परिसीमन विधेयक पर चर्चा करें और यह बताएं कि क्या भारत के लिए परिसीमन लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव के लिए जरूरी है,
Vinay singh Vinayiasacademy.com
संसद में विभिन्न सत्र में परिसीमन विधेयक को लाया गया है और पुनः लाया जाएगा। ऐसा करने के पीछे मजबूत संवैधानिक और लोकतांत्रिक तर्क मौजूद है। लोकतांत्रिक व्यवस्था समय समय पर चुनावी क्षेत्र का पुनर्निर्धारण करती है ताकि प्रतिनिधित्व व्यापक रूप से जनसंख्या की वास्तविकता के अनुरूप बना रहे लोकतंत्र का आधार यह सिद्धांत है कि प्रत्येक नागरिक के वोट का महत्व समान होना चाहिए। समय के साथ जनसंख्या में बदलाव निर्वाचन क्षेत्र में विसमता पैदा कर चुका है। कुछ सांसद दूसरों की तुलना में बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। पिछली बार बड़ी परिसीमन प्रक्रिया 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया था, हालांकि लोकसभा में सीटों की संख्या को स्थिर रखा गया था तब से भारत की जनसंख्या में व्यापक बदलाव आया है। शहरीकरण तेज से हुआ है। प्रवास के पैटर्न को अगर देखा जाए तो जनसांख्यिकी स्वरूप को बदल दिया गया है। भारत में क्षेत्रीय इलाके में भी नए आर्थिक केंद्र उभरे हैं। कई स्थान पर निर्वाचन क्षेत्र की सीमा का अब मौजूदा वास्तविकता को प्रतिबिंबित नहीं करती है, जनसंख्या राजनीतिक शक्ति संघीय ढांचा की सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता के बीच एक नाजुक संतुलन को प्रभावित करता है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा परिवार नियोजन में भारी निवेश किया है। इसकी जनसंख्या वृद्धि स्थिर हो चुकी है। इसके साथ ही यह राज्य राष्ट्रीय विकास और कर राजस्व में प्रमुख योगदान के रूप में उभरे हैं। यदि परिसीमन केबल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है तो संसद में इन राज्यों का राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा। उत्तर भारत के वैसे राज्य, जहां जनसंख्या वृद्धि अधिक है, अनुपातिक रूप से अधिक प्रतिनिधित्व हासिल करेंगे। यह धारणा पूरी तरह उचित है या नहीं, यह अलग बात है। राजनीति केवल तथ्यों पर आधारित नहीं होती। यह मनोविज्ञान पर भी आधारित होती है। कोई भी लोकतांत्रिक बदलाव उन भावनात्मक संबंध को कमजोर करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए जो देश की एकता को एकजुट रखते हैं, लेकिन क्या परिसीमन को नई जनगणना के बिना आगे बढ़ाना उचित होगा? परिसीमन मूल रूप से जनसंख्या आधारित प्रक्रिया ही तो होता है. यह सटीक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है तो किसी भी प्रक्रिया की शुरुआत से पहले नवीन और विश्वसनीय आंकड़ा उपलब्ध होना चाहिए। जनगणना प्रक्रिया पूरी हुए बिना परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करना इस आरोप को जन्म देगा कि यह अधूरी या पुराने आंकड़ों पर ही आधारित है। परिसीमन बस सीटों की संख्या से जुड़ा विषय नहीं है। इसमें यह भी तय करना है कि निर्वाचन क्षेत्र की सीमा कहां होगी, ऐसे फैसले चुनाव परिणाम को गहराई से प्रभावित करेंगे, इसलिए जिम्मेदारी के लिए नियुक्त संस्था की विश्वसनीयता पर सभी का भरोसा होना आवश्यक हो जाता है। यह सभी कारण से जरूरी है कि सरकार सभी दलों के साथ चर्चा के माध्यम से परिसीमन प्रक्रिया सहमति बनाए। एक संभावना यह हो सकती है। कैसे कई चुनावी चक्र में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए जिससे कि राजनीतिक व्यवस्था और जनमत को धीरे-धीरे समायोजित होने का अवसर मिलेगा? एक अन्य विकल्प किसी प्रकार का वेटेड रिप्रेजेंटेशन हो सकता है। यदि इससे सूझबूझ से करें तो यह लोकतांत्रिक सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होगा, दुनिया के देश अक्सर जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व के साथ ऐसे तंत्र को अपनाते हैं जो क्षेत्रीय हित की भी रक्षा करते हैं। जैसे कि अमेरिका की सीनेट में भी जनसंख्या के अलावा बिना राज्यों को समान प्रतिनिधित्व दिया गया है, जर्मनी का भी इसी तरह से संघीय संतुलन के तंत्र को समाहित करता है।भारत को इन मॉडल को नकल तो नहीं करना चाहिए, लेकिन वह निश्चित रूप से इनके पीछे मौजूद मूल विचारधारा से सीख सकता है।उद्देश्य होना चाहिए कि जो राज्य विकास के लक्ष्य को हासिल कर चुके हैं, वे राजनीतिक रूप से नुकसान की स्थिती में न पहुंचे।यह अधिक उचित होगा कि विधेयक को संसद की सिलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए ,जहां सभी की मौजूदगी में इस पर आगे चर्चा किया जाए।देश ने बार बार साबित भी किया है कि कठिन प्रशासन का कठिन प्रश्न का समाधान संवाद, समायोजन और आपसी सम्मान के माध्यम से किया जा सकता है