पीओके में चल रहा आंदोलन क्या है और इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
Vinay singh Vinayiasacademy.com पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पीओके में चल रहा आंदोलन 19 47 के बाद से इस क्षेत्र में पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी समस्या के रूप में है। पहली नजर में यह विवाद विधानसभा की 45 में से 12 सीट के आरक्षण का मुद्दा प्रतीत होता है, जो उन शरणार्थी के लिए सुरक्षित है। जो विभाजन के बाद भारतीय तृणमूल कश्मीर से पाकिस्तान चले गए थे किन्तु यह पूरा सच नहीं है, इसका मुख्य कारण राजनैतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक उपयोग, क्षेत्रीय पहचान और पाकिस्तान की सैन्य राजनीतिक व्यवस्था की अत्यधिक हस्तक्षेप के विरुद्ध वर्षों से जमा होते आ रहे असंतोष का विस्फोट है। पाकिस्तान की इस व्यवस्था के विरुद्ध भीतर से उठी हुई चुनौती है। इसने लंबे समय से इस क्षेत्र को अपने सामरिक हितों के अनुरूप संचालित किया है। अगर तत्कालिक कार्य को देखें तो यहां पर विधानसभा में 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की मांग है। ये सीटें उन शरणार्थियों के आरक्षित जो भारतीय जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान के हिस्सेों में बस गए थे, पाकिस्तान का तर्क है कि व्यवस्था कश्मीर के पूरे भाग पर उसके दावे को मजबूत करती है और विस्थापित कश्मीरी को राजनीतिक प्रतिनिधि प्रदान करती है, पर पीओके के स्थानीय निवासी की दृष्टि में व्यवस्था लोकतांत्रिक अधिकार के हनन का प्रतीक बन चुका है। उनका कहना है कि विधानसभा की लगभग 1/4 सीट पर ऐसे लोग क्यों चुने जाएं जो न तो इस क्षेत्र में रहते हैं ना ही यहां के लोगों की समस्या से उनका सीधा संबंध है। पीओके के सर्वोच्च न्यायालय ने इन सीटों को संवैधानिक सदस्य प्राप्त बताते हुए कहा कि वे समाप्त करने के लिए संविधानी संशोधन जरूरी होगा, पर स्पष्ट है कि यह केवल कानूनी प्रश्न नहीं बल्कि यह गहरा राजनीतिक संकट है। मुजफ्फराबाद और रावला कोर्ट में हजारों लोगों का सड़कों पर उतरना प्रतिबंध, गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन का जारी रहना इसका प्रमाण है। यह मुद्दा जनता के मन में गहरी जगह बना चुका है। इस आंदोलन के केंद्र में जम्मू-कश्मीर संयुक्त अमामी एक्शन कमिटी है, जिसका गठन 2023 में हुआ था। आरंभ में यह संगठन बढ़ती बिजली दर, गेहूं पर सब्सिडी और भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन के रूप में उभरा था पर धीरे-धीरे इस आंदोलन में राजनीतिक प्रश्न उठाए जाने लगे। यह भी संगठन राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संस्थागत सुधार और क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांग कर रहा है। यह परिवर्तन दर्शाता है कि आर्थिक संकट में लोगों की व्यवस्था की मूल संरचना पर प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित किया है। विडंबना यह है कि पाकिस्तान लंबे से स्वयं को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरी के अधिकार का सबसे बड़ा समर्थक बताता रहा है। आत्मनिर्भरता के अधिकार की भाषा उसकी कश्मीर नीति का केंद्रीय तत्व रही है किंतु आज पीओके से जो तस्वीरें सामने आ रही है, बिलकुल अलग कहानी कहती है हजारों लोग सरकार के विपरीत प्रदर्शन कर रहे हैं. सुरक्षा बलों की की भारी तैनाती की गई है। इंटरनेट सेवा बंद किया जा रहा है, गिरफ्तारी हो रही है और मानवाधिकार संगठन द्वारा अधिक बल के प्रयोग के आरोप लगाए जा रहे हैं। वर्ष 2023 और 2024 के आंदोलन में बिजली की ऊंची दर और सब्सिडी वाले गेहूं की कमी प्रमुख मुद्दा था, तब लोगों ने सवाल उठाया था कि जिन क्षेत्र में विशाल जल विद्युत परियोजना है ,जहां से पाकिस्तान को बिजली मिलती है वहां के लोगों को ही महंगी बिजली क्यों खरीदना पड़ता है ? मंगला बांध जैसे परियोजना के कारण हजारों लोग विस्थापित हुए उन्हें भी लाभ नहीं मिला है।

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