमार्ग की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण अंग घोषित करता है, तभी समाज का आत्ममंथन का अवसर देता है। क्या हम अपने घरों में महिलाओं के योगदान को पर्याप्त सम्मान देते हैं? क्या हम घरेलू कार्य को केवल कर्तव्य मानते हैं या उन्हें श्रम के रूप में स्वीकार करते हैं? इन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। गृहिणी के श्रम का मूल की अभी रुपये पैसे से नहीं आंका जा सकता. उसका उदार परिवार के संस्कार बच्चों का व्यक्तिगत निर्माण बुजुर्ग की सुरक्षा सामाजिक स्थिरता में दिखा देता है। फिर भी, आर्थिक मान्यता एक महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि आधुनिक समाज में मूल्यांकन के प्रमुख आधार आर्थिक योगदान ही माना जाता है।