भारत में इथेनॉल मिश्रण के प्रयोग से होने वाले प्रभाव का समालोचना प्रस्तुत करें। इस पर चर्चा कीजिए।
Vinay singh Vinayiasacademy.com
भारत का एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम पिछले एक दशक में तेजी से विकसित हुआ है जो प्रयास शुरू में पेट्रोल में सीमित मात्रा में ethanol मिलाने तक सीमित था, वह अब देश की ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ गतिशीलता रणनीति के प्रमुख स्तंभ बन चुका है। लगभग 20 फीसदी एथनॉल मिश्रण का लक्ष्य भारत ने हासिल कर लिया है। इसका मुख्य उद्देश्य कच्चे तेल के आयात को कम करना है। इससे विदेशी मुद्रा में 1 .84 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुआ है। इस प्रकार, एथनोल मिश्रण को पेट्रोल की खपत कम करने, विदेशी मुद्रा का बहिवाह को घटाने, घरेलू ईंधन, लचीलापन बढ़ाने और ग्रामीण आय में अतिरिक्त वृद्धि करने के रणनीतिक साधन के रूप में पेश किया गया है। आज देश का एथेनॉल तंत्र मुख्य रूप से प्रथम पीढ़ी के फिड स्टोक्स, खासकर गन्ना, मक्का और टूटे हुए चावल पर आधारित है। इस कार्यक्रम से गन्ना और मक्का किसानों को लाभ भी हुआ है। उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्से में डिस्टलरियों की बढ़ती औद्योगिक मांग के कारण मक्के की खेती का विस्तार हुआ है। एथेनॉल, ऊर्जा सुरक्षा, ग्रामीण आय सृजन और कृषि बाज़ार स्थिरता का पर्याय है। इन लाभ के बावजूद, वाहन उपयोगकर्ता द्वारा अक्सर ईंधन दक्षता और इंजन पर ईंधन मिश्रण के प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है। चूंकि एथनॉल का ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कम होता है, इसलिए अधिक एथनॉल मिश्रण वाले ईंधन से वाहन की माइलेज कम होने की रिपोर्ट मिली है, खासकर उन वाहन में जो कि अनुकूल नहीं है। इस संदर्भ में हाल ही में जारी एफएफवी अधिसूचना एक महत्वपूर्ण कदम है। ये वैसे वाहन होते हैं जो ई 20 से ई 100 तक के एथनॉल मिश्रण पर चल सकते हैं और उपभोक्ता को किसी एक मिश्रण तक सीमित नहीं करते इलेक्ट्रिक वाहन शहरी परिवहन और कम दूरी की यात्रा के लिए महत्वपूर्ण पर इनका सभी क्षेत्र में समान रूप से उपयुक्त होना संभव नहीं है, लंबी दूरी के माल परिवहन, ग्रामीण परिवहन, कृषि मशीनरी और कमजोर चार्जिंग और सूचना वाले क्षेत्र में निकट भविष्य तक तरल ईंधन को जरूरत बनी रह सकती है। अधिक मिश्रण हमारी जीवाश्म तेल उपभोग और विदेशी मुद्रा के बहिरवाह को कम कर सकता है, पर चर्चा को केवल मिश्रण तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसे इस बदलाव के व्यापक पर्यावरण और आर्थिक प्रभाव तक विस्तारित करना होगा। गन्ना देश में उगाई जाने वाली सबसे अधिक पानी की खपत वाली फसल में एक है और इसे अक्सर उन क्षेत्र में उगाया जाता है जहां पहले से भूजल पर दबाव है इसकी खेती में सिंचाई के लिए सब्सिडी बिजली दी जाती है और उच्च उर्वरक भी जरूरी है। मक्के की खेती में गन्ने की तुलना में पानी की खपत कम है, फिर भी एथनॉल की मांग बढ़ने के साथ ईंधन अर्थव्यवस्था का महत्व है। महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत का एथनॉल परिवर्तन आयातित जीवाश्म तेल पर निर्भरता की सब्सिडी ,पानी, बिजली और आयातिक उर्वरक निर्भरता में बदल रहा है, यद्यपि एथनॉल वाहन के एग्जॉट से निकलने वाले उत्सर्जन को कम कर सकता है, पर इसके जलवायु लाभों का मूल्यांकन केवल दहन चरण के आधार पर नहीं किया जा सकता है। इसके संपूर्ण उत्पादन श्रृंखला पर ध्यान देने की जरूरत है। इसमें उर्वरक उपयोग, भूजल दोहन, सिंचाई के लिए बिजली की खपत, परिवहन डिस्टिलेशन के लिए ऊर्जा फिड स्टॉक उत्पादन से जुड़े भूमि उपयोग परिवर्तन और मूल्य श्रृंखला में होने वाले उत्सर्जन जैसे घटक शामिल होने चाहिए, एक बड़ी चिंता कृषि पैटर्न पर दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर है। यदि एथोनॉल की मांग गन्ना और मक्का की खेती को लगातार प्रोत्साहित करती रही, तो फसल विविधीकरण और मिट्टी की स्थिरता का क्या होगा? एकल फसल प्रणाली का विस्तार अल्पकाल में किसानों की आय बढ़ा सकता है, पर समय के साथ परिस्थिति स्थिरता को कमजोर कर सकता है और संसाधन पर दबाव बढ़ा सकता है. जिसका प्रभाव उन्हीं किसानों पर पड़ेगा जो इन फसल की खेती कर रहे हैं। इसमें खाद्य सुरक्षा का भी अंतर्निहित पहलू है। अभी अधिशेष गन्ना या टूटे हुए चावल को एथनॉल उत्पादों के लिए उपयोग किया जा रहा है। समय के साथ या कृषि प्रदेश को इस प्रकार बदल सकता है कि खाद्य सुरक्षा भोजन उपयोग और क्षेत्रीय परिस्थिति की प्रभावित हो सकती है। ऐसे में भारत को द्वितीय पीढ़ी के जैव ईंधन को प्राथमिकता देनी चाहिए। भारत करीब 500000000 टन कृषि अवशेष उत्पन्न करता है, जिसका बड़ा हिस्सा जला दिया जाता है। इससे गंभीर वायु प्रदूषण होता है। फसल अवशेष, नगर निगम कचरा और गैर खाद जैव को एथोनॉल में प्रवर्तित करना प्रथम पीढ़ी के फिड स्टॉक्स के विचार की तुलना में अधिक टिका हुआ है। वर्तमान नीति का समर्थन में अब भी प्रथम पीढ़ी और संरचना के तेज विस्तार के पक्ष में है। इससे भारत लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है और विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को कम कर सकता है, पर इससे देश एक ऐसे संसाधन गहन जैव ईंधन मार्ग में फंस सकता है जिसका मिट्टी और भूजल पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा। उद्देश्य केवल पेट्रोल में एथनॉल % बढ़ाना ऐसा नहीं होना चाहिए। देश की ऊर्जा सुरक्षा के वास्तव में टिकाऊ और निम्न कार्बन ईंधन तत्काल का निर्माण होना चाहिए। हमारे इथेनॉल कार्यक्रम ग्रामीण आय बढ़ाने में सहायक है, लेकिन यदि दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है, इस बदलाव का मूल्यांकन व्यापक प्रणालीगत दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। कार्बन उत्सर्जन में कमी के दावों को केवल मिश्रण किया आधार पर नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन चक्र आकलन द्वारा समर्थित होना चाहिए। सफलता का मापदंड यह नहीं होगा कि मिश्रण % कितना तेजी से बढ़ते, बल्कि यह होगा कि निर्मित किया जा रहा तंत्र आगे आर्थिक और पारिस्थितिक दृष्टि से कितना टिकाऊ होता है।