अलनीनो क्या है? यह सुपर alnino से कैसे अलग है, इसका भारत में क्या प्रभाव पड़ता है।
Vinay singh Vinayiasacademy.com
अल् नीनो एक गरम जलधारा है जो प्रशांत महासागर में पेरू के तट पर उत्पन्न होता है। यह विश्वत रेखिय गर्म जलधारा है जो अक्सर हिंद महासागर में आता है लेकिन अगर यह प्रशांत महासागर में ही रह जाता है तो इससे हिंद महासागर का जल ठंडा रह जाता है और इससे भारत की मॉनसून प्रभावित हो जाती है। इन दिनों सुपर एलनीनो शब्द चर्चा में है जो अत्यधिक तापमान भारत में बढ़ा देता है और जिसके कारण मॉनसून इतना कमजोर हो जाता है कि सामान्य से लगभग 70 से लेकर 80% औसत वर्षा घट जाती है, सामान्य से बहुत अधिक शुष्क परिस्थिति या सूखा पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन ने भारत को उन देश में शामिल किया है जो कृषि सूखा के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील है। आईआईटी, गांधीनगर द्वारा संचालित नेशनल ड्राट मॉनिटर के अनुसार जून महीने में भारत के 40% क्षेत्र में सूखा पड़ने की संभावना है। देश का पश्चिमी हिस्सा जिसमें महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक के हिस्से शामिल है, वहां सूखे की स्थिति लगभग 80% है, मध्य भारत में 50% और पूर्वोत्तर भारत में 65% है। उत्तर भारत में यह 40% है।
भारत में खरीफ फसल को सबसे अधिक इसका असर देखने को मिलता है क्योंकि देश का करीब 50% वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन का योगदान इसी से है। इस अवधि में देरी या असमान वर्षा ने देश के कई हिस्सों में किसान के बुवाई, निर्णय और फसल चयन को प्रभावित भी कर दिया है। चावल, दाल, तिलहन, मक्का और कपास खरीफ फसल है जो ग्रामीण आय का मजबूत आधार है जब मानसून कमजोर होता है तब इससे अधिक असर इन्हीं फसल और इनकी उत्पादक पर पड़ता है। सुपर alnino की चेतावनी पहले से कम वर्षा ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को चिंतित किया है। भारत सरकार के द्वारा देश में 111 जिले को उच्च जोखिम और प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है। ऐसे क्षेत्र में आईएमडी द्वारा पहले से अनुमानित कमजोर मानसून तथा 25% से कम सिंचाई कवरेज। इनमें से अधिकांश जिले 12 राज्य में हैं जो निम्नलिखित हैं मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा। इसका असर रबि फसल तक चला जाता है, जो मुख्य रूप से जलाशय और भूजल पर निर्भर करता लगातार वर्षा की कमी जलाशय और मिट्टी की नमी को अगले फसल चक्र तक प्रभावित कर देती है। इसलिए भारत का दाल और तिलहन पर भी इसका चुनौतीपूर्ण प्रभाव पड़ेगा क्योंकि इन फसल का लगभग 90% क्षेत्र वर्षा पर आधारित है। वर्ष 2002 में मध्यम अल् निनो के कारण राष्ट्रीय वर्षा में 20 फीसदी की कमी आई और खाद्यान्न उत्पादन करीब 1 .8 करोड़ टन घट गया। वर्ष 2015 में मजबूत अल् निनो के बावजूद वर्षा 14 फीसदी घट गई। राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य उत्पादन में बड़ी गिरावट नहीं आई। भारत ने हाल के वर्ष में रिकॉर्ड कृषि उत्पादन देखा है, पर मजबूत अल् निनो, स्थानीय स्तर पर संकट पैदा कर सकता है। इससे निपटने के लिए आकस्मिक योजना में प्रत्येक जिले की सिंचाई क्षमता, मिट्टी का प्रकार, फसल पैटर्न और भूजल उपलब्धता का विवरण होना चाहिए। किसानों के लिए चरणबद्ध उपाय भी होने चाहिए जैसे यदि अगस्त में बारिश विफल हो जाए तो खरीफ फसल के लिए सबसे महत्वपूर्ण महीना है तो क्या किया जाना चाहिए. किन विकल्प फसल की ओर रुख किया जाए ,जैसे घरेलू आपूर्ति कम हो तो आयात कहां से किया जाए, इसका एक समाधान मोटे अनाज में भी है जो कठोर सुखा सहनशील और पोषक होता है, लेकिन जलवायु लचीली फसल के की और बदलाव केवल किसानों पर नहीं छोड़ा जा सकता है क्योंकि उनमें से कई पहले से ही सीमित संसाधन पर निर्भर है। सरकार को इन फसल के बीज वितरित करने चाहिए उचित मूल्य पर, देने और किसान को बाज़ार जोखिम से बचाने की जरूरत है।