Polity – Vinay IAS Academy https://vinayiasacademy.com Rashtra Ka Viswas Sat, 18 Jul 2020 16:47:46 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=5.3.4 विसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम, समान अवसर आयोग, प्ली बारगेनिंग ,राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम 2014 ,कॉलेजियम सिस्टम से संबंधित प्रश्न https://vinayiasacademy.com/?p=2766 https://vinayiasacademy.com/?p=2766#respond Sat, 18 Jul 2020 14:56:52 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2766 Share it1.विसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम क्या है? 2. समान अवसर आयोग क्या है ? 3.सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सामाजिक न्याय पीठ की स्थापना की गई है इसका उद्देश्य क्या है? 4.प्ली बारगेनिंग से आप क्या समझते हैं? 5.कोर्ट स्टेटस, कोर्टनिक जुडिस, कॉज लिस्ट क्या होता है? 6.राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम 2014 में क्या प्रावधान किए गए […]

The post विसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम, समान अवसर आयोग, प्ली बारगेनिंग ,राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम 2014 ,कॉलेजियम सिस्टम से संबंधित प्रश्न appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

1.विसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम क्या है?
2. समान अवसर आयोग क्या है ? 3.सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सामाजिक न्याय पीठ की स्थापना की गई है इसका उद्देश्य क्या है?
4.प्ली बारगेनिंग से आप क्या समझते हैं?
5.कोर्ट स्टेटस, कोर्टनिक जुडिस, कॉज लिस्ट क्या होता है?
6.राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम 2014 में क्या प्रावधान किए गए हैंं?
7.कॉलेजियम सिस्टम क्या है इसे किस प्रकार से विवादों को रोका जा सकता है?


Vinayiasacademy.com जैसा कि हम जानते हैं भारत में अलग-अलग क्षेत्र में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ता जा रहा है अनेक कोशिश के बावजूद भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना मुश्किल हो रहा है सूचना के अधिकार के द्वारा भ्रष्टाचार की जानकारी तो प्राप्त हो जाती है लेकिन भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले लोगों की जान भी खतरे में होती है इसे देखते हुए विसलब्लोअर से जुड़ा एक मामला जिसे विसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम 2011 के नाम से जाना जाता है ,इसे वर्ष 2014 में अपना लिया गया। भ्रष्टाचार सार्वजनिक करने वाले लोगों को बचाने की योजना है और इसी योजना के द्वारा यह किया गया कानून जनता को मंत्री और लोक सेवक द्वारा अधिकारों का जानबूझकर दुरुपयोग करने के लिए नहीं बोलते हैं बल्कि वह बताता है
Vinayiasacademy.com अगर किसी व्यक्ति के द्वारा भ्रष्टाचार सार्वजनिक करने के लिए को सूचना दी जाती है तो इसका दुरुपयोग करने वाले लोगों को जेल की सजा होगी और व्यक्ति का नाम गुप्त रखा जाएगा केंद्रीय सतर्कता आयोग के द्वारा भी शिकायत को प्राप्त करने के लिए कई नियम जारी किए गए हैं कानून में किसी भी झूठी या फर्जी शिकायत अगर किया जाता है तो फिर फर्जी शिकायत करने वाले को 2 वर्ष की सजा हो सकती है यह प्रणाली अमेरिका से लिया हुआ है इसमें कुल 31 धारा दिया गया है जिसके द्वारा व्यक्ति के अधिकार जीवित रहते हैं
Vinayiasacademy.com


समान अवसर आयोग- मुसलमान समुदाय के द्वारा सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर गठित एक कमेटी बनी थी जिसका नाम था सच्चर कमेटी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि मुसलमान जनसंख्या लगभग 19% की है लेकिन नौकरी में सिर्फ 3% तक मुसलमान जनसंख्या के लोग कार्यरत है इसलिए इस समुदाय को और अधिक आगे लाने के लिए सच्चर कमेटी ने बताया था ।इस कमेटी में 3 सदस्य हैं। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायधीश अध्यक्ष होंगे ।विभिन्न नौकरी में सभी धर्म और जाति के लोगों को एक समान अवसर मिले यह इसकी जांच करेगा। यह आयोग वर्ष 2014 में बना था। जिसमें अवसर के आधार पर सभी धर्म के लोगों को बराबर की हिस्सेदारी दी जाए।
Vinayiasacademy.com सर्वोच्च न्यायालय में प्रत्येक केस की स्थिति क्या है। इसकी जानकारी कोई भी व्यक्ति कंप्यूटर के माध्यम से ले सकता है। इसे ही कोर्टनिक कहा जाता है तथा सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर प्रतिदिन दोनों पक्ष के अधिवक्ता जो न्यायालय में निर्मित व लंबित मामले की स्थिति बताई जाती है इसकी जानकारी देने की प्रक्रिया को कोर्ट स्टेटस कहते हैं।vinayiasacademy.com हाल के वर्षों में प्ली बारगेनिंग चर्चा में है प्ली बारगेनिंग का अर्थ होता है दो पक्षों के बीच समझौता का होना ।व्यवस्था से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में चल रहे मुकदमे को कम किया जा सकता है। यानी कि अगर दो पार्टी आपस में मिलकर यह समझौता कर ले कि वह केस को वापस लेंगे तो दिक्कत समाप्त हो जाएगी। अगर अपराधी को कम सजा दिया जाएगा तो वह अपना अपराध स्वीकार कर सकता है इसलिए प्ली बारगेनिंग को अधिक महत्व दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य है धन का बचत करना ,धन बचत करना ,अदालत के ऊपर से भार को घटाना। अपराधिक विधि संशोधन अधिनियम 2005 में इसे पारित किया गया था। इसमें अधिकतम 7 वर्ष का कारावास हुआ है वैसे कानून पर वैसे अपराध पर इसे लागू कर सकते हैं। यह महिला और बच्चों के खिलाफ अपराध में लागू नहीं होगा vinayiasacademy.com सामाजिक न्याय पीठ- 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने सामाजिक मामला, महिला ,बच्चे एवं समाज के पिछले तबके से संबंधित मामले की सुनवाई करने के लिए और जल्द से जल्द न्याय दिलवाने के लिए सामाजिक न्याय पीठ की स्थापना की है ।इसे सोशल जस्टिस बेंच कहा जा रहा है।

इसके द्वारा समाज में ऐसे मामले विशेष शीघ्र ही निपटारा करना जरूरी है। इन सारी चीजों के लिए ही न्यायालय ने अपनी सक्रियता दिखाई है। भारतीय संविधान की आदर्श शुरू में ही सामाजिक न्याय की कल्पना की गई है। राज्य के नीति निदेशक तत्व एवं प्रस्तावना में इसे बताया गया है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सामाजिक न्याय पीठ के द्वारा इन चीजों को सामने लाया जा रहा है जो मामले कई वर्षों तक रुके हुए हैं। आम लोगों के लिए समस्या का सबब बन जाते हैं ।ऐसे मामलों को जल्द से जल्द निपटाना चाहिए जैसे सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हाल में दिए गए निर्णय में कहा है कि भूख से कोई मौत नहीं होनी चाहिए फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया का सारा अनाज कभी चूहा खा जाता है कभी सड़ जाता है ।वही सूखे से निपटने के लिए सरकार की रणनीति के तहत अनाज बांटना जरूरी है लेकिन अनाज सड़ जाता है गरीबों को नहीं दिया जाता है ऐसे में न्याय कैसे होगा जो गरीब परिवार है,vinayiasacademy.com जो बेघर है देश के ऐसे लोग जहां तक सरकार की विकास के कार्यक्रम नहीं पहुंचते हैं उन्हें जल्द से जल्द समय दिया जाना चाहिए यही कारण है कि शुक्रवार को दोपहर 2:00 बजे का समय सामाजिक समस्या से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए निर्धारित किया गया है
Vinayiasacademy.com कॉलेजियम सिस्टम- संविधान के अनुच्छेद 124 के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भारत के मुख्य न्यायाधीश से सलाह लेने के बाद राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं। अनुच्छेद 217 के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है। सरकार द्वारा मुख्य न्यायाधीश की सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं है जैसा कि हम जानते हैं कि राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद सलाह देती है

मंत्री परिषद एवं vinayiasacademy.com प्रधानमंत्री की सलाह से ही राष्ट्रपति की नियुक्ति करते हैं लेकिन क्या वरिष्ठ न्यायधीश को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाना होगा ।समय-समय पर इसे लेकर भी विवाद होता रहा है, 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय देकर वरिष्ठ को ही बनाना जरूरी है इससे ही कॉलेजियम सिस्टम की शुरूआत हो गई। सुप्रीम कोर्ट में जजों का एक समूह होगा जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जज की नियुक्ति करेगा 1998 में बनाई गई जो कार्यपालिका के बाद जज की नियुक्ति की सिफारिश की जाती है ।सरकार के द्वारा जो नाम सुझाया जाता है ।उनमें से ही करेगी यदि नहीं है तो उसे विचार के लिए कॉलेजियम के पास भेज सकती है। एक बार ही होगा दोबारा उसी को भेज देता है तो सरकार उसके अनुशंसा करने के लिएvinayiasacademy.com बाद होगी यह प्रक्रिया को इतनी गोपनीय रखा जाता है कि प्रधानमंत्री के अलावा किसी को भी पता नहीं चलता है। इसमें प्रधानमंत्री और कानून मंत्री भी रहते हैं । जब संविधान में ऐसा लिखा हुआ नहीं है कि वरिष्ठ बनेंगे तो इसे लेकर 1973 ईस्वी में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी, vinayiasacademy.comउन्होंने अजीत नाथ राय को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया। वरिष्ठता में चौथे नंबर पर थे ऐसे में तीन न्यायाधीशों ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसी प्रकार से जब सर्वोच्च न्यायालय में हीरालाल जी केनिया की मृत्यु हो गई तो पतंजलि शास्त्री को नियुक्ति को लेकर भी आश्वस्त थे लेकिन सरकार उन्हें बनाना नहीं चाहती थी ऐसे में कई जज ने यह कहा कि वह इस्तीफा दे देंगे तो फिर पतंजलि शास्त्री को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया गयाvinayiasacademy.com


Share it

The post विसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम, समान अवसर आयोग, प्ली बारगेनिंग ,राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम 2014 ,कॉलेजियम सिस्टम से संबंधित प्रश्न appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2766 0
सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार https://vinayiasacademy.com/?p=2758 https://vinayiasacademy.com/?p=2758#respond Fri, 17 Jul 2020 14:59:03 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2758 Share it: सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार की चर्चा करें प्रारंभिक क्षेत्राधिकार एवं अन्य क्षेत्राधिकार को भी बताएं- Vinayiasacademy.com संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय होगा ।इसका मतलब यह होता है इसके समक्ष निर्णय को रिकॉर्ड के रूप में रखा जाएगा और प्रमाणिकता के साथ माना जाएगा ।सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य […]

The post सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

: सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार की चर्चा करें प्रारंभिक क्षेत्राधिकार एवं अन्य क्षेत्राधिकार को भी बताएं-
Vinayiasacademy.com संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय होगा ।इसका मतलब यह होता है इसके समक्ष निर्णय को रिकॉर्ड के रूप में रखा जाएगा और प्रमाणिकता के साथ माना जाएगा ।सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य रूप से तीन प्रकार के कार्य करने के अधिकार है। पहला संघ और राज्य के बीच जो विवाद होता है उस विवाद का समाधान निकालना ,दूसरा संविधान की व्याख्या करना और तीसरा अपील के क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय को यह देखना कि क्या यह अपील सही रूप से किया गया है ।अगर सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को देखा जाए तो प्रारंभिक क्षेत्राधिकार, अभिलेखों क्षेत्राधिकार ,अपीलीय क्षेत्राधिकार, परामर्श क्षेत्राधिकार, आवृत्ति संबंधित क्षेत्राधिकार
Vinayiasacademy.com अनुच्छेद 131 के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय संघ एवं एक राज्य या एक से अधिक राज्य के बीच किसी भी प्रकार का विवाद हो जैसे की नदी जल बंटवारे का ,सीमावर्ती क्षेत्र का, प्रशासनिक क्षेत्र का तो इसका निपटारा कर सकता है। दूसरा भारत का संघ और कोई एक राज्य अगर एक और से है तथा वह दूसरे राज्य को परेशान कर रहा है तो यह मामला भी सर्वोच्च न्यायालय के अंतर्गत आता है ।कभी-कभी दो राज्य दो से अधिक राज्य के बीच विभिन्न चीजों को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाता है यह मामला भी सर्वोच्च न्यायालय का प्रारंभिक क्षेत्राधिकार है। जब कभी सर्वोच्च न्यायालय में प्रारंभिक क्षेत्राधिकार के प्रश्न पर मुक़दमा हो जाता है तो सर्वोच्च न्यायालय यह देखता है कि इसमें किसी भी कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं हुआ है। उसके बाद ही उस मामले को लिया जाता है


Vinayiasacademy.com नागरिकों के मौलिक अधिकार के मामले में राज्य का उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय दोनों को एक जैसे अधिकार दिए गए हैं अनुच्छेद 32 में मूल अधिकार के उल्लंघन के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय जाया जा सकता है सर्वोच्च न्यायालय इसके लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण परमादेश प्रतिषेध अधिकार परीक्षा एवं उत्प्रेषण प्रकार का लेख है जिसे जारी कर सकता है अगर अनुच्छेद 32 के द्वारा मूल अधिकार को नष्ट किया गया ऐसा लगता है तो सर्वोच्च न्यायालय फिर से एक बार मूल अधिकार को जीवित कर सकती है उदाहरण के रूप में जम्मू कश्मीर में इंटरनेट की सेवा बहाल करना दिल्ली में शाहीन बाग में धरना देने को सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकार तो बताया साथ ही यह भी बताया कि किसी व्यक्ति को आने-जाने में तकलीफ ना हो यह भी दूसरे व्यक्ति का मौलिक अधिकार है
Vinayiasacademy: यहां यह भी जानना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय प्रारंभिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत किसी व्यक्ति के द्वारा अगर सरकार के विरुद्ध मुकदमा किया जाता है तो ऐसे केस को नहीं लेंगे। राजनीतिक प्रश्न के मामले में भी न्यायालय को कुछ विशेष अधिकार नहीं मिला है, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई महत्वपूर्ण निर्णय में यह जानकारी उपलब्ध करवाई है सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय दोनों को समवर्ती प्रारंभिक क्षेत्राधिकार मिला हुआ है इसके अंतर्गत नागरिक के वैसे अधिकार आते हैं जिनकी रक्षा का दायित्व सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों को है संसद द्वारा समय-समय पर कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को परिवर्तित भी किया जा सकता है जैसे कि अनुच्छेद 262 के अंतर्गत कानून बनाकर अलग-अलग राज्य के बीच नदी जल बंटवारे को लेकर हो रहा विवाद को इस के क्षेत्र अधिकार से बाहर किया जा सकता है। अनुच्छेद 280 के अंतर्गत वित्त आयोग को जो विषय सौंपा गया है उस विवाद को भी अलग कर सकते हैं अनुच्छेद 290 के अंतर्गत केंद्र और राज्य के बीच खर्च को लेकर जो विवाद है उसे भी अलग किया जा सकता है। अनुच्छेद 148 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को सुझाव देने के लिए जो मामला दिया गया है यहां पर यह सुझाव मंत्रिमंडल से पूछ कर ही दिया जाता है क्योंकि राष्ट्रपति को अंतिम रूप से उसी सुझाव को मानना है जो उसे मंत्रिमंडल देगी
Vinayiasacademy.com अनुच्छेद 131 के द्वारा यह प्रावधान है कि सर्वोच्च न्यायालय में ही विशेष मुकदमा लड़े जाएंगे लेकिन 131 के (क )में एक प्रावधान दिया गया है ,जिसमें सर्वोच्च न्यायालय केंद्र सरकार की किसी भी कानून को जांच करके देखें कि यह सही है कि नहीं है, 42वां संविधान संशोधन 1976 के द्वारा अनुच्छेद 32 में परिवर्तन करके ऐसे अधिकार को समाप्त करने की कोशिश की गई थी लेकिन 43 संविधान संशोधन 1977 के द्वारा अनुच्छेद 32 के क को पुनः समाप्त कर दिया ।इस प्रकार 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम के पहले की स्थिति को लाया गया। 1961 ईस्वी में बंगाल को लेकर यह प्रश्न उठा कि क्या कोयला खदानों पर नियंत्रण राज्य का होगा यह केंद्र का होगा ।सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय केंद्र सरकार के पक्ष में दिया
Vinayiasacademy.com
सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय भी क्यों कहा जाता है- संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय कहा जाता है इसका अर्थ यह है कि सर्वोच्च न्यायालय में प्रतिदिन अलग-अलग मामले पर फैसला आता है ,अगर सर्वोच्च न्यायालय किसी फैसले को बता देता है तो फिर इसे भारत के सभी न्यायालय में माने जाएंगे और उच्च न्यायालय में साक्ष्य के रूप में इसे रखा जाएगा और इसी फैसले को प्राथमिकता दिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय को यह भी अधिकार है कि अगर किसी व्यक्ति के द्वारा किसी संस्था के द्वारा अपमान किया जाता है तो वह अपमान के लिए दंड भी दे सकता है ,1971 ईस्वी में न्यायालय अवमानना अधिनियम पारित हुआ। इसमें कोई परिभाषा नहीं है लेकिन न्यायालय ने स्वयं समय-समय पर इसे परिभाषित कर दिया। इसमें दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार की अवमानना आती है। न्यायालय के नजर में कोई भी चीज अगर गलत लगता है, अगर न्यायालय को किसी शिष्टाचार के अंतर्गत होने वाली चीजों से आपत्ति है तो वह व्यक्ति को करना पड़ेगा। यही कारण है कि न्यायपालिका का सम्मान करना है अगर न्यायपालिका का अपमान कोई कर देता है तो न्यायपालिका उसे तुरंत दंडित करने की भी क्षमता रखती है


Vinayiasacademy.com
Vinayiasacademy: सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार का वर्णन करें
Vinayiasacademy.com
संविधान के अनुच्छेद 132 के तहत सर्वोच्च न्यायालय देश का सबसे ऊंचा अपील का न्यायालय है उसे सभी राज्य के उच्च न्यायालय के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है ।सर्वोच्च न्यायालय के अपील क्षेत्र को अलग-अलग प्रकार से देखा जा सकता है जैसे कि संवैधानिक मामला, जिसमें संविधान की व्याख्या करने का प्रश्न उठता है ,तो यह सर्वोच्च न्यायालय के पास चला जाता है, दीवानी मामला जिसमें की सिविल केसेस होते हैं। फौजदारी मामला जिसमें अपराध की श्रेणी वाले केस होते हैं और कुछ मामले ऐसे होते हैं जो विशेष अनुमति से अपील किए जाते हैं अनुच्छेद 134 के द्वारा अपराधिक मामलों की अपील को देखा जाता है उच्च न्यायालय द्वारा किसी आपराधिक कार्यवाही में जब कोई निर्णय सुना दिया जाता है तो फिर व्यक्ति द्वारा इसका अपील उच्चतम न्यायालय में किया जाएगा। उच्च न्यायालय ने न्यायालय के दोष मुक्ति के आदेश को अपील में उलट दिया है तो जो अभियुक्त होते हैं दोष सिद्ध करते हुए अगर उन्हें मृत्युदंड दे दिया गया है तो इस अवस्था में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय चला जाता है ।इसी प्रकार अगर किसी जिला स्तर के न्यायालय का मामले को विचार के लिए उच्च न्यायालय अपने पास और बाद में मृत्युदंड दे दिया है, इस मामले पर भी व्यक्ति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपील किया जा सकता है ।उच्च न्यायालय अगर किसी मामले में फैसला देखकर यह बता दिया है कि आप चाहे तो सर्वोच्च न्यायालय चले जाएं तो फिर व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है लेकिन इसके लिए कई शर्त भी लागू होती है। वही संवैधानिक मामले में बहुत से निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय में अपील किया जा सकता है अगर उस राज्य का उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134 के द्वारा यह प्रमाण दे दे कि इस मामले में संविधान से संबंधित कोई भी ऐसा प्रश्न है जो व्याख्या की जरूरत है तो
तू व्यक्ति द्वारा सीधा सर्वोच्च न्यायालय जाया जा सकता है 44 वें संविधान संशोधन में देरी से बचने के लिए व्यवस्था की गई है कि उच्च न्यायालय को सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने हेतु प्रमाण पत्र स्वीकार करने के प्रश्न पर अपना निर्णय और अंतिम आदेश सुनाने के समय विचार कर लेना चाहिए ।अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अगर विशेष अनुमति के मामले हैं तो कोई व्यक्ति सामाजिक और देश हित में उस प्रश्न को सर्वोच्च न्यायालय में उठा सकता है ऐसे मुकदमे देर रात को भी शामिल हो जाते हैं।
Vinayiasacademy.com
Vinayiasacademy: सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति की अपील फौजदारी मामले में अपील और दीवानी मामले में अपील कैसे की जाती है.


Vinayiasacademy.com अनुच्छेद 136 में यह बताया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के पास स्वविवेक की शक्ति है यानी कि अगर कोई भी निर्णय ,किसी भी प्रकार का दंड ,आदेश के विरोध और अपील के लिए वह अनुमति दे सकता है। लेकिन यह अनुमति सशस्त्र बल से संबंध किसी भी न्यायालय के निर्णय से शामिल नहीं होगा ।अनुच्छेद 136 में अभी बताया गया है कि ऐसी शक्ति जो अवशिष्ट प्रकार की है जो साधारण कानून से बाहर है वह अनुच्छेद 136 के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय को यह देखने का अधिकार है कि क्या इस अपील से देश के किसी भाग में राष्ट्रीय महत्व की चीजें संविधान के उल्लंघन का प्रश्न है। नागरिक अवज्ञा का प्रश्न है ।शांति व्यवस्था का प्रश्न है तो फिर इसे वह अपने पास शामिल कर सकता है या किसी व्यक्ति के पक्ष में अपील करने का कभी भी कोई अधिकार नहीं देता है लेकिन न्यायालय को समझने की शक्ति प्रदान कर देता है कि विशेष परिस्थिति में वह मुकदमा छुट्टी के दिन भी देख सकें ,देर रात को भी देख सकें और वह देर रात को ही इसका फैसला भी दे दे
दीवानी मामले में अनुच्छेद 137 के द्वारा कोई भी व्यक्ति उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। अगर उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दें कि यह मामला संवैधानिक महत्व का है इस प्रश्न का उत्तर सर्वोच्च न्यायालय दे सकती है और अगर व्यक्ति चाहे तो वह सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है तो फिर अनुच्छेद 137 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के पास अगर ऐसे मामले नहीं उठाए जा सकते हैं जो उच्च न्यायालय में पहले नहीं उठाया गया है यानी कि पहले उच्च न्यायालय में ही मामले को उठाना होगा और उसके बाद ही सर्वोच्च न्यायालय जाना होगा
इसी प्रकार से अनुच्छेद 134 के अनुसार किसी उच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय में अपील उच्च न्यायालय के प्रमाण पत्र बिना प्रमाण पत्र दोनों के द्वारा भी की जा सकती है इसमें यह बताया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय में अपील के योग्य है या नहीं है यह विवेक का अधिकार है उच्च न्यायालय का कि वह फौजदारी मामले में प्रमाण पत्र सर्वोच्च न्यायालय जाने के लिए देगा या नहीं देगा
Vinayiasacademy.com


Share it

The post सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2758 0
संसदीय समिति से संबंधित प्रश्न उत्तर https://vinayiasacademy.com/?p=2698 https://vinayiasacademy.com/?p=2698#respond Thu, 16 Jul 2020 09:36:53 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2698 Share itVinayiasacademy.com.com संसदीय समिति कितने प्रकार की होती है ? 2.संसदीय समिति किस प्रकार से संसद को नियंत्रित करती है? संसदीय समिति में विशेषाधिकार समिति एवं पराक्रम समिति का क्या कार्य है? संसद की स्थाई समिति एवम अस्थाई समिति में क्या अंतर होता है ? 5.लोक लेखा समिति एवं सार्वजनिक उपक्रम समिति में अंतर बताइए […]

The post संसदीय समिति से संबंधित प्रश्न उत्तर appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

Vinayiasacademy.com.com

  1. संसदीय समिति कितने प्रकार की होती है ?
    2.संसदीय समिति किस प्रकार से संसद को नियंत्रित करती है?
  2. संसदीय समिति में विशेषाधिकार समिति एवं पराक्रम समिति का क्या कार्य है?
  3. संसद की स्थाई समिति एवम अस्थाई समिति में क्या अंतर होता है ?
    5.लोक लेखा समिति एवं सार्वजनिक उपक्रम समिति में अंतर बताइए ?
    6.गैर सरकारी सदस्य के विधायक तथा संकल्प संबंधी समिति का कार्य क्या है?
  4. संसद की आवास समिति संयुक्त संसदीय समिति एवं अनुसूचित जाति और जनजाति के संबंध में जो समिति बनाई जाती है उस पर चर्चा करें?
  5. संसदीय समिति को बनाने का उद्देश्य क्या है ?क्या इस उद्देश्य को संसदीय समिति पूरा कर पाती है?
  6. अधिकांश समिति में मंत्रियों को स्थान नहीं दिया जाता है इसका प्रमुख कारण क्या है?
  7. वित्तीय समिति एवं विषय गत समिति में कौन सी समिति आती है?
    Vinayiasacademy.com
    भारत में संसदीय परंपरा में ब्रिटेन के तर्ज पर समिति को बनाया गया है ।भारत में समिति प्रणाली का विकास गुप्त काल मौर्य काल में भी था लेकिन मार्ले मिंटो सुधार मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के द्वारा समिति बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत की गई ।एक प्रकार से संसदीय समिति विशिष्ट विशेषाधिकार के तहत ही कार्य करती और संसद पर नियंत्रण भी करती है।
    संसदीय समिति का गठन के लिए एक खास निर्मित प्रक्रिया है। कार्य संचालन के लिए भी एक नियम होता है, संसद में लोकसभा एवं राज्यसभा के अलग-अलग पहलू को ध्यान में रखते हुए समिति की नियुक्ति, समिति का कार्यकाल ,समिति के द्वारा किए गए कार्य ,सभी चीजों के बारे में संविधान में वर्णन किया गया है। इस प्रक्रिया को अनुच्छेद 118 के अंतर्गत समझा जा सकता है जिसमें विस्तार पूर्वक बताया गया है कि समिति का गठन किया तो लोकसभा के सदस्य द्वारा राज्यसभा के सदस्य द्वारा किया जाएगा और इसके लिए एक चयन की प्रक्रिया को अपनाया जाएगा ।कुछ समिति में लोकसभा के अध्यक्ष को यह शक्ति दी गई है कि वह इसका अध्यक्ष का चुनाव करें तथा कुछ समिति में एकल संक्रमणीय पद्धति की विचारधारा को भी रखा गया है ,अगर राज्यसभा में देखा जाए तो राज्यसभा के उपसभापति को मुख्य रूप से जिम्मेवारी समिति के गठन की दी जाती है ।कमेटी का सदस्य बने रहने तक ही बने रहते हैं लेकिन अगर कोई सदस्य चाहे तो वह त्यागपत्र दे सकते हैं समिति के किसी सदस्य को बीच में निकाला भी जा सकता है
    Vinayiasacademy.com
    लोकसभा एवं राज्यसभा के काफी कार्य है अगर संसदीय समिति का निर्माण किया जाता है तो कार्य के भार कम होंगे। तकनीकी विषय पर चिंतन होगा। तकनीकी विषय पर चर्चा होगी तथा आवश्यक सूचना और सामग्री संसदीय समिति के द्वारा सदन के पटल पर रखा जाएगा। यही कारण है की सत्यता के अनुसार ही कमेटी की गठन होती है ।कमेटी साक्ष्य एकत्रित करती है ।कभी-कभी घटनास्थल पर या इस संबंध में कोई जांच चल रही है वहां जाकर स्थल का निरीक्षण भी करती है ।संसदीय समिति शासन की नीति निर्माण प्रक्रिया को बहुत हद तक प्रभावित कर देती है। हम कह सकते हैं कि इसका प्रशासन पर पूर्ण रुप से नियंत्रण हो जाता है ।सरकार और जनता के बीच एक कड़ी का भी कार्य करती है। इससे किसी समाज में होने वाली घटना को बचाया जा सकता है। प्रभावित होने वाले व्यक्ति और हित की सुनवाई भी की जा सकती है
    Vinayiasacademy.com
    समिति बनाते समय यह ध्यान दिया जाता है कि इनके कार्य का आधार क्या होगा। किस विषय पर यह कार्य करेंगे ।इन्हें जांच का अधिकार होगा या नहीं होगा। किस पार्टी के कितने लोगों को अनुपात के आधार पर रखा जाएगा यानी कि अगर समिति वित्तीय प्रकार का है। जांच समिति है ,सदन की समिति है, छानबीन की समिति, तो उसी के अनुसार उसमें सदस्यों को रखा जाता है और उन्हें कार्य सौंपा जाता है
    भारत की संसदीय समितियों में स्थाई समिति का सर्वाधिक योगदान होता है ।ऐसी समिति जो समिति हमेशा रहती है लेकिन इसके अलावा कुछ समितियां तदर्थ या अस्थाई समिति होती जो समय-समय पर विशेष मामले के लिए बनाया जाता है। कभी-कभी ऐसी समिति संयुक्त समिति होती है और कभी-कभी ऐसी समिति किसी विशिष्ट मामले की जांच करने और प्रतिवेदन देने के लिए बनाई जाती है।
    स्थाई समिति में वित्तीय समिति का प्रमुख योगदान होता है। जिसमें लोकसभा में बनाई जाने वाली पराक्रम समिति सरकारी उपक्रम समिति और लोक लेखा समिति प्रमुख समिति होता है। स्थाई समिति के रूप में संयुक्त समिति बनाई जाती है जो तदर्थ समिति कहलाती है
    संसद की विषय गत समिति में एक बार फिर से लोकसभा की प्रार्थना समिति पर्यावरण और वन समिति विज्ञान और प्रौद्योगिकी समिति को स्थान दिया गया है
    सदन की दूसरी समितियों में कार्य मंत्रणा समिति, गैर सरकारी सदस्य के विधायक को लेकर बनाई गई समिति ,सभा की बैठक से सदस्य की अनुपस्थिति को लेकर बनाई हुई कमेटी एवं नियम कानून को मिलाकर चलने के लिए बनाई गई समिति होती है।
    इसी प्रकार से जांच समिति बनाई जाती है, जिसमें याचिका समिति और विशेषाधिकार समिति प्रमुख होता है।
    संसद में छानबीन करने के लिए और जांच करने के लिए अलग से भी समिति बनाने की परंपरा है जैसे कि सरकारी आश्वासन संबंधी समिति ,अधीनस्थ संबंधी समिति, सभा पटल पर जो पत्र रखा जाता है उसे लेकर बनाई गई समिति ,अनुसूचित जाति और जनजाति के कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने वाली समिति,
    अलग-अलग प्रकार की सेवा और उपबंध को करने के लिए भी समिति बनाई जाती है इसमें मुख्य रूप से सामान्य प्रयोजन समिति, आवास समिति ,ग्रंथ आलय समिति ,जो पुस्तकालय समिति के नाम से जानी जाती है और संसद सदस्य का वेतन और भत्ता बढ़ाया जाए या नहीं इसे लेकर एक समिति बनाई जाती है
    Vinayiasacademy.com
    कार्य मंत्रणा समिति के कार्य क्या है- जब कभी चुनाव होता है और चुनाव के बाद नए लोकसभा का गठन होता है तो उस समय लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा इस समिति का गठन किया जाता है अथवा समय-समय पर लोकसभा के अध्यक्ष यदि चाहें तो इस समिति का गठन कर सकते हैं लोकसभा के अध्यक्ष ही इस समिति के अध्यक्ष होते हैं इस समिति में 15 सदस्य होते हैं समिति ऐसे सरकारी विधेयक के बारे में विचार करती है जिसे सदन में लाया गया है इसमें चर्चा करवाना है या नहीं करवाना है। इसमें मत विभाजन होना चाहिए या नहीं होना चाहिए ।सदन के नेता के परामर्श ,अध्यक्ष सदन के नेता को समिति की पूरी जिम्मेदारी सौंप देते हैं। समिति को यह बताने की भी शक्ति होती है कि यह कितने स्टेज में पारित होगा। इसमें कौन-कौन से कार्य है तथा इसे कौन करेंगे। कितने दिनों में पूरा होगा लोकसभा के अध्यक्ष अलग-अलग सदस्य को कार्य सौंप देते हैं। सदन में विचार विमर्श करने के लिए भी इस पर चर्चा होती है इसकी सिफारिश समिति ही करती है। इसके लिए एक खास दिन और समय निर्धारित कर दिया जाता है। यह समिति राज्यसभा में भी होती है। इसमें 11 सदस्य होते हैं राज्य सभा के सभापति और उपसभापति दोनों इसके सदस्य होते हैं ।राज्य सभा का सभापति सभा द्वारा गठित इस समिति का अध्यक्ष होते हैं ।लोकसभा की भांति होता है यानी कि राज्यसभा में चर्चा करने के लिए विचार विमर्श करने के लिए समिति को पूरी जिम्मेवारी सौंपी गई है
  8. Vinayiasacademy.com
    संसद की विशेषाधिकार समिति के बारे में विस्तार पूर्वक बताइए- संसद की विशेषाधिकार समिति एक प्रकार की विशिष्ट समिति है इसमें 15 सदस्यों को शामिल किया जाता है यह सदस्य लोकसभा के होते हैं इसलिए इसे लोकसभा की विशेषाधिकार समिति भी कहते हैं ,जैसे नए लोकसभा का चुनाव संपन्न होता है और नए लोकसभा का कार्यकाल शुरू होता है कि समिति के कार्य भी शुरू हो जाते हैं। लोकसभा के अध्यक्ष अगर चाहे तो समय-समय पर इसके सदस्यों को बदल भी सकते हैं। संसद के दोनों सदन में इस समिति का गठन किया जाता है लेकिन राज्यसभा में इस समिति में सिर्फ 10 सदस्य होते हैं ।जब समिति का गठन होता है तो यह देखना जरूरी होता है कि जिस पार्टी के जितने लोग जीत कर चुनाव आए अगर कोई समूह में जीतकर आया है तो उसका अनुपातिक प्रतिनिधित्व यानी कि लोकसभा के नेता तथा यहां के कानून मंत्री भी इस समिति के आमतौर पर सदस्य बना दिए जाते हैं क्योंकि विशेषाधिकार समिति यह तय करती है संसद के सदस्य को अधिकार दिए गए उनका पालन सही से करें दुरुपयोग तो नहीं कर रहे हैं इसलिए इसकी रिपोर्ट सदन पर रखी जाती है ।इन के मुख्य कार्यों में संसद के किसी सदस्य के विशेषाधिकार हनन के मामले अगर हो जाते हैं, तो उसका भी जांच करना है समिति अगर चाहे तो किसी का विशेष अधिकार होने के मामले में वह परिस्थिति और कारण की जांच कर सकती है ।वह उस व्यक्ति को बुलाकर सदन में फटकार भी लगा सकती है जिसने संसद के सदस्य का विशेषाधिकार किया का हनन किया है ,जब तक विशेषाधिकार समिति अपना रिपोर्ट नहीं सौंपी तब तक किसी मामले पर जांच संपूर्ण नहीं हो पाता है
    Vinayiasacademy.com
    प्राक्कलन समिति क्या है? इस समिति के द्वारा किन कार्यों को सफलतापूर्वक किया जाता है?
    प्राक्कलन समिति संसद की स्थाई समिति है यह समिति सिर्फ लोकसभा में होती है इसमें कुल 30 सदस्य होते हैं प्राक्कलन समिति का निर्वाचन प्रत्येक वर्ष जिस पार्टी के जितने सदस्य होते हैं उसका अनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय पद्धति के द्वारा ही इस का चुनाव किया जाता है जो सदस्य इस समिति का सदस्य बनने के योग्य होते हैं ।जिनका निर्वाचन हो जाता है उसी में से किसी एक व्यक्ति को सदन के अध्यक्ष द्वारा समिति का अध्यक्ष बना दिया जाता है ।प्राक्कलन समिति के सदस्य में मंत्री परिषद का कोई सदस्य नहीं होता है और अगर कोई सदस्य समिति का सदस्य है और बाद में मंत्री बन जाता है तो ऐसे में मंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही समिति का सदस्य नहीं रहेगा समिति की भी कार्य अवधि 1 वर्ष की होती है , कैसे बेहतर कार्य करें प्रशासन की कुशलता कैसी हो। इसके लिए वैकल्पिक नीति क्या होनी चाहिए? इसके लिए नए सुझाव क्या है? प्रशासनिक व्यवस्था में नई चीजों का सृजन करना। प्राक्कलन समिति द्वारा संगठन के व्यवस्था में सुधार करना इसके लिए प्रतिवेदन प्रस्तुत करना होता है ।यानी कि पूरे देश में किस प्रकार की प्रशासनिक सुधार होनी चाहिए इसलिए इस समिति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है ।यह इस बात की जांच भी करता है की अंतर्निहित नीति की सीमा में रहते धन का प्रयोग कितना बेहतर तरीके से किया जाए। अगर धन का प्रयोग दुरुपयोग के रूप में हो गया है तो इस समिति के द्वारा रिपोर्ट कर दी जाती है समिति द्वारा पूरी की जांच प्रत्येक राज्य में होता है पूरा वर्ष होता है। समिति सरकार को ही रिपोर्ट देती है समिति अपनी जांच के संदर्भ में मंत्रालय से विभाग से किसी भी सरकारी उपक्रम से सामग्री मांग सकती है और आंकड़ा मांग सकती है। शंका होने पर वह जांच के लिए किसी व्यक्ति को बुला सकती है। वह स्वयं अथवा विशेषज्ञ से राय ले सकती है। समिति अगर चाहे तो इस विषय से संबंधित स्थान, संस्था और संगठन का उनके यहां जाकर अध्ययन कर सकती है, निरीक्षण भी कर सकती है, यही कारण है कि इस समिति को कहा जाता है कि संसद पखर्च पर नियंत्रण कर लेती है और शिष्टाचार पर भी नियंत्रण कर लेती है
    Vinayiasacademy.com
    लोक लेखा समिति के क्या कार्य है ?लोक लेखा समिति अपनी रिपोर्ट किसे प्रस्तुत करती है?
    लोक लेखा समिति लोकसभा एवं राज्यसभा के सदस्य से मिलकर बनती है इसमें लोकसभा के 15 और राज्यसभा के 7 सदस्य होते हैं इस समिति के सदस्य का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर किया जाता है ।इसे एकल संक्रमणीय मत पद्धति का चुनाव भी कहते हैं। लोक लेखा समिति में किसी मंत्री को सदस्य नहीं बनाया जा सकता है। अगर कोई मंत्री इसका सदस्य होता है तो वह उसी समय समिति के सदस्य से हट जाएगा यानी कि सामान्य सदस्य कभी भविष्य में मंत्री बन जाते तो वह स्थाई समिति के सदस्य हट जाए भारत में ऐसी परंपरा बनाई गई है कि लोक लेखा समिति का अध्यक्ष सबसे बड़ा विपक्षी पार्टी को दिया जाता है इनके अध्यक्ष को लोकसभा का सदस्य होना जरूरी होता है ।समिति का कार्यकाल 1 वर्ष का होता है इसके द्वारा भारत सरकार के द्वारा जो खर्च किया जाता है, संसद को जो राशि बजट में खर्च करने के लिए दी जाती है ।क्या वह सही है ?क्या भारत सरकार के द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला बजट और वित्तीय विधायक सही है ?क्या उसमें पैसा सही प्रकार से आ रहा है? इस प्रतिवेदन की जांच करना है ।यही कारण है कि कैग की रिपोर्ट की प्रतिवेदन की छानबीन करते समय इस कमेटी का महत्वपूर्ण भूमिका हो जाता है क्योंकि इस राशि का उपयोग में दिया गया है इस राशि को खर्च में दिखाया गया है क्या वह राशि कानूनी रूप से निर्धारित या नहीं यह कमेटी इसकी जांच करें उनको खर्च करने के लिए जो नियम संसद ने दिया है उसी नियमानुसार खर्च हुआ है या किसी और प्रकार से खर्च हो गया यानी कि प्रत्येक सक्षम अधिकारी द्वारा बनाए गए नियम के अनुकूल सब कुछ है या नहीं, व्यापार राज्य का नियम संस्था की आय और वह जिसे कि प्रत्येक वर्ष प्रस्तुत करेगा इसकी जांच लोक लेखा समिति करेगी। इसके द्वारा जैसे ही लोक लेखा समिति अपनी रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत करेगी तो वित्तीय प्रशासन पर यह नियंत्रण हो जाएगा ।यहां पर हम कह सकते हैं कि लोक लेखा समिति के द्वारा भारत की संसद खर्च पर नियंत्रण कर सकती है। किसी वित्तीय वर्ष में होने वाला खर्च सही है या गलत है यह देखना लोक लेखा समिति का ही कार्य हैvinayiasacademy.com
    सार्वजनिक उपक्रम समिति एवं लोक लेखा समिति में क्या अंतर है- सार्वजनिक उपक्रम समिति में भी लोक लेखा समिति के तर्ज पर 22 सदस्य होते हैं इसमें लोकसभा के 15 सदस्य राज्यसभा के 7 सदस्य होते हैं। इस समिति के द्वारा चौथी अनुसूची में वर्णित विषय सार्वजनिक उपक्रम के संबंध में जो लेखा और प्रतिवेदन होता है उसकी जांच करता है। यह समिति भी महालेखाकार की रिपोर्ट पर जांच करती है किसी कंपनी के अनुरूप कार्य, कुशलता के अनुरूप कंपनी का जांच करना, व्यापार के सिद्धांत का जांच करना, सरकार के पास जो राजस्व आना चाहिए वह क्यों नहीं आया है इसकी जांच करना यानी कि सरकार को घाटा क्यों हो रहा है? सरकार के द्वारा संसाधन का जो नीलामी कराया गया है वह मूल रूप में सही है या गलत है? क्या इसे और बेहतर किया जा सकता है? इस पर जांच करके सदन में अपनी रिपोर्ट दी जाती है ।यहां पर हम कह सकते हैं कि लोक लेखा समिति ,सार्वजनिक उपक्रम समिति और प्राकलन समिति। मुख्य रूप से संसद से होने वाले खर्च पर एक प्रकार का नियंत्रण स्थापित कर लेती है
    Vinayiasacademy.com
    गैर सरकारी सदस्य के विधेयक और समिति पर चर्चा करें- इस समिति का गठन लोकसभा के अध्यक्ष के द्वारा किया जाता है इसमें अधिकतम सदस्य की संख्या 15 हो सकती है ।इसका कार्यकाल एक ही वर्ष का होता है। संविधान में जब कोई संशोधन होता है एवं संशोधन होने वाला प्रस्ताव गैर सरकारी सदस्य के द्वारा लाया जाता है तो इसके महत्व का जांच करना इसका स्वरूप कैसा है ।
    Vinayiasacademy.com
    संयुक्त संसदीय समिति कौन-कौन सी होती है- अलग-अलग मामले पर समय-समय पर संयुक्त संसदीय समिति का निर्माण किया जाता है जैसे कि वर्ष 2011 में पीसी चाको समिति 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच करने के लिए बनाया गया था ।इसी प्रकार से वर्ष 2003 में शीतल पेय पदार्थ में कितना कीटनाशक है कि नहीं है इसके लिए पवार समिति का गठन किया गया था ।केतन पारेख के शेयर घोटाले की जांच करने के लिए वर्ष 2001 में त्रिपाठी समिति बनाई गई थी और हर्षद मेहता का जांच करने के लिए 1992 में मिर्धा समिति बनी थी ,bofors मामला जो भारत में कई सरकार को गिराने में सहायक रहा है इसमें बी शंकर आनंद 1987 में बनाया गया था
    Vinayiasacademy.com
    लोकसभा में मूल रूप में कितने स्थाई समिति है उनके नाम और सदस्य की भी जानकारी दें- लोकसभा में मूल रूप में 18 स्थाई समिति होते ।जिसमें कार्य मंत्रणा समिति 15 सदस्य, विशेषाधिकार समिति 15 सदस्य , याचिका समिति 15, प्राक्कलन समिति 30 सदस्य, लोक लेखा समिति 22 सदस्य, लोक उपक्रम समिति 22 सदस्य, विधायन संबंधी समिति 15 सदस्य ,सामान्य प्रयोजन समिति 29 सदस्य ,आवास समिति 12 ,सदस्य सरकारी आश्वासन संबंधी समिति 15 ,की बैठक से संबंधित समिति 15 सदस्य सभा पटल पर जो पत्र रखा जाता है उसके लिए 15 सदस्य ,गैरसरकारी सदस्य का विधेयक के लिए 15, अनुसूचित जाति जनजाति के कल्याण के लिए 30 सदस्य संसद सदस्य के वेतन के लिए 15 सदस्य ,लाभ के पद को जांच करने के लिए 15 सदस्य पुस्तकालय जांच करने के लिए 9 सदस्य नियम समिति के लिए 15 सदस्य आवाज समिति के लिए 12 सदस्य Niyam Samiti 15 sadasya
    Vinayiasacademy.com
    आवास समिति प्रत्येक सदन में अलग-अलग होती है इसमें लोकसभा में भी 12 सदस्य होते हैं और राज्य सभा में भी 12 सदस्यों के हैं इसका कारण है कि सांसद को आवाज मिला या नहीं मिला सांसदों को चिकित्सा सुविधा दी जा रही है नहीं दी जा रही है इसके सदस्य को लोकसभा के अध्यक्ष लोक सभा में राज्यसभा सभा के सभापति राज्यसभा में नियुक्त करते हैं
    सभा पटल पर जो पत्र रखा जाता है इसमें 15 सदस्य होते हैं इसका चयन लोकसभा के अध्यक्ष करते हैं इसका कार्यकाल 1 वर्ष का होता है यह समिति मंत्री द्वारा पटल पर रखे गए सभी पत्र की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट लोकसभा को प्रस्तुत करती है
    Vinayiasacademy.com

Share it

The post संसदीय समिति से संबंधित प्रश्न उत्तर appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2698 0
राजनीतिक दल और दृबाव समूह https://vinayiasacademy.com/?p=2614 https://vinayiasacademy.com/?p=2614#respond Tue, 30 Jun 2020 06:36:01 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2614 Share itराजनीतिक दल और दृबाव समूह:- Vinayiasacademy.com राजनीतिक दल नागरिकों का एक ऐसा समूह होता है, जो समान सिद्धांतों पर विश्वास करते हुए चुनाव के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, जबकि दबाव समूह  साझे हितों से संचालित लोगों का संगठन है, जो अपने साधनों की प्राप्ति के लिये राजनीति को प्रभावित […]

The post राजनीतिक दल और दृबाव समूह appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

राजनीतिक दल और दृबाव समूह:-
Vinayiasacademy.com

राजनीतिक दल नागरिकों का एक ऐसा समूह होता है, जो समान सिद्धांतों पर विश्वास करते हुए चुनाव के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, जबकि दबाव समूह  साझे हितों से संचालित लोगों का संगठन है, जो अपने साधनों की प्राप्ति के लिये राजनीति को प्रभावित करते हैं। राजनीतिक दल और दबाव समूह मैं अंतर को निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है-

राजनीतिक दल औपचारिक संगठन होते हैं। जबकि दबाव समूह औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों प्रकार के संगठन हो सकते हैं।

राजनीतिक दल चुनाव के माध्यम से सत्ता प्राप्त कर अपने सिद्धांतों का क्रियान्वयन करने का प्रयास करते हैं जबकि दबाव समूह प्रत्यक्षतः सरकार में शामिल होने के लिये चुनाव नहीं लड़ती हैं।

एक व्यक्ति एक ही राजनीतिक दल का सदस्य हो सकता है। जबकि एक व्यक्ति एक समय में अनेक दबाव समूहों का सदस्य हो सकता है।

राजनीतिक दलों में विचारधारा का महत्त्व अत्यधिक होता है। किसी राजनीतिक दल में शामिल होने वाले सभी व्यक्ति एक विचारधाराओं पर सहमती होती हैं । जबकि दबाव समूह में विचारधारा का महत्त्व अपेक्षाकृत कम होता है। 

राजनीतिक दल सामान्यतः लोकतांत्रिक देशों की विशेषता है किंतु दबाव समूह सभी प्रकार की शासन प्रणाली में पाए जाते हैं। 

भारतीय राजनीति में दबाव समूह को निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है-

सामाजिक पहचान पर आधारित दवाब समूह 
ऐसे समूह धर्म, जाति, भाषा अथवा क्षेत्र के आधार पर सामुदायिक हितों से जुड़े होते हैं। इनकी सदस्यता जन्म से निर्धारित होती है।

उदाहरण के लिये बजरंग दल तथा जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन धर्म पर आधारित दबाव समूह हैं।

व्यावसायिक संघ:-

यह सब अपने संयुक्त व्यवसायिक हितों के लिये एकत्रित होते हैं। और सरकार पर अपने हितों के लिये नियम बनाने का दबाव डालते हैं। मज़दूर संघ व्यापार संस्थाएँ इसी प्रकृति के दबाव समूह में शामिल होता है। फिक्की, एन.एस.यू.आई जैसे संगठन व्यवसायिक दबाव समूहों के उदाहरण होते हैं।

संस्थात्मक दबाव समूह:-

यह सरकारी कर्मचारियों तथा अधिकारियों द्वारा निर्मित दबाव समूह होता है। उदाहरण के लिये सरकारी चिकित्सकों का संगठन तथा IAS अधिकारियों का संगठन इसके उदाहरण है।

उद्देश्य समूह :-

इनका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण, मानव अधिकार जैसे सामाजिक विषयों से संबंधित सामाजिक हितों की रक्षा करना है। इसके लिये यह मानव अधिकारों के पक्ष में कार्य करने के लिये सरकार पर दबाव डालते हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन तथा नाज फाउंडेशन जैसे संगठन उद्देश्य समूह के उदाहरण हैं। 

प्रदर्शनात्मक समूह:-

यह प्रदर्शन तथा हिंसा के माध्यम से दबाव डालकर अपने हितों की प्राप्ति का प्रयास करते हैं। पीपुल्स वार ग्रुप जैसे संगठन ऐसे ही संगठन है।

तदर्थ दबाव समूह :-

किसी विशेष कार्य के लिये बनते हैं और कार्य में सफलता के साथ ही समाप्त हो जाते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं अपनी प्रकृति के आधार पर दबाव समूहों को कई भागों में बाँटा जा सकता है। उद्देश्य समूह जैसे कई संगठन मानव हितों को उठाकर लोकतांत्रिक शासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं।

दबाव समूह:-

दबाव समूह का वर्तमान राजनीतिक व्यवस्थाओं में विशेष स्थान होता है। … दबाव समूहों के संदर्भ में यह कहा जा सकता है, कि जब कोई संगठन अपने सदस्यों के हितों की पूर्ति के लिए राजनीतिक सत्ता को प्रभावित करता है। और उनकी पूर्ति के लिए दबाव डालता है तो उस संगठन को ‘दबाव समूह’ कहते हैं।

औपचारिक दबाव समूह भारत मे निम्न प्रकार के है ।

  1. व्यवसाय समूह – फिक्की , एसोचेम ,एमओ इत्यादी
  2. व्यापार संघ – AITUC , INTUC , HMS , CITU इत्यादि
  3. खेतिहर समूह – भारतीय किसान यूनियन , ऑल इंडिया किसान सभा , भारतीय किसान सभा इत्यादि
  4. छात्र संगठन – ABVP , NSUI , AISA इत्यादि
  5. पेशेवर समितियां – इंडियन मेडिकल एसोसिएशन , बार काँसिल ऑफ इंडिया इत्यादि
  6. धार्मिक संगठन – आरएसएस , विहिप , जमात – ए – इस्लामी , शिरोमणि अकाली दल इत्यादि
  7. जातीय समूह – हरिजन सेवक संघ , कायस्थ समूह , ब्राह्मण सभा , राजपूत समूह इत्यादि
  8. भाषागत समूह – तमिल संघ , नागरी प्रचारिणी सभा , हिंदी साहित्य सम्मेलन इत्यादि
  9. आदिवासी संघठन समूह – NSSCN , PLA , JMM , TNU इत्यादि
  10. विचारधारा समूह – अम्बेडकवादी ,गांधीवादी, पर्यावरणवादी इत्यादि

राजनीतिक दल political parties:-

Vinayiasacademy.com

राजनीतिक दल या राजनैतिक दल (Political party) लोगों का एक ऐसा संगठित गुट होता है। जिसके सदस्य किसी साँझी विचारधारा में विश्वास रखते हैं। या समान राजनैतिक दृष्टिकोण रखते हैं। यह दल चुनावों में उम्मीदवार उतारते हैं और उन्हें निर्वाचित करवा कर दल के कार्यक्रम लागू करवाने क प्रयास करते हैं। राजनैतिक दलों के सिद्धान्त या लक्ष्य (vision) प्राय: लिखित दस्तावेज़ के रूप में होता है।

विभिन्न देशों में राजनीतिक दलों की अलग-अलग स्थिति व व्यवस्था होती है। कुछ देशों में कोई भी राजनीतिक दल नहीं होते हैं। कहीं एक ही दल सर्वेसर्वा (डॉमिनैन्ट dominate) होता है। कहीं मुख्यतः दो दल होते हैं। किन्तु बहुत से देशों में दो से अधिक दल होते हैं। लोकतान्त्रिक राजनैतिक व्यवस्था में राजनैतिक दलों का स्थान केन्द्रीय अवधारणा के रूप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। राजनैतिक दल किसी समाज व्यवस्था में शक्ति के वितरण और सत्ता के आकांक्षी व्यक्तियों एवं समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे परस्पर विरोधी हितों के सारणीकरण, अनुशासन और सामंजस्य का प्रमुख साधन रहे हैं। इस तरह से राजनैतिक दल समाज व्यवस्था के लक्ष्यों, सामाजिक गतिशीलता, सामाजिक परिवर्तनों, परिवर्तनों के अवरोधों और सामाजिक आन्दोलनों से भी सम्बन्धित होते हैं। राजनैतिक दलों का अध्ययन समाजशास्त्री और राजनीतिशास्त्री दोनों करते हैं, लेकिन दोनों के दृष्टिकोणों में पर्याप्त अन्तर होता है। समाजशास्त्री राजनैतिक दल को सामाजिक समूह मानते हैं। जबकि राजनीतिज्ञ राजनीतिक दलों को आधुनिक राज्य में सरकार बनाने की एक प्रमुख संस्था के रूप में देखते हैं।

विशेषताएँ:-

राजनीतिक दल की संरचना में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे अन्य समूह से अलग करती हैं:

राजनीतिक दल ऐसा संगठन है जिसका प्राथमिक उद्देश्य राजनीतिक नेतृत्व की प्राप्ति होता है। इसमें दल का नेता संगठित अल्पतंत्र (कार्यकारिणी) द्वारा शक्ति हथियाने का पूरा-पूरा प्रयत्न करता है।

सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों को लेकर उप संरचनाएं एवं समितियां होती है, जो भौगोलिक सीमाओं, सामाजिक समग्रताओं के आधार पर होती हैं। दल में कई परस्पर विरोधी समूह किसी उद्देश्य तथा राजनीतिक विचारधारा को लेकर साथ में जुड़े हुए रहते हैं।

हर राजनीतिक दल में अल्पतन्त्र होता है। प्रथम अवस्था में शक्ति का केन्द्रीकरण कुछ अनुभवी नेताओं के हाथ में होता है, जो प्रमुख पदाधिकारी होते हैं, जबकि दूसरी अवस्था में दल का संगठन एक विशेष स्तरीकरण व्यवस्था में विभाजित होता है और हर स्तर पर कुछ स्वायत्तता पाई जाती है।

दल में सदस्यता निरन्तर बनी रहती है। एक सदस्य दूसरे सदस्य को दल की गतिविधियों की जानकारी देते रहते हैं। नए सदस्यों के लिए दल में सदस्यता के द्वार हमेशा खुले रहते हैं। यहीं यह एक खुली संरचना होती है। कुछ लोग दल के सदस्य इसलिए होते हैं कि उन्हें समाज में उसके कारण एक विशेष स्थान मिल जाता है।

उपर्युक्त लक्षणों द्वारा राजनीतिक दल को अन्य संगठन से भिन्न करके देख सकते हैं। राजनीतिक दल का गठन समाज व्यवस्था की दो विशेषताओं द्वारा पाया जाता है:

राजनीतिक शक्ति का आधार ‘वोट’ है अर्थात् सरकार का निर्धारण मतदान प्रणाली से किया जाता है।

विभिन्न समूहों में शक्ति के लिए परस्पर प्रतिस्पर्धा होती रहती है। अर्थात् राजनीतिक शक्ति को सत्ता हथियाने के लिए परस्पर होड़ हो रही होती है।

संरचना:-

मौरिस डुवर्जर ने राजनीतिक दल के सामाजिक संगठन का महत्वपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इन्होंने दल के संगठन को चार सूत्रीय वर्गीकरण द्वारा समझाने का प्रयास किया है। जोकि निम्नलिखित हैं-

(१) समिति ( कॉकस / Caucus)

(२) शाखा (ब्रांच / Branch)

(३) कोष्ठक (सेल / Cell)

(४) नागरिक सेना (मिलिशिया / Militia)

  • कॉकस दल के जाने-पहचाने लोगों का एक लघु समूह कहा जा सकता है, जो न अपने विस्तार और न ही अपनी भर्ती में रूचि रखता है। वास्तव में यह एक बन्द समूह होता है। जिसकी प्रकृति अर्द्ध-स्थायी होती है। केवल चुनाव के समय ही कॉकस अधिक सक्रिय होता है। तथा चुनावों के बीच के समय में यह निष्क्रिय रहता है। इसके सदस्यों की न्यून संख्या इसकी शक्ति का माप नहीं होती है। क्योंकि इसके सदस्यों का व्यक्तिगत प्रभाव, शक्ति एवं क्षमता उनकी संख्या से काफी अधिक होती है। अतः इसके ख्याति प्राप्त सदस्यों की संख्या की अपेक्षा उनका प्रभाव एवं क्षमता अधिक महत्वपूर्ण होता है। डुवर्जर ने फ्रांसीसी रैडिकल पार्टी और 1918 से पूर्व की ब्रिटिश लेबर पार्टी को इसका उदाहरण बताया है। मताधिकार के विस्तार के साथ ‘कॉकस’ प्रकार के दल का ह्रास हो जाता है।
  • शाखा या ब्रांच दल परिश्मी यूरोप में मताधिकार के विस्तार का परिणाम है। इसका सम्बन्ध जनता से होता है, तथा कॉकस की तरह यह एक बन्द समूह नहीं होते है। क्योंकि इनमें गुणों की अपेक्षा संख्या को अधिक महत्व दिया जाता है। अतः यह अधिक से अधिक सदस्यों की भर्ती में सदैव रूचि रखते है। इनकी राजनीतिक संक्रियताएं केवल चुनाव तक ही सीमित नहीं होती अपितु निरन्तर चलती रहती हैं। ब्रांच कॉकस की अपेक्षा बड़ा समूह है, इसलिए इसका संगठन अधिक होता है। तथा इसमें कॉकस की अपेक्षा अधिक एकीकरण पाया जाता है। इसमें संस्तरण तथा कर्त्तव्यों का विभाजन सुस्पष्ट होता है। तथा स्थानीयता एवं संकीर्णता का भी आभास पाया जाता है। इसमें अधिकतर केन्द्रीकृत दल संरचना होती है और प्रारम्भिक इकाईयां निर्वाचन क्षेत्रों की ही भांति भौगोलिक आधार पर संगठित होती हैं। यूरोप के समाजवादी दलों में ब्रांच के सभी लक्षण पाये जाते हैं। कैथोलिक और अनुदारवादी दलों ने न्यूनाधिक सफलता पूर्वक इसका अनुसरण किया है। जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी संगठनात्मक आधार पर इस प्रकार के दल का एक अच्छा उदाहरण है।
  • डुवर्जर द्वारा बताया गया दल संगठन का तीसरा प्रकार कोष्ठक या सेल है जो क्रान्ति-कारी साम्यवादी दलों की खोज है। यह ब्रांच की अपेक्षा काफी छोटा समूह होता है। तथा इसका आधार भौगोलिक न होकर व्यावसायिक होता है। व्यावसायिक आधार के कारण सेल किसी स्थान पर कार्य करने वाले सभी सदस्यों को एक सूत्र में बाँधना होता है। कारखाना, वर्कशॉप, दफ्तर एवं प्रशासन आदि इसके अंग हो सकते हैं। चूंकि सेल उन सदस्यों का समूह होता हैं, जो एक ही व्यवसाय में लगे हुए हैं तथा जो प्रतिदिन कार्य के समय मिलते हैं, इसलिए इसके सदस्यों में दलीय एकात्मकता अधिक होती है। वैयक्तिक सेल का अन्य सेलों से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता है। सेल का संगठन अनिवार्य रूप से षड्यन्त्रकारी होता है और इसकी निर्माण शैली इस बात का पक्का इन्तजाम करती है, कि एक सेल के नष्ट होने पर सम्पूर्ण दल-संरचना संकट में पड़े क्योंकि एक ही स्तर पर पृथक-पृथक इकाइयों के बीच कोई संपर्क नहीं रहते। यह गुप्त सक्रियता के लिए सबसे उपयुक्त माध्यम होता है। इसकी गुप्त सक्रियताएं मुख्यतः राजनैतिक होती हैं तथा सदस्यों के लिए अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। मतों को जीतने, प्रतिनिधियों के समूहन तथा मतदाताओं के प्रतिनिधियों से संपर्क रखने की अपेक्षा सेल दल संघर्ष, प्रचार, अनुशासन तथा अगर अनिवार्य तो गुप्त सक्रियता का एक माध्यम है। इनमें चुनाव जीतने की दूसरे दर्जे के महत्व की बात मानने की प्रवृत्ति होती है। प्रजा तांत्रिक केन्द्रवाद की धारणा दल के सभी पहलुओं पर केन्द्रीकृत नियंत्रण स्थापित कर देती है। जिसका उदाहरण 1917 से पहले लेनिनवादी दल था। डुवर्जर फ्रांसीसी साम्यवादी दल के सदस्यों में सेल संरचना के प्रति शत्रु भाव होने का भी संकेत करते हैं।
  • डुवर्जर का दल-संगठन का चौथा प्रकार मिलिशिया प्रकार का संगठन है। यह एक प्रकार की निजी सेना है जिसके सदस्यों को सैनिकों की तरह भर्ती किया जाता है। तथा जिन्हें सैनिक संगठन की भाँति अनुशासन में रहना और प्रशिक्षण लेना पड़ता है। इसकी संरचना भी सैनिक संरचना के समान ही होती है अर्थात् इसके सदस्य सेना की तरह टुकड़ियों, कम्पनियों और बटालियनों से संगठित होते हैं। मिलिशिया सेना के अधिक्रमिक लक्षण ग्रहण कर लेती है। मिलिशिया की चुनाव तथा संसदीय गतिविधियों में कोई रूचि नहीं होती है क्योंकि यह प्रजातन्त्रीय व्यवस्था को मजबूत करने की अपेक्षा इसे उखाड़ फेंकने का एक मौलिक साधन होता है। जिस प्रकार सेल एक साम्यवादी खोज है, ठीक उसी प्रकार मिलिशिया क्रान्तिकारियों की खोज है। हिटलर के आक्रामी सैनिक और मुसोलिनी की क्रान्ति-कारी मिलिशिया इस प्रकार की संरचना का उदाहरण हैं। इनकी ओर डुवर्जर यह संकेत करते हैं कि केवल मिलिशिया के आधार पर कभी भी कोई राजनीतिक दल नहीं बना है।

राजनीतिक दलों का सामाजिक संगठन:-
Vinayiasacademy.com

जिस संगठित रूप में राजनीतिक दल आज हमारे सामने विद्यमान हैं, उस रूप में उनका इतिहास अधिक प्राचीन नहीं है। उनकी उत्पत्ति उन्नीसवीं 19वीं शताब्दी में हुई है। परन्तु इससे पूर्व भी मनुष्यों द्वारा निर्मित कुछ संगठन, शासन से प्रत्यक्ष न होने पर भी जनमत के निर्माण तथा मांगों को शासकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। आधुनिक समाज में राजनीतिक दलों का गठन विविध आधारों पर किया गया है।

राजनीतिक दलों के निर्माण में मनो-वैज्ञानिक आधार अर्थात् मानव स्वभाव में निहित प्रवृत्तियां प्रमुख हैं। मतैक्य एवं संगठन मानव स्वभाव की दो प्रमुख प्रवृत्तियां हैं।
समान स्वभाव एवं मूल्यों वाले व्यक्ति संगठित होकर राजनीतिक दल का निर्माण करते हैं। तथा फिर उन मूल्यों को बनाये रखने का प्रयास करते हैं। ब्रिटिश कंज़रवेटिव दल का गठन रूढ़िवादी व्यवस्था को बनाये रखने के समर्थक व्यक्तियों द्वारा किया गया था। कुछ व्यक्ति रूढ़िवादी व्यवस्था में परिवर्तन लाना चाहते थे तथा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उदारवादी दलों का निर्माण करते थे, जबकि कुछ लोग विगत युग की पुनरावृत्ति की आकांक्षा के आधार पर प्रतिक्रियावादी दलों का निर्माण करते थे।

मानव इतिहास में धर्म की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तथा आज भी अनेक देशों में धार्मिक नेता एवं पदाधिकारी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीति में हस्तक्षेप करते हैं। राजनैतिक दलों के सामाजिक संगठन में धर्म प्रमुख भूमिका निभाते रहे है। उदाहरण भारत में मुस्लिम लीग, अकाली दल, जनसंघ, हिन्दू महासभा जैसे दलों के सामाजिक संगठन में धर्म केन्द्रीय भूमिका निभाते रहे है।

राजनीतिक दलों के निर्माण में क्षेत्रीयता अथवा प्रादेशिकता भी एक प्रमुख आधार रहा है। प्रादेशिक हितों की रक्षा के लिए तथा प्रादेशिक समस्याओं के शीघ्र निपटारे के लिए कुछ प्रादेशिक दलों का निर्माण होता है। भारत में डी0एम0के0, तेलंगाना प्रजा समिति, असम गण परिषद, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा आदि।

राजनीतिक दल आर्थिक या वर्गीय आधारों पर भी संगठित होते हैं। मार्क्स के अनुसार राजनीतिक दलों तथा वर्गों का परस्पर सम्बन्ध राज्य व राजनीति के सिद्धान्त का केन्द्रीय बिन्दु होता है। अनेक अन्वेषणों से हमें यह पता चलता है, कि वर्गीय हित, दलीय सम्बद्धताओं तथा निर्वाचनों की पसन्द के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। तथा अधिकांश समाज में राजनीतिक दल निर्वाचक वर्गीय हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ब्रिटेन में श्रमिक दल, भारत में मजदूर दल, किसान यूनियन आदि हैं।

जाति, भारतीय समाज की आधारभूत विशेषता है। भारत में राजनैतिक दलों के सामाजिक संगठन को जाति हमेशा से प्रभावित करती रही है। स्वतन्त्रता से पूर्व जाति मुक्ति का आन्दोलन राजनैतिक दलों के गठन को प्रभावित करता रहा है। दलित वर्ग कल्याण लीग, बहिष्कृत हितकारिणी सभा, जस्टिस पार्टी इसके प्रमुख उदाहरण रहे हैं।

स्वतन्त्रता के पश्चात् निर्वाचन प्रतियोगिता में ‘जाति’ राजनैतिक गतिशीलता लाने वाला प्रमुख सामाजिक आधार बन गया। ‘जातीय संलयन’ और ‘जातीय विखण्डन’ राजनैतिक प्रक्रियाओं में केन्द्रीय भूमिका निभाने लगी। सभी राजनैतिक दल जातीय गणना के आधार पर उम्मीदवारों को तय करने लगे। वर्तमान समय में जातीय आधार पर राजनैतिक दलों के गठन का प्रमुख आधार रहा है। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

दलीय संगठन में विचारधारा भी प्रमुख भूमिका निभाती है। समाजवादी, लेनिनवादी और माओवादी विचारधाराओं पर आधारित अनेक दलों का निर्माण भारतीय राजनीति की प्रमुख विशेषता रही है।


Share it

The post राजनीतिक दल और दृबाव समूह appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2614 0
भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक https://vinayiasacademy.com/?p=2612 https://vinayiasacademy.com/?p=2612#respond Tue, 30 Jun 2020 06:27:58 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2612 Share itभारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक (Comptroller and Auditor General of India):- Vinayiasacademy.com भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक (Comptroller and Auditor General of India CAG कैग), भारतीय संविधान के अध्याय 5 द्वारा स्थापित एक प्राधिकारी है जो भारत सरकार तथा सभी प्रादेशिक सरकारों के सभी तरह के लेखों का अंकेक्षण करते है। वह सरकार के स्वामित्व वाली कम्पनियों का भी अंकेक्षण करते है। […]

The post भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक (Comptroller and Auditor General of India):-

Vinayiasacademy.com

भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक (Comptroller and Auditor General of India CAG कैग), भारतीय संविधान के अध्याय 5 द्वारा स्थापित एक प्राधिकारी है जो भारत सरकार तथा सभी प्रादेशिक सरकारों के सभी तरह के लेखों का अंकेक्षण करते है। वह सरकार के स्वामित्व वाली कम्पनियों का भी अंकेक्षण करते है। उसकी रिपोर्ट पर सार्वजनिक लेखा समितियाँ ध्यान देती है। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक एक स्वतंत्र संस्था के रूप में कार्य करते हैं। और इस पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता। भारत के नियंत्रण और महालेखा-परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं। नियन्त्रक एवं महालेखा-परीक्षक ही भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा का भी मुखिया होता है। इस समय पूरे भारत की इस सार्वजनिक संस्था में 58हजार से अधिक कर्मचारी काम करते हैं।
भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा-परीक्षक का कार्यालय 10 बहादुर शाह जफर मार्ग पर नई दिल्ली में स्थित है। वर्तमान समय में इस संस्थान के प्रमुख राजीव महर्षि हैं। वे भारत के 13वें नियन्त्रक एवं महालेखा-परीक्षक हैं। किसी भी कैग प्रमुख का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की उम्र, जो भी पहले होगा, की अवधि के लिए राष्टपति द्वारा नियुक्त किए जाते है। संस्था केन्द्र अथवा राज्य सरकार के अनुरोध पर किसी भी सरकारी विभाग की जाँच कर सकती है। अनुच्छेद 148 के अनुसार भारत का एक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक होगा। यह भारत सरकार की रिपोर्ट राष्ट्रपति को और राज्य सरकार की रिपोर्ट राज्य के राज्यपाल को देते है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के कार्य क्या है।

(1) वह भारत की संचित निधि , प्रत्येक राज्य की संचित और प्रत्येक संघ शाषित प्रदेश है, जहाँ विधानसभा हो, से सभी व्यय सम्बन्धी लेखाओं की लेखा परीक्षा करते है।

इसका वेतन संसद द्वारा निर्धारित होता हैं। अनु.148(4) के अनुसार नियंत्रक महकेखा-परिक्षक अपने पद पर न रह जाने के पश्चात, भारत सरकार के या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी और पद का पात्र नहीं होता है। संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत के साथ उसके दुर्व्योहर या अयोग्यता पर प्रस्ताव पारित कर इसे पद से हटाया जा सकता हैं। इसे लोक लेखा समिति का ‘आंख व कान’ कहा जाता हैं।

अब तक के नियन्त्रक एवं महालेखा-परीक्षक:-

Sl नाम कार्य काल

  1. वी० नरहरि राव 1948 – 1954
  2. ए० के० चन्द 1954 – 1960
  3. ए० के० राय 1960 – 1966
  4. एस० रंगनाथन 1966 – 1972
  5. ए० बक्षी 1972 – 1978
  6. ज्ञान प्रकाश 1978 – 1984
  7. त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी 1984 – 1990
  8. सी० एस० सोमैया 1990 – 1996
  9. वी० के० शुंगलू 1996 – 2002
  10. वी० एन० कौल 2002 – 2008
  11. विनोद राय 2008 – 2013
  12. शशिकान्त शर्मा़ 2013 -2017
  13. राजीव महर्षि 2017 – 2020-2021

Share it

The post भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2612 0
संविधान की आपातकालीन उपबंध (part-2) https://vinayiasacademy.com/?p=2610 https://vinayiasacademy.com/?p=2610#respond Tue, 30 Jun 2020 06:23:43 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2610 Share itVinayiasacademy.com उद्घोषणा का राज्‍यक्षेत्रीय विस्‍तार (Territorial extension of the proclamation) मूल संविधान में विशिष्‍ट तौर पर यह नहीं कहा गया था कि आपात की उद्घोषणा को भारत के किसी विशिष्‍ट भाग तक भी सीमित किया जा सकता है। इसका अर्थ यह निकाला जाता था कि समस्‍या चाहे देश के किसी विशिष्‍ट भाग तक ही सीमित […]

The post संविधान की आपातकालीन उपबंध (part-2) appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

Vinayiasacademy.com

  • उद्घोषणा का राज्‍यक्षेत्रीय विस्‍तार (Territorial extension of the proclamation)

मूल संविधान में विशिष्‍ट तौर पर यह नहीं कहा गया था कि आपात की उद्घोषणा को भारत के किसी विशिष्‍ट भाग तक भी सीमित किया जा सकता है। इसका अर्थ यह निकाला जाता था कि समस्‍या चाहे देश के किसी विशिष्‍ट भाग तक ही सीमित क्‍यों न हो परंतु आपात की उद्घोषणा पूरे देश के लिये की जाएगी। 42वे संविधान संशोधन 1976 द्वारा राष्‍ट्रपति को य‍ह अधिकार प्रदान किया गया है, कि वह आपात की उद्घोषणा को पूरे भारत या उसके किसी विशिष्‍ट क्षेत्र तक भी सीमित रख सकते है। यह संशोधन युक्तियुक्तकरण‍त और तर्कसंगत है जैसे यदि संकट लद्दाख पर हो तो यह आवश्‍यक नहीं है कि कन्‍याकुमारी में भी आपातकाल लागू किया जाये। संकट किस क्षेत्र पर है, इसका निर्णय राष्‍ट्रपति करेगा। यहाँ राष्‍ट्रपति के निर्णय का अर्थ मंत्रिमंडल के निर्णय से है।

  • आपात का अनुमोदन और अवधि (Approval and duration of emergency)

44वें संविधान संशोधन 1978 से पूर्व उद्घोषणा दो मास तक की अवधि तक विधिमान्‍य और प्रवर्तन में रहती थी। यदि वह दो मास की अवधि के समाप्‍त होने से पूर्व संसद के दोनों सदन सामान्‍य बहुमत के संकल्‍प द्वारा उसका अनुमोदन कर देते थे, तो वह उद्घोषणा अनिश्चित काल तक ( जब तक मंत्रिपरिषद चाहे तब तक ) बनी रह सकती थी।

44वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा यह प्रावधान किया गया था कि आरंभ में उद्घोषणा एक माह की अवधि तक प्रवृत्‍त रहेगी। यदि संसद के दोनों सदन एक माह के भीतर विशेष बहुमत द्वारा संकल्‍प पारित कर देते हैं, तो वह दूसरा संकल्‍प पारित किये जाने की तिथि‍ से छ: माह 6 महीने तक बनी रहेगी। प्रत्‍येक छ: माह के पश्‍चात् उद्घोषणा की अवधि को आगे बढ़ाने के लिये पुन: विशेष बहुमत से अनुमोदन आवश्‍यक होता है। प्रत्‍येक अनुमोदन से उद्घोषणा को केवल छ: माह का जीवन-काल प्राप्‍त होता है। और उसे नया जीवनकाल प्राप्‍त करने के लिये पुन: विशेष बहुमत के अनुमोदन की आवश्‍यकता लेनी होती है।
यदि लोकसभा का विघटन हो गया है तो ऐसी स्थिति में राज्‍यसभा उद्घोषणा का अनुमोदन करेगी और लोकसभा का पुनर्गठन के पश्‍चात् ही पहली बैठक के 30 दिनों के भीतर उद्घोषणा का लोकसभा द्वारा अनुमोदन आवश्‍यक है। ध्‍यातव्‍य है कि जब लोकसभी अस्तित्‍व में न हो और केवल राज्‍यभा द्वारा ही आपात उद्घोषणा का अनुमोदन किया जा रहा हो, तब भी उद्घोषणा की अवधि एक बार में छ: माह से अधिक नहीं हो सकती है।

(Notes:- विशेष बहुमत का अर्थ है कि संकल्‍प सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्‍यों के 2/3 बहुमत से पारित हो और साथ ही साथ यह संख्‍या सदन की कुल संख्‍या का बहुमत भी हो।)

  • उद्घोषणा की स‍माप्ति (Revocation of the proclamation)

अनुच्‍छेद 352 के आधार पर की गई आपातकालीन की उद्घोघणा तीन तरह से समाप्‍त हो सकती है –

यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर संसद के दोनों सदन विशेष बहुमत से उद्घोषणा का अनुमोदन या काल विस्‍तार नहीं करते तो वह स्‍वत: समाप्‍त हो जाती है।

राष्‍ट्रपति जब चाहे उद्घोषणा को वापस ले सकता है। उद्घोषणा को वापस लेने के लिये संसद के अनुमोदन की आवश्‍यकता नहीं होती।

यदि लोकसभा अपनी कुल संख्‍या के कम से कम 1/10 सदस्‍यों के हस्‍ताक्षर द्वारा राष्‍ट्रपति को यह सूचित करती है, कि उद्घोषणा को वापस ले लिया जाए तो ऐसी सूचना के 14 दिनों के भीतर लोकसभा की विशेष बैठक बुलाना अनिवार्य होता है, जिसमें संकल्‍प पर विचार होता है, लेकिन संकल्‍प पारित किये जाने के लिये विशेष बहुमत का प्रावधान नहीं होता है। इसका अर्थ यह है, यदि इस बैठक में साधारण बहुमत से आपात की उद्घोषणा को वापस लेने का संकल्‍प पारित हो जाता है तो उद्घोषणा समाप्‍त हो जाएगी।

  • आपात उद्घोषणा के प्रभाव (Effects of emergency proclamation)

भारतीय राज्‍यव्‍यवस्‍था पर आपात की उद्घोषणा का बहुत व्‍यापक प्रभाव पड़ता है। संघ की कार्यपालिका को अपूर्व शक्तियॉं मिल जाती हैं। आष्‍ट्रीय आपात की उद्घोषणा का विभिन्‍न अंगों पर निम्‍नलिखित प्रभाव पड़ता है।

कार्यपालिका पर प्रभाव: आपात की उद्घोषणा के समय केन्‍द्र की कार्यपालिका शक्ति का वितर किसी राज्‍य को यह निर्देश देने तक हो जाएगा कि राज्‍य अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग किस प्रकार करेगा। इस प्रकार राज्‍य सरकार को केन्‍द्र सरकार के निर्देशों के तहत शासन चलाना होता है। यदि आपात किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित है तब भी अन्‍य राज्‍यों को निर्देश दिया जा सकेगा। सामान्‍य समय में राज्‍यों को केवल कुछ विषयों के बारे में ही निर्देश दिया जा सकता है। परन्‍तु आपात की उद्घेाषणा के समय राज्‍यों को किसी भी विषय के बारे में निेर्दश दिया जा सकता है।

विघायिका पर प्रभाव: राष्‍ट्रीय आपात के समय संसद, राज्‍य सूची के किसी भी विषय पर विधि बना सकती है। और राष्‍ट्रपति राज्‍यसूची के किसी भी विषय पर अध्‍यारोहण करने की शक्ति मिल जाती है। इस प्राकर संसद राष्‍ट्रहित में तुरंत कार्य करने में समर्थ हो जाती है। और उसे राज्‍य द्वारा कदम उठाए जाने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। इस प्रकार संविधान एक प्रकार से ऐकिक हो जाता है। (ध्‍यातव्‍य है कि राष्‍ट्रीय आपात की उद्घेषणा से राज्‍य विधानमंडल को लिनंबित नहीं किया जाता किंतु केंद्र और राज्‍यों के बीच विधायी शक्तियों के समान्‍य विभाजन का निलंबन हो जाता है।)

वित्‍तीय वितरण पर प्रभाव: राष्‍ट्रीय आपात की घोषाणा के प्रवर्तन के समय राष्‍ट्रपति केन्‍द्र और राज्‍य के मध्‍य राजस्‍व वितरण से संबंधित उपबंधों को संशोधित कर सकते है। ये संशोधन उस वित्‍तीय वर्ष के अंत तक जारी रहते हैं, जिसमें आपात की उद्घोश्‍ज्ञणा समाप्‍त होती है। राष्‍ट्रपति द्वारा किया गया कोई भी संशोधन यथाशीघ्र संसद के प्रत्‍ये सदन के समक्ष रखे जाते हैं।

लोकसभा व विधानसभाओं के कार्यकाल पर प्रभाव: राष्‍ट्रीय आपात की घोषणा के दौरान संसद विधि द्वारा लोकसभा व किसी भी विधानसभा कार्यकाल एक बार में एक वर्ष के लिये बढ़ा सकती है। कार्यकाल कितनी भी बार बढ़ाया जा सकता है, परंतु एक बार में एक वर्ष तक के लिये ही बढ़ेगा। आपात की उद्घोषणा समाप्‍त होने के पश्‍चात् कार्रूकाल का विस्‍तार छ:माह से अधिक नहीं होगा।

मूल अधिकारों पर प्रभाव: आपात के दौरान मूल अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभावों को अनुच्‍छेद 358 और 359 में स्‍पष्‍ट किया गया है। जिनका विवरण निम्‍न है –

अनुच्‍छेद 358 के अनुसार आपात के दौरान अनुच्‍छेद 19 का स्‍वत: निलंबन होता है। इसके लिये कोई पृथक घोषणा नहीं करनी पड़ती या नहीं की जाती है। अनुच्‍छेद 19 का निलंबन युद्ध और बाह्य आक्रमण के समय ही होता है, सशस्‍त्र विद्रोह के कारण घोषित आपात की स्थिति में नहीं। अनुच्‍छेद 358 केवल उन्‍हीं विधियों को सुरक्षा प्रदान करता है, जिनका सीधा संबंध आपातकाल के साथ है और जिनमें इस आशय की स्‍पष्‍ट घोषणा की गई है। ऐसे कानूनों केतहत दिये गये आदेशों को भी यह सुरक्षा प्राप्‍त होती है। आपात की उद्घोषणा के समाप्‍त होते ही अनुच्‍छेद 19 पुन: जीवित हो जाता है।

मूल संविधान में उल्‍लेख था कि आपात के दौरान अनुच्‍छेद 359 के अनुसार राष्‍ट्रपति आदेश निकालकर किसी भी मूल अधिकार का निलंबन कर सकते है। निलंबन कितने समय के लिये होगा इसकी घोषणा राष्ट्रिपति के आदेश से ही की जाएगी। ’44वे संविधान संशोधन 1978′ के द्वारा अनुच्‍छेद 359 पर यह शर्तें आरोपित कर दी गई कि-

अनुच्‍छेद 359 के तहत जारी आदेश से अनुच्‍छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्‍त मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकेगा।

संसद द्वारा पारित किसी कानून को अनुच्‍छेद 359 के तहत उन्‍मुक्ति तभी प्राप्‍त होगी, जब उस कानून में स्‍पष्‍ट उल्‍लेख किया गया हो कि उसका संबंध उस समय लागू आपात की उद्घोषणा से है। ऐसे कानूनों के तहत दिय गए कार्यकारी आदेशों को भी यह उन्‍मुक्ति हासिल होगी।

राष्‍ट्रीय आपात की घोषणा

अनुच्‍छेद 352 के तहत पहली उद्घोषणा के चीनी आक्रमण के कारण 26-10-1962 को की गई और यह 10-1-1968 तक जारी रही। अत: 1965 में पाकिस्‍तान के विरूद्ध हुए युद्ध में नया आपातकाल जारी करने की आवश्‍यकता नहीं हुई। 
दूसरी उद्घोषणा पाकिस्‍तान द्वारा अघोषित युद्ध के आधर पर 3-12-1971 को की गई। दूसरी उद्घोषणाजब प्रवर्तन में थी उसी समय ‘आभ्‍यांतरिक (आंतरिक) अशांति‘ के नाम पर 25-6-1975 को तीसरी उद्घोषणा की गई। दूसरी और तीसरी उद्घोषणा को 21-3-1977 को वापस ले‍ लिया गया। इसके बाद अभी तक किसी भी राष्‍ट्रीय आपात की घोषणा नहीं हुई।

Vinayiasacademy.com

  • राज्‍य आपात या राष्‍ट्रपति शासन (State emergency or President’s rule):-

किसी भी राज्‍य में राज्‍य आपात या राष्‍ट्रपति शासन दो आधारों पर ही लगाया जा सकता है-

अनुच्‍छेद 356 के अनुसार यदि राष्‍ट्रपति को यह समाधान हो जाता है, कि ऐसी स्थिति उत्‍पन्‍न हो गई है जिसमें राज्‍य का शासन संवैधानिक उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है। राष्‍ट्रपति को यह समाधान राज्‍यपाल की रिपोर्ट के आधार पर भी हो सकता है, और अन्यथा भी। संविधान में इस स्थिति को ‘संवैधानिक तंत्र का टूट जाना‘ के रूप में अभिव्‍यक्‍त किया गया है।

अनुच्‍छेद 365 में उल्‍लेख है कि यदि कोई राज्‍य अनुच्‍छेद 256 और 257 के तहत केन्‍द्र द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन नहीं करता है या नहीं कर रहा है या पालन करने में असमर्थ है, तो राष्‍ट्रपति के लिये यह निष्‍कर्ष निकालना विधिपूर्ण (Lawful) होगा कि राज्‍य की सरकार को संवैधानिक उपबंधों के अनुासर नहीं चलाया जा सकता है और अनुच्‍छेद 356 के तहत उद्घोषणा करना विधिसंगत होगा।

  • उद्घोषणा की अवधि और अनुमोदन (Duration and approval of the proclamation)

राष्‍ट्रपति द्वारा अनुच्‍छेद 356 के तहत की जाने वाली प्रत्‍येक उद्घोषणा संसदीय अनुमोदन की अपेक्षा रखती है। इन्‍हें निम्‍नलिखित बिंदुओं के माध्‍यम से समझा जा सकता है-

राष्‍ट्रपति कभी भी ऐसी उद्घोषणा कर सकता है, और वह तुरंत प्रभाव से लागू हो जाती है। दो माह की अवधि तक वह संसदीय अनुमोदन के बिना प्रवृत्‍त रह सकती है।

यदि संसद के दोनों सदन उद्घोषणा लागू होने के दो माह के भीतर उसका अनुमोदन न कर दें तो यह अवधि पूरी होने पर वह स्‍वत: समाप्‍त हो जाती है। अनुमोदन के लिये दोनों सदनों का साधारण बहुमत ही पर्याप्‍त होता है।

यदि उद्घोषणा किये जाने के समय लोकसभा विघटित हो या इन दो महीनों की अवधि के भीतर उद्घोषणा का अनुमोदन किये बिना वह विघटित हो जाए किंतु राज्‍यसभा ने उद्घोषणा का अनुमोदन कर दिया हो, तो लोकसभा के पुनर्गठन तक वह लागू रहेगी। नई लोकसभा जिस दिन पहली बार बैठेगी, उसके 30 दिनों की अवधि के भीतर यदि वह उद्घोषणा का अनुमोदन कर देती है तो ठीक नहीं तो यह अवधि पूरी होते ही उद्घोषणा स्वयं समाप्‍त हो जाएगी।

दोनों सदनों से अनुमोदन होने के बाद उद्घोषणा 6 माह की अवधि के लिये वैध होगी। अवधि की गणना मूल उद्घोषणा की तिथि से होती है। जितनी बार उद्घोषणा को बढ़ाया जाएगा, वह हर बार 6 माह के लिये ही बढ़ेगी। यदि लोकसभा इस दौरान विघटित हो गई तो वह केवल राज्‍यसभा के अनुमोदन से बढ़ जाएगी, किंतु लोकसभा को अपने पुनर्गठन के बाद पहली बैठक के 30 दिनों के भीतर उसका अनुमोदन करना होगा, नहीं तो वह स्वयं रद्द हो जायेगी।

एक वर्ष तक उद्घोषणा को उपरोक्‍त विधि से बढ़ाया जा सकता है, किंतु यदि उसे एक वर्ष की अवधि के बाद भी बढ़ाना हो तो उसके लिये दो अन्‍य शर्तें पूरी होनी जरूरी है-

संपूर्ण देश या उसके किसी भाग में अनुच्‍छेद 352 के तहत आपात की उद्घोषणा लागू हो तथा

निर्वाचन आयोग ने प्रमाणित किया हो कि वर्तमान में संबद्ध राज्‍य के साधारण चुनाव कराने में कठिनाइयों के कारण उद्घोषणा को प्रवृत्‍त बनाए रखना आवश्‍यक है।

गौरतलब है कि यह प्रावधान मूल संविधान में नहीं था, इसे ’44वे संशोधन, 1978′ द्वारा जनता पार्टी की सरकार ने अनुच्‍छेद 356(5) जोड़कर शामिल किया था।
शर्तें पूरी होने पर भी किसी राज्‍य में अनुच्‍छेद 356 के तहत की गई उद्घोषणा की अधिकतम अवधि 3 वर्ष ही हो सकती है।

उद्घोषणा को वापस लेना बिल्‍कुल आसान होता है। राष्‍ट्रपति जब चाहे, किसी पश्‍चात्वर्ती उद्घोषणा द्वारा मूल उद्घोषणा को वापस ले सकते है। ऐसा करने के लिये संसद के अनुमोदन की आवश्‍यकता नहीं होती है।

  • उद्घोषणा का न्‍यायिक पुनर्विलोकन (Judicial review of the proclamation)

वर्ष 1978 में जनता पार्टी की सरकार ने 44वें संशोधन द्वारा उस उपबंध को संविधान से बाहर कर दिया, जो राष्‍ट्रपति के समाधान की न्‍यायिक पुनर्विलोकन से परे करता था तथा ‘एस.आर. बोम्‍मई बनाम भारत संघ 1994‘ में उच्‍चतम न्‍यायालय ने स्‍पष्‍ट किया कि सीमित आधारोंपर उद्घोषणा का न्‍यायिक पुनर्विलोकन हो सकेगा। इस संबंध में न्‍यायालय केवल दो बातों की जॉंच करेगा-

क्‍या राष्‍ट्रपति का समाधान अनुचित है, या असद्भावपूर्ण हे या पूर्णत: बाह्य और असंगत कारणों पर आधारित है?

क्‍या अनुच्‍छेद 356 के तहत निष्‍कर्ष पर पहुँचने के लिये राष्‍ट्रपति के पास पर्याप्‍त सामग्री मौजूद थी? राष्‍ट्रपति के समक्ष ऐसी सामग्री होनी चाहिये जिस पर विचार करके कोई तार्किक व्‍यक्ति अनुच्‍छेद 356 के प्रयोग करने के निष्‍कर्ष पर पहॅुंचता है।

उद्घोषणा का प्रभाव

यदि किसी राज्‍य में अनुच्‍छेद 356 के तहत उद्घोषणा की जाती है तो राष्‍ट्रपति-

राज्‍य सरकार के सभी या कोई कृत्‍य अपने हाथ में ले सकता है।

राज्‍यपाल या किसी अन्‍य निकाय या प्राधिकारी में निहित या प्रयुक्‍त सभी या कोई शक्तियां अपने हाथ में ले सकते है।

वह घोषणा कर सकताहै कि राज्‍य विधानमंडल की शक्तियाँ संसद के द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन प्रयोग की जाएगी।

वह ऐसे आनुषंगिक या पारिणामिक उपबंध कर सकता है, जो उद्घोषणा को प्रभावी करने के लिये आवश्‍यक व वांछनीय प्रतीत हों। इसके अंतर्गत संविधान के किसी उपबंध का निलंबन भी शामिल हो सकते है।

व्‍यवहारिक स्थिति यह है कि अनुच्‍छेद 356 के तहत उद्घोषणा करने पर, राष्‍ट्रपति राज्‍य की मंत्रिपरिषद को बर्खास्‍त कर देता है। राज्‍य का राज्‍यपाल, राष्‍ट्रपति के नाम पर राज्‍य सचिव की सहायता से अथवा राष्‍ट्रपति द्वारा नियुक्‍त किसी सलाहकार की सहायता से राज्‍य का शासन चलाता है। यही कारण है कि व्‍यवहार में इसे ‘राष्‍ट्रपति शासन’ कहा जाता है।

अनुच्‍छेद 356 के तहत राष्‍ट्रपति विधानसभा को विघटित या निलंबित कर सकते है। इस स्थिति में संसद, राज्‍य के विधायक और बजट पारित करती है। जब कोई विधानसभा इस प्रकार निलंबित या विघटित कर दी जाती है तो-

संसद राज्‍य के लिये कानून बनाने की शक्ति राष्‍ट्रपति या किसी अन्‍य प्राधिकारी को दे सकती है या दे दी जाती है। यह शक्ति राष्‍ट्रपति को दी जाती है।

यदि लोकसभा का सत्र न चल रहा हो तो राष्‍ट्रपति राज्‍य की संचित निधि से संबंधित लंबित विधेयकों को अनुमति दे सकता है।

यदि संसद का सत्र न चल रहा हो तो राष्‍ट्रपति संबंधित राज्‍य के लिये अध्‍यादेश (ordinance) भी जारी कर सकता है।

अनुच्‍छेद 356 को उद्घोषणा के तहत राष्‍ट्रपति न तो उच्‍च न्‍यायालय में निहित या प्रयुक्‍त शक्तियॉं अपने हाथ में ले सकता है और न ही उन उपबंधों को पूर्णत: या अंशत: निलंबित कर सकता है जिनका संबंध उच्‍च न्‍यायालयों से होता है।

अनुच्‍छेद 356 की उद्घोषणा के दौरान संसद या राष्‍ट्रपति द्वारा बनायी गई विविधियॉं उद्घोषणा की समाप्ति के बाद स्‍वत: समाप्‍त नहीं होती अपितु वे तब तक प्रवर्तन में रहती हैं, जब तक कि सक्षम विधानमंडल या प्राधिकारी द्वारा निरसित, संशोधित नहीं कर दी जाती है।

वित्‍तीय आपात (Financial emergency):-

भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 360(1) के अनुसार, यदि राष्‍ट्रपति को यह समाधान हो जाता है कि, भारत या उसके किसी राज्‍यक्षेत्र के किसी भाग का वित्‍तीय स्‍थायित्‍व या शाखा संकट में है, तो वह देश में वित्‍तीय आपातकालीन की उद्घोषणा कर सकते है। ध्‍यातव्‍य है कि राष्‍ट्रपति के समाधान का अर्थ यहॉं मंत्रि-परिषद के समाधान से होता है।

आरंभ में उद्घोषणा दो माह तक प्रवृत्‍त रहती है, यदि दो माह की अवधि के भीतर संसद, साधारण बहुमतों से  उद्घोषणा का अनुमोदन कर देती है, तो उद्घोषणा अनिश्चित काल तक बनी रह सकती है। क्‍योंकि अनुच्‍छेद 360 में उद्घोषणा के लिये अधिकतम अवधि निर्धारित नहीं की गई है। यदि लोकसभा अस्तित्‍व में नहीं है तो अनुमोदन राज्‍यसभा द्वारा किया जाएगा और उद्घोषणा का नवगठित लोकसभा के द्वारा अपनी पहली बैठक के 30 दिनों के भीतर अनुमोदन आवश्‍यक होती है, अन्‍यथा 30 दिन की अवधि पूरी होते ही उद्घोषणा स्‍वत: समाप्‍त हो जाएगी।

वित्‍तीय आपात की उद्घोषणा को किसी भी पश्‍चातवर्ती उद्घोषणा द्वारा वापस लिया जा सकता है। इसके लिये संसद के अनुमोदन की आवश्‍यकता नहीं होती है। अभी तक भारत में एक बार भी इसका प्रयोग नहीं हुआ है।

  • वित्‍तीय आपात के प्रभाव (Effect of financial emergency)

अनुच्‍छेद 360(3) और (4) में यह बताया गया है, कि वित्‍तीय आपात के क्‍या प्रभाव होंगे? ये प्रभाव निम्‍नलिखित होते हैं-

केंद्र सरकार राज्‍यों को वित्‍तीय औचित्‍य संबंधी सिद्धांतों का पालन करने का निर्देश दे सकती है। इसके अलावा ऐसे निर्देश भी दिये जा सकते हैं, जिन्‍हें मूल निर्देशों की पूर्ति हेतु राष्‍ट्रपति आवश्‍यक समझे।

इन निर्देशों के अंतर्गत किसी राज्‍य सरकार से यह अपेक्षा की जा सकती है, कि वह राज्‍य के अधीन सेवा करने वाले सभी या किन्‍हीं वर्गों के व्‍यक्तियों के वेतन और भत्‍तों में कटौती करें।

यह निर्देश भी दिया जा सकता है कि राज्‍य विधानमंडल द्वारा पारित धन विधोयक  और  अनुच्‍छेद 207 के अंतर्गत आने वाले अन्‍य विधेयक, राष्‍ट्रपति के विचारण हेतु आरक्षित किये जाए।

राष्‍ट्रपति यह निर्देश भी दे सकते है कि केंद्र सरकार के सभी या किसी वर्ग के कर्मचारियों के वेतन और भत्‍तों में कटौती की जाए। यह कटौती उच्‍चतम न्‍यायालय व उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों के वेतन और भत्‍तों में भी की जा सकती है।

अनुच्‍छेद 352 के तहत राष्‍ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य सरकार की सहमति के बिना उस राज्‍य में प्रभावी नहीं हो सकती।

जम्‍मू-कश्‍मीर का राज्‍यपाल, भारत के राष्‍ट्रपति की पूर्व सहमति से भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 356 या जम्‍मू-कश्‍मीर के संविधान की धारा 92 के तहत राज्‍यपाल शासन की घोषणा कर सकता है।

Important Notes:-

  • संविधान के अनुच्‍छेद 360 (वित्‍तीय आपात) के उपबंध जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य पर लागू नहीं होते हैं।
  • भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 352 का शीर्षक ‘आपात की उद्घोषणा’ होता है।
  • भारतीय संविधान में अनुच्‍छेद 356 में आपात या आपातकाल शब्‍द का कहीं भी प्रयोग नहीं हुआ है।
  • 44वे संविधान संशोधन द्वारा अनुच्‍छेद 352 के आंतरिक अशांति के स्‍थान पर सशस्‍त्र विद्रोह शब्‍द रखा गया है।
  • अनुच्‍छेद 352 के तहत राष्‍ट्रीय आपात की उद्घोषणा और अनुच्‍छेद 356 के तहत राष्‍ट्रपति शासन का सीमित आधारों पर न्‍यायिक पुनर्विलोकन संभव होता है।
  • संविधान के भाग 18 में अनुच्‍छेद 352-360 तक आपातकालीन उपबंधों का उल्‍लेख किया गया है।
  • आपात उपबंध जर्मनी के वाइमर संविधान से लिये गए हैं।
  • चीनी आक्रमण के समय उनुच्‍छेद 352 के तहत की गई आपातकाल की पहली उद्घोषण (1962) के समय प्रधानमंत्री “पंडित जवाहरलाल नेहरू” व राष्‍ट्रपति “डॉ एस राधाकृष्‍णन” थे।
  • दूसरी आपात उद्घोषणा (1971) पाकिस्‍तान द्वारा आक्रमण के समय पर की गई। इस समय प्रधानमंत्री “श्रीमती इंदिरा गांधी” व राष्‍ट्रपति “वी वी गिरि” थे।
  • तृतीय आपातकाल उद्घोषणा 1975 में प्रधानमंत्री “श्रीमती इंदिरा गांधी” ने बिना मंत्रिमंडल के परामर्श के आंतरिक अशांति के आधार पर राष्‍ट्रपति “फख़रूद्दीन अली अहमद” से करवाया था। इस समय दूरी उद्घोषणा प्रवर्तन में थी।
  • अनुच्‍छेद 352 के तहत आपात की उद्घेाषणा करने के लिये राष्‍ट्रपति को मंत्रिमंडल की लिखित सूचना देना आवश्‍यक होता है, परंतु वापस लेने के लिये लिखित सूचना की आवश्‍यकता नहीं होती है।
  • संविधान के अनुच्‍छेर 19 का निलंबन केवल युद्ध और बाह्य आक्रमण के समय ही होता है।
  • आपात के दौरान संसद लोकसभा या किसी भी राज्‍य विधानसभा का कार्यकाल एक बार में एक वर्ष के लिये बढ़ा सकती है।
  • राज्‍यों में राष्‍ट्रपति शासन की उद्घोषणा अनुच्‍छेद 356(1) के तहत होती है।
  • अनुच्‍छेद 356 के तहत उद्घोषणा का अनुमोदन संसद साधारण बहुमत से करती है। जबकि अनुच्‍छेद 352 का अनुमोदन विशेष बहुमत से होता है।
  • किसी राज्‍य में राष्‍ट्रपति शासन अधिकत 3 वर्ष तक लागू रह सकती है।
  • एक वर्ष से अधिक राष्‍ट्रपति शासन लागू करने के लिये संसद अनुमोदन तभी दे सकती है जब अनुच्‍छेद 352 के तहत राष्‍ट्रीय आपातकाल लागू हो और निर्वाचन आयोग उस राज्‍य के लिये निर्वाचन कराने में असमर्थ होती है।
  • अनुव्‍छेद 356 का संबंधित राज्‍य के उच्‍च न्‍यायालय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
  • अनुव्‍छेद 352 के तहत की गई उद्घोषणा, 1 माह तक और अनुच्‍छेद 356 और 360 के तहत की गई उद्घोषणा 2 माह तक बिना संसदीय अनुमोदन के प्रवृत्‍त रहती है। अब तक सर्वाधिक दुरूपयोग अनुच्‍छेद 356 का हुआ है।
  • अनुच्‍छेद 356 के तहत राष्‍ट्रपति शासन एक बार में सर्वाधिक समय पंजाब में रहा है। राष्‍ट्रपति शासन सर्वप्रथम पेप्‍सू (वर्तमान पंजाब) में लागू किया गया।
  • जम्‍मू-काश्‍मीर में ‘राष्‍ट्रपति शासन’ की जगह ‘राज्‍यपाल शासन’ लगता है।
  • भारत में कभी भी वित्‍तीय आपात नहीं लगा है।

Share it

The post संविधान की आपातकालीन उपबंध (part-2) appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2610 0
संविधान की आपातकालीन उपबंध (part-1) https://vinayiasacademy.com/?p=2608 https://vinayiasacademy.com/?p=2608#respond Tue, 30 Jun 2020 06:07:59 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2608 Share itसंविधान की आपातकालीन उपबंध :- Vinayiasacademy.com 1.संविधान के भाग XVIII 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन उपबंध उल्लिखित हैं। ये उपबंध केंद्र को किसी भी असामान्य स्थिति से प्रभावी रूप से निपटने में सक्षम बनाते हैं। संविधान में इन उपबंधों को जोड़ने का उद्देश्य देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता, लोकतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था […]

The post संविधान की आपातकालीन उपबंध (part-1) appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

संविधान की आपातकालीन उपबंध :-
Vinayiasacademy.com

1.संविधान के भाग XVIII 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन उपबंध उल्लिखित हैं। ये उपबंध केंद्र को किसी भी असामान्य स्थिति से प्रभावी रूप से निपटने में सक्षम बनाते हैं।
संविधान में इन उपबंधों को जोड़ने का उद्देश्य देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता, लोकतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था तथा संविधान की सुरक्षा करना है।

2.आपातकालीन स्थिति में केंद्र सरकार सर्व-शक्तिमान हो जाती है, तथा सभी राज्य, केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाते हैं। ये संविधान में औपचारिक संशोधन किए बिना ही संघीय ढांचे को एकात्मक ढांचे में परिवर्तित कर देते हैं। सामान्य समय में राजनैतिक व्यवस्था का संघीय स्वरूप से आपातकाल में एकात्मक स्वरूप में इस प्रकार के परिवर्तन भारतीय संविधान की अद्वितीय विशेषता होती है। इस परिप्रेक्ष्य में “डाॅ. बी. आर. अंबेडकर” ने संविधान सभा में कहा था कि-

3.अमेरिका सहित सभी संघीय व्यवस्थाएं संघवाद के एक कड़े स्वरूप में हैं। किसी भी परिस्थिति में ये अपना स्वरूप और आकार परिवर्तित नहीं कर सकते हैं। दूसरी ओर भारत का संविधान, समय एवं परिस्थिति के अनुसार एकात्मक व संघीय दोनों प्रकार के हो सकते है। यह इस प्रकार निर्मित किया गया है, कि सामान्यतः यह संघीय व्यवस्था के अनुरूप कार्य करता है। परंतु आपातकाल में यह एकात्मक व्यवस्था के रूप में कार्य करते है।

संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल को निर्दिष्ट किया गया है-

  1. युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह के कारण आपातकाल (अनुच्छेद 352 ), को राष्ट्रीय आपातकाल के नाम से जाना जाता है। किंतु संविधान ने इस प्रकार के आपातकाल के लिए ‘ आपातकाल की घोषणा ‘ वाक्य का प्रयोग किया गया है।
  2. राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता के कारण आपातकाल को राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) के नाम से भी जाना जाता है। इसे दो अन्य नामों से भी जाना जाता है -राज्य आपातकाल अथवा संवैधानिक आपातकाल। किंतु संविधान ने इस स्थिति के लिए आपातकाल शब्द का प्रयोग नहीं किया है ।
  3. भारत की वित्तीय स्थायित्व अथवा साख के खतरे के कारण अधिरोपित आपातकाल, वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) कहा जाता है।

राष्ट्रीय आपातकाल:-

घोषणा के आधार पर

  • यदि भारत की अथवा इसके किसी भाग को सुरक्षा को युद्ध अथवा बाहय आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह के कारण खतरा उत्पन हो गया हो तो अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकते है। राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा वास्तविक युद्ध अथवा बाहध आक्रमण अथवा सशक्त विद्रोह से पहले भी कर सकते है। यदि वह समझे कि इनका आसन खतरा है ।
  • राष्ट्रपति युद्ध, बाहध आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह अथवा आसन खतरे के आधार पर वह विभिन उद्घोषणाए भी जारी कर सकता है। चाहे उसने पहले से कोई उद्घोषणा की हो या न की हो या ऐसी उद्घोषणा लागू हो। यह उपबंध 1975 में 38वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा जोड़ा गया है।
  • जब राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा युद्ध अथवा बाहय आक्रमण के आधार पर की जाती है, तब इसे बाहय आपातकाल के नाम से जाना जाता है। दूसरी ओर, जब इसकी घोषणा सशस्त्र विद्रोह के आधार पर की जाती है, तब इसे श् आंतरिक आपात काल श् के नाम से जाना जाता है ।
  • राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा संपूर्ण देश अथवा केवल इसके किसी एक भाग पर लागू हो सकती है। 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम ने राष्ट्रपति को भारत के किसी विशेष भाग पर राष्ट्रीय आपातकाल लागू करने का अधिकार प्रदान किया है।
  • प्रारंभ में संविधान ने राष्ट्रीय आपातकाल के तीसरे आधार के रूप में श् आंतरिक गड़बड़ी श् का प्रयोग किया था, किंतु यह शब्द बहुत ही अस्पष्ट तथा विस्तृत अनुमान वाला था। अतः 1978 के 44 वें संशोधन अधिनियम द्वारा आंतरिक गड़बड़ी शब्द को श् सशस्त्र विद्रोह श् शब्द से विस्थापित कर दिया गया। अतः अब आंतरिक गड़बड़ी के आधार पर आपातकाल की घोषणा करना संभव नहीं है, जैसा कि 1975 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने किया था। किंतु राष्ट्रपति, राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा केवल मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश प्राप्त होने पर ही कर सकते है। इसका तात्यर्य यह है कि आपातकाल की घोषणा केवल मंत्रिमंडल की सहमति से ही हो सकता है न कि मात्र प्रधानमंत्री की सलाह से। 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बिना मंत्रिमंडल की सलाह के राष्ट्रपति को आपातकाल की घोषणा करने की सलाह दी और आपातकाल लागू करने के बाद मंत्रिमंडल को इस उद्घोषणा के बारे में बताया। 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम ने प्रधानमंत्री के इस संदर्भ में अकेले बात करने और निर्णय लेने की संभावना को समाप्त करने के लिए इस सुरक्षा का परिचय दिया है।
  • 1975 के 38वें संशोधन अधिनियम ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा न्यायिक समीक्षा की परिधि से बाहर रखा था। किंतु इस प्रावधान को 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम द्वारा समाप्त कर दिया गया। इसके अतिरिक्त मिनर्वा मिल्स मामले 1980 में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को अथवा इस आधार पर कि घोषणा को कि वह पूरी तरह बाह्मय प्रभाव तथा असंबद्ध तथ्यों पर या विवेक शून्य या हठधर्मिता के आधार पर की गयी हो तो अदालत में चुनौती दी जा सकती है ।

Share it

The post संविधान की आपातकालीन उपबंध (part-1) appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2608 0
भारत का चुनाव आयोग:- https://vinayiasacademy.com/?p=2606 https://vinayiasacademy.com/?p=2606#respond Tue, 30 Jun 2020 06:00:54 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2606 Share itभारत का चुनाव आयोग:- Vinayiasacademy.com भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) एक स्वायत्त एवं अर्ध-न्यायिक संस्थान है। जिसका गठन भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से विभिन्न से भारत के प्रातिनिधिक संस्थानों में प्रतिनिधि चुनने के लिए किया गया था। भारतीय चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को की गयी थी। Notes:- (गठन25 जनवरी 1950 (अब राष्ट्रीय मतदाता दिवस के […]

The post भारत का चुनाव आयोग:- appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

भारत का चुनाव आयोग:-
Vinayiasacademy.com

भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) एक स्वायत्त एवं अर्ध-न्यायिक संस्थान है। जिसका गठन भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से विभिन्न से भारत के प्रातिनिधिक संस्थानों में प्रतिनिधि चुनने के लिए किया गया था। भारतीय चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को की गयी थी।
Notes:- (गठन25 जनवरी 1950 (अब राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है)

संरचना:-
आयोग में वर्तमान में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। जब यह पहले पहल 1950 में गठित हुआ तब से और 15 अक्टूबर, 1989 तक केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त सहित यह एक एकल-सदस्यीय निकाय था। 16 अक्टूबर, 1989 से 1 जनवरी, 1990 तक यह आर. वी. एस. शास्त्री (मु.नि.आ.) और निर्वाचन आयुक्त के रूप में एस.एस. धनोवा और वी.एस. सहगल सहित तीन-सदस्यीय निकाय बनाए गए थे। 2 जनवरी, 1990 से 30 सितम्बर, 1993 तक. यह एक एकल-सदस्यीय निकाय बनाया गया और फिर 1 अक्टूबर, 1993 से यह तीन-सदस्यीय निकाय बन गए या नियुक्ति की गई।

मुख्य चुनाव आयुक्तों की सुची:-

सुकुमार सेन : २१ मार्च १९५० – १९ दिसम्बर १९५८

के. वी. के. सुंदरम : २० दिसम्बर १९५८ – ३० सितंबर १९६७

एस. पी. सेन वर्मा : १ अक्टूबर १९६७ – ३० सितंबर १९७२

डॉ॰ नगेन्द्र सिँह : 1 अक्टूबर 1972 – 6 फ़रवरी 1973

टी. स्वामीनाथन : 7 फ़रवरी 1973 – 17 जून 1977

एस. एल. शकधर : 18 जून 1977 – 17 जून 1982

आर. के. त्रिवेदी : 18 जून 1982 – 31 दिसम्बर 1985

आर. वी. एस शास्त्री : 1 जनवरी 1986 – 25 नवम्बर 1990

वी. एस. रमादेवी : 26 नवम्बर 1990 – 11 दिसम्बर 1990

टी. एन. शेषन : 12 दिसम्बर 1990 – 11 दिसम्बर 1996

एम. एस. गिल : 12 दिसम्बर 1996 – 13 जून 2001

जे. एम. लिंगदोह : 14 जून 2001 – 7 फ़रवरी 2004

टी. एस. कृष्णमूर्ति : 8 फ़रवरी 2004 – 15 मई 2005

बी. बी. टंडन : 16 मई 2005 – 28 जून 2006

एन गोपालस्वामी : 29 जून 2006 – 20 अप्रैल 2009

नवीन चावला : 21 अप्रैल 2009 – 29 जुलाई 2010

शाहबुद्दीन याकूब कुरैशी : 30 जुलाई 2010 – 10 जून 2012

वी. एस. संपत : 11 जून 2012 – 15 जनवरी 2015

एच॰ एस॰ ब्रह्मा : 16 जनवरी 2015 – 18 अप्रैल 2015[4]

नसीम जैदी : 19 अप्रैल 2015 – 5 जुलाई 2017

अचल कुमार ज्योति : 6 जुलाई 2017 – 22 जनवरी 2018

ओम प्रकाश रावत : 23 जनवरी 2018 – 1 दिसम्बर 2018

सुनील अरोड़ा : 2 दिसंबर 2018 – अक्तूबर 2021

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एवं कार्यावधि:-

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति करता है। मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या आयु 65 साल, जो पहले हो, का होता है जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या आयु 62 साल, जो पहले हो, का होता हैं। चुनाव आयुक्त का सम्मान और वेतन भारत के सर्वोच्च न्यायलय के न्यायधीश के सामान होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद द्वारा महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता हैं।

भारत निर्वाचन आयोग के:-
पास विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति आदि चुनाव से सम्बंधित सत्ता होती है। जबकि ग्रामपंचायत, नगरपालिका, महानगर परिषद् और तहसील एवं जिला परिषद् के चुनाव की सत्ता सम्बंधित राज्य निर्वाचन आयोग के पास होती है।

निर्वाचन आयोग का कार्य तथा कार्यप्रणाली:-

1 निर्वाचन आयोग के पास यह उत्तरदायित्व है, कि वह निर्वाचनॉ का पर्यवेक्षण, निर्देशन तथा आयोजन करवाये वह राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति, संसद, राज्य-विधानसभा के चुनाव करता है।
2 निर्वाचक नामावली तैयार भी करवाता है।
3 राजनैतिक दलॉ का पंजीकरण भी करते है।

  1. राजनैतिक दलॉ का राष्ट्रीय, राज्य स्तर के दलॉ के रूप मे वर्गीकरण, मान्यता देना, दलॉ-निर्दलीयॉ को चुनाव चिन्ह देना आदि कार्य भी करते हैं।
  2. सांसद/विधायक की अयोग्यता (दल बदल को छोडकर) पर राष्ट्रपति/राज्यपाल को कई बारी महत्वपूर्ण सलाह भी देते हैं।
  3. गलत निर्वाचन उपायों का उपयोग करने वाले व्यक्तियॉ को निर्वाचन के लिये अयोग्य घोषित करना।

निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ:-

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयानुसार अनु 324[1] में निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ कार्यपालिका द्वारा नियंत्रित नहीं हो सकती हैं। उसकी शक्तियां केवल उन निर्वाचन संबंधी संवैधानिक उपायों तथा संसद निर्मित निर्वाचन विधि से नियंत्रित होती है, निर्वाचन का पर्यवेक्षण, निर्देशन, नियंत्रण तथा आयोजन करवाने की शक्ति मे देश मे मुक्त तथा निष्पक्ष चुनाव आयोजित करवाना भी निहित होता है। जहां कही संसद विधि निर्वाचन के संबंध मे मौन है, वहां निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिये निर्वाचन आयोग असीमित शक्ति रखता है, यधपि प्राकृतिक न्याय, विधि का शासन तथा उसके द्वारा शक्ति का सदुपयोग होना चाहिए।
निर्वाचन आयोग विधायिका निर्मित विधि का उल्लघँन नहीं कर सकता है, और न ही ये स्वेच्छापूर्ण कार्य कर सकता है। उसके निर्णय न्यायिक पुनरीक्षण के पात्र होते है।
निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ निर्वाचन विधियों की पूरक है न कि उन पर प्रभावी तथा वैध प्रक्रिया से बनी विधि के विरूद्ध प्रयोग नहीं की जा सकती है।
यह आयोग चुनाव का कार्यक्रम निर्धारित करते है। चुनाव चिन्ह आवंटित करने तथा निष्पक्ष चुनाव करवाने के निर्देश देने की शक्ति भी रखता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी शक्तियों की व्याख्या करते हुए कहा कि वह एकमात्र अधिकरण है जो चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करे चुनाव करवाना केवल उसी का कार्य है।

‘जन-प्रतिनिधित्व एक्ट’ 1951 के अनु 14,15 भी राष्ट्रपति, राज्यपाल को निर्वाचन अधिसूचना जारी करने का अधिकार निर्वाचन आयोग की सलाह के अनुरूप ही जारी करने का अधिकार देते है

भारत मे निर्वाचन सुधार:-
निम्नलिखित बातों के माध्यम से हम समझ सकते हैं:-

  • प्रथम चरण-(1950 -1996)

1.मतदान की आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है।(61 वे संविधान संशोधन के अनुसार)।

2.फोटोयुक्त पहचान पत्र ही माननीय है।

3.evm का प्रचलन करते हैं।

  1. दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने पर पाबन्दी है।

5.उम्मीदवार की death पर चुनाव कैंसिल नही होता है।

  • द्वितीय चरण-1996-2000

1.राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति के चुनाव में क्रमसः 50-50,20-20 अनुमोदक व प्रस्तावक होते हैं।

2.जमानत धन 15000 रू तय की गई है।

3.1999 में पोस्टल बैलेट की सुरुआत हुई थी।

  • तृतीय चरण(2000-अबतक)

1.vvpat (Voter verifiable paper audit trail)

2.प्रॉक्सी मतदान।

3exitpoll प्रतिबंध।

4.nota का प्रावधान।

5.25 जनवरी राष्ट्रीय मतदाता दिवस।

6.20000 से ज्यादा चुुुनन होता है

o खर्च पर निर्वाचन आयोग को जानकारी।

7.पिंक बूथ

8.जीपीएस आधारित evm (Electronic voting machine

9.vvpat (Voter verifiable paper audit trail) से मत गड़ना

10.c- विजिल app(100 मिन.विवाद निपटने हेतु)।

अधिनियम संशोधन 1988 से इस प्रकार के संशोधन किये गये हैं।

  1. इलैक्ट्रानिक मतदान मशीन का प्रयोग किया जा सकेगा. वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव मे इनका सर्वत्र प्रयोग हुआ था तथा 2014 के बाद लगातार मतदान में इसका उपयोग होता आ रहा है।
  2. राजनैतिक दलों का निर्वाचन आयोग के पास अनिवार्य पंजीकरण करवाना होगा, यदि वह चुनाव लडना चाहे तो कोई दल तभी पंजीकृत होगा जब वह संविधान के मौलिक सिद्धांतों के पालन करे तथा उनका समावेश अपने दलीय संविधान मे करे।
  3. मतदान केन्द्र पर कब्जा, जाली मत।

इलेक्‍ट्रानिक मतदान मशीन (EVM):-

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (“ईवीएम”) 1999 के चुनावों से भाग में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग के कार्यान्वयन के लिए भारतीय जनरल और राज्य चुनावों में इस्तेमाल हो रही है। ईवीएम ने भारत में स्थानीय, राज्य और सामान्य (संसदीय) चुनावों में पेपर मतपत्रों का स्थान लिया है। ईवीएम की तम्पायता और सुरक्षा के बारे में पहले दावों का दावा किया गया था, जो कि सिद्ध नहीं हुआ है। दिल्ली उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों और विभिन्न राजनीतिक दलों से मांग के बाद, चुनाव आयोग ने मतदाता सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) प्रणाली के साथ ईवीएम लागू करने का फैसला किया था। भारतीय लोकसभा चुनाव 2014 में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में से 8 में वोटर वैरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल( Voter verifiable paper audit trail वीवीपीएटी) प्रणाली को पेश किया गया था।

इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के निर्माता, “इलेक्ट्रानिक्स कारपोरेशन आफ इंण्डिया लिमिटेड”, हैदराबाद और “भारत इलैक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड”, बेंगलुरु ने कहा है कि ईवीएम पूर्ण विश्वसनीय हैं। क्योंकि ईवीएम के लिए प्रोग्रामिंग ईसीआईएल और बीईएल (Programming ECIL and BEL) में सुरक्षित विनिर्माण सुविधा में की जाती है, (जहां इलेक्ट्रॉनिक रूप से संचालन लॉग होता है) और चिप निर्माताओं के साथ नहीं। ईवीएम और  वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल में नियंत्रण और बैलेट इकाइयों में एक छेड़छाड़-रोधी तंत्र भी होता है। जिसके द्वारा अवैध रूप से खोले जाने पर वे गैर-क्रियाशील हो जाते हैं। ईवीएम स्टैंडअलोन मशीनें हैं, इनमें रेडियो फ्रीक्वेंसी ट्रांसमिशन डिवाइस की कोई सुविधा नहीं होती है, बैटरी पैक पर काम करते हैं। और इन्हें दोबारा नहीं लगाया जा सकता है। ईवीएम की नियंत्रण इकाई में एक वास्तविक समय की घड़ी होती है, जो उस समय हर घटना को सही समय पर लॉग ऑन करती है। जिस समय इसे स्विच किया गया था। मशीन में एंटी-टैम्पर तंत्र 100-मिलीसेकंड भिन्नताओं का भी पता लगा सकते है।

तीन प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें M1, M2 और M3 हैं।  सबसे आधुनिक M3 ईवीएम, जो 2013 में इसकी शुरूआत के बाद से उपयोग में हैं, पीएसयू परिसर में ही चिप्स में मशीन कोड लिखने की अनुमति देता है- भारत इलैक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बैंगलोर और इलेक्ट्रानिक्स कारपोरेशन आफ इंण्डिया लिमिटेड, हैदराबाद। भारत निर्वाचन आयोग ने ईवीएम ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर EVM Tracking Software (ईटीएस) को एक आधुनिक इन्वेंट्री प्रबंधन प्रणाली के रूप में पेश किया गया है। जहां सभी ईवीएमएस / वोटर वैरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल(वीवीपैट) की पहचान और भौतिक उपस्थिति को वास्तविक समय के आधार पर ट्रैक किया जाता है। एम3 (M3) ईवीएम में प्रत्येक मशीन में डिजिटल सत्यापन प्रणाली कोडित कि जाती है, जो इसकी दो घटक इकाइयों के बीच संपर्क स्थापित करने के लिए आवश्यक होते है। यह सुनिश्चित करने के लिए सील की कई परतें होती हैं, कि यह छेड़छाड़-प्रूफ है। भारतीय ईवीएम गैर-नेटवर्क मशीन हैं।

वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (Voter verifiable paper audit trail):-

वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल Voter verifiable paper audit trail (वीवीपैट) या वेरिफाइड पेपर रिकार्ड Verified paper record (वीपीआर) एक मतदाता मत प्रणाली का उपयोग करते हुए मतदाताओं को फीडबैक (Feedback) देने का एक तरीका होता है। एक वीवीएपीएटी मतदान मशीनों के लिए एक स्वतंत्र सत्यापन प्रणाली के रूप में लक्षित होते है, जिससे मतदाताओं को यह सत्यापित करने के लिए अनुमति दी जाती है, कि उनका वोट सही ढंग से डाला गया है, संभावित चुनाव धोखाधड़ी या खराबी का पता लगा सके, और संग्रहीत इलेक्ट्रॉनिक परिणामों का ऑडिट करने के लिए साधन प्रदान कर सके। उम्मीदवार (जिनके लिए मतदान किया गया है) और पार्टी / व्यक्तिगत उम्मीदवार का प्रतीक होता है।

भारत में, भारतीय आम चुनाव, 2014 में एक पायलट परियोजना के रूप में 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में से 8 में वोटर वैरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) प्रणाली की शुरुआत की गई थी। वीवीएपीएटी लखनऊ, गांधीनगर, बैंगलोर दक्षिण, चेन्नई सेंट्रल, जादवपुर, रायपुर, पटना साहिब और मिजोरम निर्वाचन क्षेत्रों में कार्यान्वित है। मतदाता सत्यापित पेपर लेखापरीक्षा का निशान पहली बार भारत में सितंबर 2013 में नाकसेन (विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र) में नागालैंड में एक चुनाव में इस्तेमाल किया गया था। वीवीएपीएटी से भरा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) 2017 विधानसभा चुनावों में संपूर्ण गोवा राज्य में इस्तेमाल किया गया था। जून 2018 में, भारत निर्वाचन आयोग ने कंट्रास्ट सेंसर और पेपर रोल के शीर्ष पर एक अंतर्निहित हुड पेश किया जो सभी वीवीपीएटी में आर्द्रता को अत्यधिक प्रकाश और गर्मी से रोकने के लिए काम करता है। वीवीपीएटी प्रणाली जो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को ईवीएम स्लिप पैदा करके प्रत्येक वोट कास्ट दर्ज करने में सक्षम बनाती है, को भारतीय आम चुनाव, 2019 में सभी 543 लोक सभा निर्वाचन क्षेत्रों में उपयोग किया गया था।

नोटा None of the above:-

नोटा का अर्थ है- नन ऑफ द एबव,( None of the above) यानि इनमें से कोई नहीं। NOTA का उपयोग पहली बार भारत में 2009 में किया गया था। स्थानीय चुनावों में मतदाताओं को NOTA का विकल्प देने वाला छत्तीसगढ़ भारत का पहला राज्य था। NOTA बटन ने 2013 के विधानसभा चुनावों में चार राज्यों – छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान और मध्य प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में अपनी शुरुआत की थी। 2014 से नोटा पूरे देश मे लागू हुआ भारत निर्वाचन आयोग ने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में इनमें से कोई नहीं अर्थात नोटा(नन ऑफ द एबव) बटन का विकल्प उपलब्ध कराने के निर्देश दिया।

2018 में नोटा को भारत में पहली बार उम्मीदवारों के समकक्ष दर्जा मिला। हरियाणा में दिसंबर 2018 में पांच जिलों में होने वाले नगर निगम चुनावों के लिए हरियाणा चुनाव आयोग ने निर्णय लिया कि नोटा के विजयी रहने की स्थिति में सभी प्रत्याशी अयोग्य घोषित हो जाएंगे तथा चुनाव पुनः कराया जाएगा।  हालांकि अभी भारत निर्वाचन आयोग ने इसे लागू नही किया है।

भारतीय आम चुनाव, 2019 में भारत में लगभग 1.04 प्रतिशत मतदाताओं ने उपरोक्त में से कोई नहीं (नोटा) के लिए मतदान किया, जिसमें बिहार 2.08 प्रतिशत नोटा मतदाताओं के साथ अग्रणी रहा।

टोटलाइजर :-
टोटलाइजर भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में एक प्रस्तावित तंत्र है जो बूथ-वार मतदान पैटर्न को छिपाने के लिए होता है। एक टोटलाइजर में लगभग 14 मतदान बूथों में मतों को एक साथ गिना जाने की अनुमति दी है। वर्तमान में, बूथ द्वारा वोटों का बूथ गिनती हुई है।

इतिहास :-

2014 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें कि मतदाताओं को उन क्षेत्रों में डरा देने से रोकने के लिए चुनाव क्षेत्र के विभिन्न मतदान केंद्रों में मतों को भरने के लिए चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की गई थी। चुनाव आयोग ने शुरू में 2008 में यूपीए सरकार को इस उपाय का सुझाव दिया था।

भारतीय आम चुनाव 2014 के दौरान, महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने कथित तौर पर मतदाताओं को धमकी दी थी कि उनकी पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन रीडिंग से वोटिंग पैटर्न का पता लगाने में सक्षम होगी और अगर वे स्नैब्ड यह बारामती (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) में है। लॉ कमिशन (law commission) ने कहा कि टोटलाइजर 2014 में होशंगाबाद (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) में देखी गई परिस्थितियों में भी मदद करेगा, जहां सोहागपुर क्षेत्र के मोकाल्वाडा मतदान केंद्र में एकमात्र मतदाता ने मतदान किया था। भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की शुरूआत से पहले, वोटिंग पैटर्न के प्रकटन को रोकने के लिए जहां आवश्यक हो, बैलेट पेपर्स मिलाए गए थे।

फरवरी 2017 में, एनडीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में टोटलाइजर का विरोध किया, जबकि भारतीय कानून आयोग और भारतीय चुनाव आयोग ने टोटलाइजर की शुरुआत का समर्थन किया था।

कांग्रेस, राकांपा और बसपा ने “स्पष्ट रूप से” ‘टोटलाइजर’ मशीन का इस्तेमाल करने के प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि भाजपा, तृणमूल कांग्रेस और पीएमके ने टोटलाइजर का विरोध किया।


Share it

The post भारत का चुनाव आयोग:- appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2606 0
अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों प्रशासन से संबंधित प्रवधान https://vinayiasacademy.com/?p=2604 https://vinayiasacademy.com/?p=2604#respond Tue, 30 Jun 2020 05:51:47 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2604 Share itअनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों प्रशासन से संबंधित प्रवधान Vinayiasacademy.com 5वीं अनुसूची की घोषणा:- भारत के संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के तहत संवैधानिक प्रावधान के अनुसार, ‘अनुसूचित क्षेत्र’ को भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची के पैरा para 6 (1) के अनुसार- ‘ऐसे क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया जाता है। जिसे […]

The post अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों प्रशासन से संबंधित प्रवधान appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों प्रशासन से संबंधित प्रवधान
Vinayiasacademy.com

5वीं अनुसूची की घोषणा:-

भारत के संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के तहत संवैधानिक प्रावधान के अनुसार, ‘अनुसूचित क्षेत्र’ को भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची के पैरा para 6 (1) के अनुसार- ‘ऐसे क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया जाता है। जिसे राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया हो’। एक राज्य के संबंध में “अनुसूचित क्षेत्रों” का विनिर्देश, उस राज्य के राज्यपाल के साथ परामर्श के बाद राष्ट्रपति के एक अधिसूचित आदेश द्वारा होता है। भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची के अनुच्छेद para 6 (2) के प्रावधानों के अनुसार, राष्ट्रपति उस राज्य के राज्यपाल के परामर्श से राज्य में किसी भी अनुसूचित क्षेत्र के क्षेत्रों में वृद्धि करा सकते हैं; और किसी भी राज्य के संबंध में उन क्षेत्रों को पुन-परिभाषितरिभाषितरिभाषित करने के लिए नए आदेश दे सकते हैं‌। जिसे अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया जाना होता है। किसी भी परिवर्तन, वृद्धि, कमी, नए क्षेत्रों का समावेश या “अनुसूचित क्षेत्रों” से संबंधित किसी भी आदेश को रद्द करने के मामले में भी यही लागू होते है। वर्तमान में, आंध्र प्रदेश (तेलंगाना सहित), छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान में अनुसूचित क्षेत्र घोषित किए गए हैं।

अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने के लिए मानदंड (criteria)

पांचवीं अनुसूची के तहत किसी भी क्षेत्र को “अनुसूचित क्षेत्र” के रूप में घोषित करने के लिए मानदंड (criteria) हैं:

  • जनजातीय आबादी की प्रधानता,
  • क्षेत्र की सघनता और उचित आकार,
  • एक व्यवहार्य प्रशासनिक इकाई जैसे जिला, ब्लॉक या तालुक, और
  • पड़ोसी क्षेत्रों की तुलना में क्षेत्र का आर्थिक पिछड़ापन।

ये मानदंड भारत के संविधान में नहीं लिखे गए हैं लेकिन वे अच्छी तरह से स्थापित हो गए हैं वर्ष 1950 से 2007 तक अनुसूचित क्षेत्रों से संबंधित संवैधानिक आदेश अधिसूचित किये गये हैं।

अनुसूचित क्षेत्रों की घोषणा से संबंधित पांचवीं 5वीं अनुसूची के संवैधानिक प्रावधान:-

संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के तहत पांचवीं अनुसूची में पूर्वोत्तर भारत के अलावा अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में प्रावधान हैं। संविधान की 5वीं अनुसूची के भाग ‘ग’ के खंड 6 के प्रावधान निम्ना अनुसार हैं:

अनुसूचित क्षेत्र:

इस संविधान में, अभिव्यक्ति “अनुसूचित क्षेत्रों” का अर्थ ऐसे क्षेत्रों से हैं जिसे राष्ट्रपति के आदेश से अनुसूचित क्षेत्र होने की घोषणा की जा सके।

राष्ट्रपति किसी भी समय आदेश द्वारा कर सकते हैं।

(क) निर्देश दे सकें कि अनुसूचित क्षेत्र का संपूर्ण या कोई निश्चित भाग एक अनुसूचित क्षेत्र या ऐसे क्षेत्र का 1 (एक) हिस्सा नहीं होगा।

(ख) केवल सीमाओं के सुधार के माध्यम से, किसी भी अनुसूचित क्षेत्र को परिवर्तित कर सकते हैं।

(ग) किसी राज्य की सीमाओं के किसी भी परिवर्तन पर या संघ में प्रवेश या एक नए राज्य की स्थापना परजो पहले किसी राज्य में शामिल नहीं था, या अनुसूचित क्षेत्र का हिस्सा बनाने हेतु किसी भी क्षेत्र को घोषित करें।

(घ) किसी भी राज्य या राज्यों के संबंध में, संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से इस अनुच्छेद के तहत किए गए, किसी भी आदेश या आदेशोंका रद्द करना, उन क्षेत्रों को पुन-परिभाषित करने के लिए नए आदेश बनाते हैं। जो कि अनुसूचित क्षेत्रों में होता हैं; और इस तरह के किसी भी आदेश में ऐसे प्रासंगिक और परिणामी प्रावधान शामिल हो सकते हैं। जो राष्ट्रपति आवश्यक और उचित मानते हैं, लेकिन उपरोक्त रूप में सहेजते हैं, इस अनुच्छेद के उप-पैरा (1) के तहत किए गए आदेश बाद के किसी भी आदेश से भिन्न नहीं होंगे।

भारत में अनुसूचित जनजातियां:-

आदिवासी देश की कुल आबादी का 8.14% हैं,और देश के क्षेत्रफल के करीब 15% भाग पर निवास करते हैं। यह वास्तविक है कि आदिवासी लोगों पर विशेष ध्यान की जरूरत होती है, जिसे उनके निम्न सामाजिक, आर्थिक और भागीदारी संकेतकों में किया जा सकता है। चाहे वह मातृ और बाल मृत्यु दर हो, या कृषि सम्पदा या पेय जल और बिजली तक पहुंचना हो, आदिवासी समुदाय आम आबादी से बहुत पिछड़े हुए होते हैं। आदिवासी आबादी का 52% गरीबी की रेखा के नीचे होती है और चौंका देने वाली बात यह है, कि 54% आदिवासियों की आर्थिक सम्पदा जैसे संचार और परिवहन तक कोई पहुंच ही नहीं होती है।

भारत का संविधान अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित नहीं करता है, इसलिए अनुच्छेद 366(25) अनुसूचित जनजातियों का संदर्भ उन समुदायों के रूप में करता है। जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार अनुसूचित किया गया हों। संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार, अनुसूचित जनजातियाँ वे आदिवासी या आदिवासी समुदाय या इन आदिवासियों और आदिवासी समुदायों का भाग या उनका समूह हैं। जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा एक सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा इस प्रकार घोषित किया गया है। अनुसूचित जनजातियाँ देश भर में, मुख्यतया वनों और पहाड़ी इलाकों में फैली हुई हैं।

इन समुदायों की मुख्य विशेषताएं:-

  • आदिम लक्षण
  • भौगोलिक अलगाव
  • विशिष्ट संस्कृति
  • बाहरी समुदाय के साथ संपर्क करने में संकोच
  • आर्थिक रूप से पिछडापन।

पिछली जनगणना के आंकड़े दर्शाते हैं कि अनुसूचित जनजाति आबादियों का 42.02% मुख्‍य रूप से कामगार थे जिनमें से 54.50% किसान और 32.69% कृषि श्रमिक थे। इस तरह, इन समुदायों में से करीब 87% कामगार प्राथमिक क्षेत्र की गतिविधियों में लगे थे। अनुसूचित जनजातियों की साक्षरता दर लगभग 29.60 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 52% है। अनुसूचित जनजातियों की तीन-चौथाई से अधिक महिलाऐं अशिक्षित हैं। ये असमानताएं औपचारिक शिक्षा में पढ़ाई छोड़ देने की उच्च दरों से और बढ़ जाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप उच्च शिक्षा में असंगत रूप से कम प्रतिनिधित्व होता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि इसका कुल प्रभाव यह है कि गरीबी की रेखा से नीचे की अनुसूचित जन-जातियों का अनुपात राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर होता है।

भारत के संविधान में अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हित और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषणों से उनकी रक्षा के लिए विशेष प्रावधान होते हैं। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक रणनीति बनाई गई है। जिसका नाम आदिवासी उप-योजना रणनीति रखा गया है, जिसे 5वी पंचवर्षीय योजना के शुरू में अपनाया गया था। इस रणनीति का उद्देश्य राज्य योजना के आवंटनों, केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों, वित्तीय और विकास संस्थानों की योजनाओं/कार्यक्रमों में आदिवासी विकास के लिए निधियों के पर्याप्त प्रवाह को सुनिश्चित करना है। इस रणनीति की आधारशिला राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा TSP के लिए निधियों का आवंटन उन राज्यों/ केन्द्र शासित प्रदेशों में अनुसूचित जनजाति की आबादी के अनुपात में सुनिश्चित करना रहा है। राज्यों/ केन्द्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों के अनुसूचित जन-जातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की प्राप्ति के लिए आदिवासी उप-योजना का सूत्रीकरण और कार्यान्वयन करने के अलावा, आदिवासी मामलों का मंत्रालय अनुसूचित जनजातियों के लाभ के लिए कई योजनाओं और कार्यक्रमों को कार्यान्वयित कर रहा है।

परिभाषा:-
Vinayiasacademy.com

अनुसूचित जनजातियाँ’ पद सबसे पहले भारत के संविधान में प्रकट हुई थी। अनुच्छेद 366 (25) ने अनुसूचित जनजातियों को “ऐसी आदिवासी जाति या आदिवासी समुदाय या इन आदिवासी जातियों और आदिवासी समुदायों का भाग या उनके समूह के रूप में, जिन्हें इस संविधान के उद्देश्यों के लिए अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जन-जातियाँ माना गया है” परिभाषित किया है। अनुच्छेद 366 (25), जिसे नीचे उद्धृत किया गया है, अनुसूचित जनजातियों के विशिष्टि-करण के मामले में पालन की जाने वाली प्रक्रिया को निर्दिष्ट करता है।

अनुच्छेद 342:-

राष्ट्रपति, किसी भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के विषय में, और जहाँ वह राज्य है, राज्यपाल से सलाह के बाद सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा, आदिवासी जाति या आदिवासी समुदायों या आदिवासी जातियों या आदिवासी समुदायों के भागों या समूहों को निर्दिष्ट कर सकते हैं, जो इस संविधान के उद्देश्यों के लिए, उस राज्य या केंद्रशासित प्रदेश, जैसा भी मामला हो, के संबंध में अनुसूचित जनजातियाँ माने जाएंगे।

संसद कानून के द्वारा धारा (1) में निर्दिष्ट अनुसूचित जनजातियों की सूची में किसी भी आदिवासी जाति या आदिवासी समुदाय या किसी भी आदिवासी जाति या आदिवासी समुदाय के भाग या समूह को शामिल कर या उसमें से निकाल सकती है, लेकिन जैसा कि पहले बताया गया है, इन्हें छोड़कर, कथित धारा के अधीन जारी किसी भी सूचना को किसी भी तदनुपरांत सूचना द्वारा परिवर्तित नहीं किया जाएगा।

इस प्रकार, किसी विशेष राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के संबंध में अनुसूचित जनजातियों का पहला विशिष्टिकरण संबंधित राज्य सरकारों की सलाह के बाद, राष्ट्रपति के अधिसूचित आदेश द्वारा किया जाता है। ये आदेश तदनुपरांत केवल संसद की कार्रवाई द्वारा ही संशोधित किए जा सकते हैं। उपरोक्त अनुच्छेद अनुसूचित जनजातियों का सूचीकरण अखिल भारतीय आधार पर न करके राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के अनुसार करने का प्रावधान भी करता है।

अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र को जारी करने के लिए – पालन की जाने वाली कुछ बातें:-

जहाँ कोई व्यक्ति जन्म से अनुसूचित जनजाति का होने का दावा करता है, यह सत्यापित किया जाना चाहिए।

कि व्यक्ति और उसके माता-पिता वास्तव में दावा किए गए समुदाय के हैं

वह समुदाय संबंधित राज्य के विषय में अनुसूचित जनजातियों को सूचित करने वाले राष्ट्रपति के आदेश में शामिल है।

. वह व्यक्ति उस राज्य और राज्य में उस क्षेत्र से है जिसके संबंध में समुदाय को अनुसूचित किया गया है, या बताया गया हो।

वह किसी भी धर्म को मान सकता है।

उसे उसके मामले में लागू राष्ट्रपति के आदेश की अधिसूचना की तिथि को स्थायी निवासी होना चाहिए।

वह व्यक्ति जो राष्ट्रपति के आदेश की अधिसूचना के समय अपने स्थायी निवास-स्थान से अस्थायी रूप से दूर हो, उदाहरण के लिए, आजीविका कमाने या शिक्षाप्राप्ति आदि के लिए, भी अनुसूचित जनजाति मानी जा सकती है, यदि उसकी जनजाति को उसके राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के संबंध में उस क्रम में निर्दिष्ट किया गया है। लेकिन उसे उसके अस्थायी निवास-स्थान की जगह के संबंध में इस रूप में नहीं माना जा सकता है, चाहे तथ्यानुसार उसकी जनजाति का नाम किसी भी राष्ट्रपतीय आदेश में उस क्षेत्र के संबंध में क्यौं न अनुसूचित किया गया हो।

  • संबंधित राष्ट्रपतीय आदेश की अधिसूचना की तिथि के बाद जन्मे व्यक्तियों के मामले में, अनुसूचित जनजाति की हैसियत पाने के उद्देश्य के लिए निवास का स्थान, उस राष्ट्रपतीय आदेश की अधिसूचना के समय उनके माता-पिता का स्थायी निवास-स्थान है, जिसके अधीन वे ऐसी जनजाति से होने का दावा करते हैं।

प्रवास करने पर अनुसूचित जनजाति दावे।

जहाँ कोई व्यक्ति राज्य के उस भाग से, जिसके संबंध में उसका समुदाय अनुसूचित है, उसी राज्य के किसी दूसरे भाग में प्रवास करता है। जिसके संबंध में समुदाय अनुसूचित नहीं है, वह उस राज्य के संबंध में अनुसूचित जनजाति का सदस्य माना जाता रहेगा।

जहाँ कोई व्यक्ति एक राज्य से दूसरे राज्य को प्रवास करता है, वह अनुसूचित जनजाति का होने का दावा कर सकता है, लेकिन केवल उस राज्य के संबंध में ही जहां से वह मूल रूप से है और उस राज्य के संबंध में नहीं जहां पर उसने प्रवास किया है।

विवाहों के माध्यम से अनुसूचित जनजाति के दावे कर सकते हैं

मार्गदर्शक सिद्धांत यह है कि जब कोई भी व्यक्ति जो जन्म से अनुसूचित जनजाति का नहीं था, केवल इसलिए अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाएगा कि उसने अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति से विवाह किया है।

इसी प्रकार, कोई व्यक्ति जो एक अनुसूचित जनजाति का सदस्य है, विवाह के बाद भी उस अनुसूचित जनजाति का सदस्य बना रहेगा, भले ही उसने किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह किया हो जो किसी अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है।

अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों का जारी होना

अनुसूचित जनजातियों के प्रत्यार्थियों को उनके दावे के समर्थन में निर्दिष्ट अधिकारियों में से किसी के द्वारा निर्दिष्ट फार्म में (परिशिष्ट-III) अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी किए जा सकते हैं।

बिना उचित सत्यापन के अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों के लिए दंड

अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से प्रवासियों को अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने के लिए प्रक्रिया का उदारीकरण

अनुसूचित जनजातियों के लोगों को, जिन्होंने एक राज्य से दूसरे राज्य को रोजगार, शिक्षा आदि के उद्देश्य से प्रवास किया है, उस राज्य से आदिवासी प्रमाणपत्र प्राप्त करने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जहाँ से उन्होंने प्रवास किया है। इस कठिनाई को दूर करने के लिए यह निश्चय किया गया है कि एक राज्य सरकार/केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन ऐसे व्यक्ति को उसके पिता/माता के मूल के लिए जारी विश्वसनीय प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने पर अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी कर सकता है जिसने दूसरे राज्य से प्रवास किया है, सिवाय केवल तब जब निर्दिष्ट अधिकारी यह महसूस करता हो कि प्रमाणपत्र के जारी करने से पहले मूल राज्य के माध्यम से विस्तृत पूछताछ आवश्यक है। प्रवासी व्‍यक्ति को जनजाति का प्रमाण पत्र् जारी किया जायेगा चाहे प्रश्‍नाधीन जनजाति उस राज्‍य/केन्‍द्रशासित प्रदेश में अनुसूचित है या नहीं हांलाकि वे प्रवासित राज्‍य में अनुसूचित जनजाति के लाभों के हकदार नहीं होंगे।


Share it

The post अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों प्रशासन से संबंधित प्रवधान appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2604 0
राज्य सभा गठन एवं कार्य:- https://vinayiasacademy.com/?p=2600 https://vinayiasacademy.com/?p=2600#respond Mon, 29 Jun 2020 10:30:13 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2600 Share itराज्य सभा गठन एवं कार्य:- Vinayiasacademy.com राज्यसभा:- राज्य सभा भारतीय लोकतंत्र की ऊपरी प्रतिनिधि सभा होती है। लोकसभा निचली प्रतिनिधि सभा होती है। राज्यसभा में 245 सदस्य होते हैं। जिनमे 12 सदस्य भारत के राष्ट्रपति के द्वारा नामांकित होते हैं। इन्हें ‘नामित सदस्य’ कहा जाता है। अन्य सदस्यों का चुनाव होता है। राज्यसभा में सदस्य 6 साल के लिए […]

The post राज्य सभा गठन एवं कार्य:- appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
Share it

राज्य सभा गठन एवं कार्य:-

Vinayiasacademy.com

राज्यसभा:- राज्य सभा भारतीय लोकतंत्र की ऊपरी प्रतिनिधि सभा होती है। लोकसभा निचली प्रतिनिधि सभा होती है। राज्यसभा में 245 सदस्य होते हैं। जिनमे 12 सदस्य भारत के राष्ट्रपति के द्वारा नामांकित होते हैं। इन्हें ‘नामित सदस्य’ कहा जाता है। अन्य सदस्यों का चुनाव होता है। राज्यसभा में सदस्य 6 साल के लिए चुने जाते हैं, जिनमे एक-तिहाई सदस्य हर 2 साल में सेवा-निवृत होते हैं।

किसी भी संघीय शासन में संघीय विधायिका का ऊपरी भाग संवैधानिक बाध्यता के चलते राज्य हितों की संघीय स्तर पर रक्षा करने वाला बनाया जाता है। इसी सिद्धांत के चलते राज्य सभा का गठन हुआ है। इसी कारण राज्य सभा को सदनों की समानता के रूप में देखा जाता है। जिसका गठन ही संसद के द्वितीय सदन के रूप में हुआ है। राज्यसभा का गठन एक पुनरीक्षण सदन के रूप में हुआ है। जो लोकसभा द्वारा पास किये गये प्रस्तावों की पुनरीक्षा करे। यह मंत्रिपरिषद में विशेषज्ञों की कमी भी पूरी कर सकती है। क्योंकि कम से कम 12 विशेषज्ञ तो इस में मनोनीत होते ही हैं। आपातकाल लगाने वाले सभी प्रस्ताव जो राष्ट्रपति के सामने जाते हैं, राज्य सभा द्वारा भी पास होने चाहिये। जुलाई 2018 से, राज्यसभा सांसद सदन में 22 भारतीय भाषाओं में भाषण कर सकते हैं, क्योंकि ऊपरी सदन में सभी 22 भारतीय भाषाओं में एक साथ व्याख्या की सुविधा होती है।

भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति होते हैं। राज्यसभा का पहला सत्र 13 मई 1952 को हुआ था।वर्तमान में वैकेया नायडू हैं।

पृष्ठभूमि:-

राज्य सभा मोन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन से हुआ। भारत सरकार अधिनियम, 1919 में तत्कालीन विधानमंडल के द्वितीय सदन के तौर पर काउंसिल ऑफ स्टेट्स का सृजन करने की उप सीमित था और जो वस्तुत: 1921 में अस्तित्व में आया। गवर्नर-जनरल तत्कालीन काउंसिल ऑफ स्टेट्स का पदेन अध्यक्ष होता था। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के माध्यम से इसके गठन में शायद ही कोई परिवर्तन किए गए।

संविधान सभा, जिसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई थी, 1950 तक केन्द्रीय विधानमंडल के रूप में कार्य किया, फिर इसे ‘अनंतिम संसद’ के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। इस अवधि के दौरान, केन्द्रीय विधानमंडल जिसे ‘संविधान सभा’ (विधायी) और आगे चलकर ‘अनंतिम संसद’ कहा गया, 1952 में पहले चुनाव कराए जाने तक, एक-सदनी रहा।

स्वतंत्र भारत में द्वितीय सदन की उपयोगिता अथवा अनुपयोगिता के संबंध में संविधान सभा में विस्तृत बहस हुई और अन्तत: स्वतंत्र भारत के लिए एक द्विसदनी विधानमंडल बनाने का निर्णय मुख्य रूप से इसलिए किया गया क्योंकि परिसंघीय प्रणाली को अपार विविधताओं वाले, इतने विशाल देश के लिए सर्वाधिक सहज स्वरूप की सरकार मान लिया गया। एक प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित एकल सभा को स्वतंत्र भारत के समक्ष आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अपर्याप्त समझा गया। अत: ‘काउंसिल ऑफ स्टेट्स’ के रूप में ज्ञात एक ऐसे द्वितीय सदन का सृजन किया गया जिसकी संरचना और निर्वाचन पद्धति प्रत्यक्षत: निर्वाचित लोक सभा से पूर्णत: भिन्न थी। इसे एक ऐसा अन्य सदन समझा गया, जिसकी सदस्य संख्या लोक सभा (हाउस ऑफ पीपुल) से कम है। इसका आशय परिसंघीय सदन अर्थात् एक ऐसी सभा से था जिसका निर्वाचन राज्यों और दो संघ राज्य क्षेत्रों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया गया, जिनमें राज्यों को समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। निर्वाचित सदस्यों के अलावा, राष्ट्रपति द्वारा सभा के लिए बारह सदस्यों के नामनिर्देशन का भी उपबंध किया गया। इसकी सदस्यता हेतु न्यूनतम आयु तीस वर्ष नियत की गई जबकि निचले सदन के लिए यह पच्चीस(25) वर्ष है। काउंसिल ऑफ स्टेट्स की सभा में गरिमा और प्रतिष्ठा के अवयव संयोजित किए गए। ऐसा भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा का पदेन सभापति बनाकर किया गया, जो इसकी बैठकों का सभापतित्व करते हैं।

संरचना/संख्या:-

संविधान के अनुच्छेद 80 में राज्य सभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित की गई है, जिनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाते हैं, और 238 सदस्य राज्यों के और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते हैं। तथापि, राज्य सभा के सदस्यों की वर्तमान संख्या 245 है, जिनमें से 233 सदस्य राज्यों और संघ राज्यक्षेत्र दिल्ली तथा पुडुचेरी के प्रतिनिधि होते हैं और 12 राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित होते हैं। राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव होता है।

स्थानों का आवंटन:-
संविधान की चौथी अनुसूची में राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को स्थानों के आवंटन का उपबंध है। स्थानों का आवंटन प्रत्येक राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। राज्यों के पुनर्गठन तथा नए राज्यों के गठन के परिणामस्वरूप राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को आवंटित राज्य सभा में निर्वाचित स्थानों की संख्या वर्ष 1952 से लेकर अब तक समय-समय पर बदलती रही है।

पात्रता:-संविधान के अनुच्छेद 84 में संसद की सदस्यता के लिए अर्हताएं निर्धारित की गई हैं। राज्य सभा की सदस्यता के लिए अर्ह होने के लिए किसी व्यक्ति के पास निम्नलिखित अर्हताएं होनी चाहिए:

(क) उसे भारत का नागरिक होना चाहिए और निर्वाचन आयोग द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार शपथ लेना चाहिए या प्रतिज्ञान करना चाहिए और उस पर अपने हस्ताक्षर करने चाहिए;

(ख) उसे कम से कम तीस वर्ष की आयु का होना चाहिए;

(ग) उसके पास ऐसी अन्य अर्हताएं होनी चाहिए जो संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस निमित्त विहित की जाएं।

निरर्हताएं:-

संविधान के अनुच्छेद 102 में यह निर्धारित किया गया है कि कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा-

(क) यदि वह भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन, ऐसे पद को छोड़कर, जिसको धारण करने वाले का निरर्हित न होना संसद ने विधि द्वारा घोषित किया है, कोई लाभ का पद धारण करता है;

(ख) यदि वह विकृतचित है और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है;

(ग) यदि वह अनुन्मोचित दिवालिया है;

(घ) और यदि वह भारत का नागरिक नहीं है, या उसने किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित कर ली हे या वह किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा या अनुषक्ति को अभिस्वीकार किए हुए हैं;

(ड.) यदि वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस प्रकार निरर्हित कर दिया जाता है।

 इस खंड के प्रयोजनों के लिए, कोई व्यक्ति केवल इस कारण भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का या ऐसे राज्य का मंत्री है। इसके अतिरिक्त, संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-परिवर्तन के आधार पर सदस्यों की निरर्हता के बारे में उपबंध किया गया है। दसवीं अनुसूची के उपबंधों के अनुसार, कोई सदस्य एक सदस्य के रूप में उस दशा में निरर्हित होगा, यदि वह स्वेच्छा रूप से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है; या वह ऐसे राजनीतिक दल द्वारा, जिसका वह सदस्य है, दिए गए किसी निदेश के विरुद्ध सदन में मतदान करता है या मतदान करने से विरत रहता है और ऐसे मतदान या मतदान करने से विरत रहने को उस राजनीतिक दल द्वारा पन्द्रह दिन के भीतर माफ नहीं किया गया है। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित सदस्य निरर्हित होगा। यदि वह अपने निर्वाचन के पश्चात् किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाता है। तथापि, राष्ट्रपति द्वारा सदन के किसी नामनिर्देशित सदस्य को किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित होने की अनुमति होगी यदि वह सदन में अपना स्थान ग्रहण करने के पहले 6 छह मास के भीतर ऐसा करता/करती है। किसी सदस्य को इस आधार पर निरर्हित नहीं किया जाएगा,यदि वह राज्य सभा का उप-सभापति निर्वाचित होने के पश्चात् अपने राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता/देती है।

निर्वाचन/नामनिर्देशन की प्रक्रिया:-

राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति द्वारा किया जाता है। प्रत्येक राज्य तथा दो संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का निर्वाचन उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों तथा उस संघ राज्य क्षेत्र के निर्वाचक मंडल के सदस्यों, जैसा भी मामला हो, द्वारा एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार किया जाता है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के निर्वाचक मंडल में दिल्ली विधान सभा के निर्वाचित सदस्य और पुडुचेरी संघ राज्य क्षेत्र के निर्वाचक मंडल में पुडुचेरी विधान सभा के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।

द्वि-वार्षिक/उप-चुनाव :-

राज्य सभा एक स्थायी सदन है और यह भंग नहीं होता। प्रत्येक दो वर्ष बाद राज्य सभा के एक-तिहाई सदस्य सेवा-निवृत्त हो जाते हैं। पूर्णकालिक अवधि के लिए निर्वाचित सदस्य 6 छह वर्षों की अवधि के लिए कार्य करता है। किसी सदस्य के कार्यकाल की समाप्ति पर सेवानिवृत्ति को छोड़कर अन्यथा उत्पन्न हुई रिक्ति को भरने के लिए कराया गया निर्वाचन ‘उप-चुनाव’ कहलाता है। उप-चुनाव में निर्वाचित कोई सदस्य उस सदस्य की शेष कार्यावधि तक सदस्य बना रह सकता है। जिसने त्यागपत्र दे दिया था या जिसकी मृत्यु हो गई थी या जो दसवीं अनुसूची के अधीन सभा का सदस्य होने के लिए निरर्हित हो गया था।

राज्य सभा का संघीय स्वरूप:-
1.राज्य सभा का गठन ही राज्य परिषद के रूप में संविधान के संघीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व देने के लिये हुआ था।

2.राज्य सभा के सद्स्य मंत्रि परिषद के सदस्य बन सकते है ,जिससे संघीय स्तर पर निर्णय लेने में राज्य का प्रतिनिधित्व होगा।

3.राष्ट्रपति के निर्वाचन तथा महाभियोग तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में समान रूप से भाग लेती है
4.अनु 249,312 भी राज्य सभा के संघीय स्वरूप तथा राज्यॉ के संरक्षक रूप में उभारते है।

5.सभी संविधान संशोधन बिल भी इस के द्वारा पृथक सभा कर तथा 2/3 बहुमत से पास होंगे।

6.संसद की स्वीकृति चाहने वाले सभी प्रस्ताव जो कि आपातकाल से जुडे हो भी राज्यसभा द्वारा पारित होंगे।

राज्य सभा के गैर संघीय तत्व:-

संघीय क्षेत्रों को भी राज्य सभा में प्रतिनिधित्व मिलता है। जिससे इसका स्वरूप गैर संघीय हो जाता है।

राज्यों का प्रतिनिधित्व राज्यों की समानता के आधार पर नहीं है, जैसा कि अमेरिका में है। वहाँ प्रत्येक राज्य को सीनेट में दो स्थान मिलते है, किंतु भारत में स्थानों का आवंटन आबादी के आधार पर किया गया है, या किया जाता है।

राज्य सभा में मनोनीत सद्स्यों का प्रावधान है।

पीठासीन अधिकारीगण-सभापति और उपसभापति:-

राज्य सभा के पीठासीन अधिकारियों की यह जिम्मेदारी होती है, कि वे सभा की कार्यवाही का संचालन करें। भारत के उपराष्ट्रपति राज्य सभा के पदेन सभापति होते हैं। राज्य सभा के सदस्यों के विपरीत राज्यसभा के सभापति का कार्यकाल 5 वर्षों का ही होता है, राज्य सभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति का भी चयन करती है। राज्य सभा में उपसभाध्यक्षों का एक पैनल भी होता है, जिसमें सदस्यों का नामनिर्देशन सभापति, राज्य सभा द्वारा किया जाता है। सभापति और उपसभापति की अनुपस्थिति में, उपसभाध्यक्षों के पैनल से एक सदस्य सभा की कार्यवाही का सभापतित्व करता है। लोक सभा के विपरीत राज्यसभा का सभापति अपना इस्तिफा उपसभापति को नहीं बल्कि राष्ट्रपति को देता है।

महासचिव:-

महासचिव की नियुक्ति राज्य सभा के सभापति द्वारा की जाती है और उनका रैंक संघ के सर्वोच्च सिविल सेवक के समतुल्य होता है। महासचिव गुमनाम या गुप्त रह कर यह कार्य करते हैं। और संसदीय मामलों पर सलाह देने के लिए तत्परता से पीठासीन अधिकारियों को उपलब्ध रहते हैं। महासचिव राज्य सभा सचिवालय के प्रशासनिक प्रमुख और सभा के अभिलेखों के संरक्षक भी हैं। वह राज्य सभा के सभापति के निदेश व नियंत्रणाधीन कार्य करते हैं।

राज्य सभा की विशेष शक्तियाँ:-

एक परिसंघीय सदन होने के नाते राज्य सभा को संविधान के अधीन कुछ विशेष शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। राज्यसभा के पास तीन विशेष शक्तियाँ होती है

अनु. 249 के अंतर्गत राज्य सूची के विषय पर 1 वर्ष का बिल बनाने का हक होता है।

अनु. 312 के अंतर्गत नवीन अखिल भारतीय सेवा का गठन 2/3 बहुमत से करना।

अनु. 67 ब उपराष्ट्रपति को हटाने वाला प्रस्ताव राज्यसभा में ही लाया जा सकेगा।

विधान से संबंधित सभी विषयों/क्षेत्रों को तीन सूचियों में विभाजित किया गया है- संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची।
संघ और राज्य सूचियां परस्पर अपवर्जित होती हैं- कोई भी दूसरे के क्षेत्र में रखे गए विषय पर कानून नहीं बना सकता है। तथापि, यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई 2/3 सदस्यों के बहुमत द्वारा यह कहते हुए एक संकल्प पारित करती है कि यह “राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन” है कि संसद, राज्य सूची में प्रमाणित किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद भारत के संपूर्ण राज्य-क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए उस संकल्प में विनिर्दिष्ट विषय पर विधि बनाने हेतु अधिकार-संपन्न हो जाती है। ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहेगा या होता है।परन्तु यह अवधि इसी प्रकार के संकल्प को पारित करके एक वर्ष के लिए पुन: बढ़ायी जा सकती है, या पुनः बढ़ाई दी जाती है।

यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई 2/3 सदस्यों के बहुमत द्वारा यह घोषित करते हुए एक संकल्प पारित करती है कि संघ और राज्यों के लिए सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन किया जाना राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन होती है, तो संसद विधि द्वारा ऐसी सेवाओं का सृजन करने के लिए अधिकार-संपन्न हो जाती है।

संविधान के अधीन, राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपात की स्थिति में, किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की स्थिति में, अथवा वित्तीय आपात की स्थिति में उद्घोषणा जारी करने का अधिकार है। ऐसी प्रत्येक उद्घोषणा को संसद की दोनों सभाओं द्वारा नियत अवधि के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य होता है। यद्यपि कतिपय परिस्थितियों में राज्य सभा के पास इस संबंध में विशेष शक्तियाँ होती हैं। यदि कोई उद्घोषणा उस समय की जाती है जब लोक सभा का विघटन हो गया है। अथवा लोक सभा का विघटन इसके अनुमोदन के लिए अनुज्ञात अवधि के भीतर हो जाता है, और यदि इसे अनुमोदित करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा अनुच्छेद 352, 356 और 360 के अधीन संविधान में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर पारित कर दिया जाता है, तब वह उद्घोषणा प्रभावी रहेगी।

वित्तीय मामलों में राज्य सभा:-

धन विधेयक केवल लोक सभा में पुर्नस्थापित किया जा सकता है। इसके उस सभा द्वारा पारित किए जाने के उपरान्त इसे राज्य सभा को उसकी सहमति अथवा सिफारिश के लिए प्रेषित किया जाता है। ऐसे विधेयक के संबंध में राज्य सभा की शक्ति सीमित है। राज्य सभा को ऐसे विधेयक की प्राप्ति से चौदह 14 दिन के भीतर उसे लोक सभा को लौटाना पड़ता है। यदि यह उस अवधि के भीतर लोक सभा को नहीं लौटाया जाता है, तो विधेयक को उक्त अवधि की समाप्ति पर दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें इसे लोक सभा द्वारा पारित किया गया था। राज्य सभा धन विधेयक में संशोधन भी नहीं कर सकती; यह केवल संशोधनों की सिफारिश कर सकती है और लोक सभा, राज्य सभा की सभी या किन्हीं सिफारिशों को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकेगी।

धन विधेयक के अलावा, वित्त विधेयकों की कतिपय अन्य श्रेणियों को भी राज्य सभा में पुर्नस्थापित नहीं किया जा सकता है। तथापि, कुछ अन्य प्रकार के वित्त विधेयक हैं जिनके संबंध में राज्य सभा की शक्तियों पर कोई निर्बंधन नहीं है। ये विधेयक किसी भी सभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं, और राज्य सभा को ऐसे वित्त विधेयकों को किसी अन्य विधेयक की तरह ही अस्वीकृत या संशोधित करने का अधिकार होता है। ऐसे विधेयक संसद की किसी भी सभा द्वारा तब तक पारित नहीं किए जा सकते, जब तक राष्ट्रपति ने उस पर विचार करने के लिए उस सभा से सिफारिश नहीं की हो।

इन सारी बातों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि राज्य सभा का वित्त संबंधी मामलों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। भारत सरकार के बजट को प्रतिवर्ष राज्य सभा के समक्ष भी रखा जाता है, और इसके सदस्यगण उस पर चर्चा करते हैं। यद्यपि राज्य सभा विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों पर मतदान नहीं करती,यह मामला अनन्य रूप से लोक सभा के लिए सुरक्षित है फिर भी, भारत की संचित निधि से किसी धन की निकासी तब तक नहीं की जा सकती, जब तक दोनों सभाओं द्वारा विनियोग विधेयक को पारित नहीं कर दिया जाता। इसी प्रकार, वित्त विधेयक को भी राज्य सभा के समक्ष लाया जाता है। इसके अलावा, विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियां, जो मंत्रालयों/विभागों की वार्षिक अनुदान मांगों की जाँच करती हैं, संयुक्त समितियां हैं जिनमें दस सदस्य राज्य सभा से होते हैं।

सदन के नेता:-
सभापति और उपसभापति के अलावा, सदन का नेता एक अन्य ऐसा अधिकारी है जो सभा के कुशल और सुचारू संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राज्य सभा में सभा का नेता सामान्यतः प्रधान मंत्री होता है, यदि वह इसका सदस्य है, अथवा कोई ऐसा मंत्री होता है, जो इस सभा का सदस्य है और जिसे उनके द्वारा इस रूप में कार्य करने के लिए नाम-निर्दिष्ट किया गया हो। उसका प्राथमिक उत्तरदायित्व यह है कि सभा में सौहार्दपूर्ण और सार्थक वाद-विवाद के लिए सभा के सभी वर्गों के बीच समन्वय बनाए रखना है। इस प्रयोजनार्थ, वह न केवल सरकार के, बल्कि विपक्ष, मंत्रियों और पीठासीन अधिकारी के भी निकट संपर्क में रहता है। वह सभा-कक्ष (चैम्बर) में सभापीठ के दायीं ओर की पहली पंक्ति में पहली सीट पर बैठता है ताकि वह परामर्श हेतु पीठासीन अधिकारी को सहज उपलब्ध रहे। नियमों के तहत, सभापति द्वारा सभा में सरकारी कार्य की व्यवस्था, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा हेतु दिनों के आवंटन अथवा समय के आवंटन, शुक्रवार के अलावा किसी अन्य दिन को गैर-सरकारी सदस्यों के कार्य, अनियत दिन वाले प्रस्तावों पर चर्चा, अल्पकालिक चर्चा और किसी धन विधेयक पर विचार एवं उसे वापस किये जाने के संबंध में सदन के नेता से परामर्श किया जाता है।

महान व्यक्तित्व, राष्ट्रीय नेता अथवा अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित व्यक्ति की मृत्यु होने की स्थिति में उस दिन के लिए सभा के स्थगन अथवा अन्यथा के मामले में सभापति उनसे भी परामर्श कर सकते हैं। गठबंधन सरकारों के युग में उनका कार्य और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। वह यह सुनिश्चित करते हैं, कि सभा के समक्ष लाये गए किसी भी मामले पर सार्थक चर्चा के लिए सभा में हर संभव तथा उचित सुविधा प्रदान की जाए। वह सभा की राय व्यक्त करने और इसे समारोह अथवा औपचारिक अवसरों पर प्रस्तुत करने में सभा के वक्ता के रूप में कार्य करते हैं।

विपक्ष के नेता:-

विधायिका में विपक्ष के नेता के पद का अत्यधिक सार्वजनिक महत्व होते है। इसका महत्व संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को दी गई मुख्य भूमिका से उद्भूत होता है। विपक्ष के नेता का कार्य वस्तुत: अत्यधिक कठिन होता है क्योंकि उन्हें आलोचना करनी पड़ती है, गलती इंगित करनी पड़ती है और ऐसे वैकल्पिक प्रस्तावों/नीतियों को प्रस्तुत करना पड़ता है, जिन्हें लागू करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। इस प्रकार उन्हें संसद और देश के प्रति एक विशेष सामाजिक जिम्मेदारी निभानी होती है।

राज्य सभा में वर्ष 1969 तक वास्तविक अर्थ में विपक्ष का कोई नेता नहीं होता था। उस समय तक सर्वाधिक सदस्यों वाली विपक्षी पार्टी के नेता को बिना किसी औपचारिक मान्यता, दर्जा या विशेषाधिकार दिए विपक्षी नेता मानने की प्रथा थी। विपक्ष के नेता के पद को संसद में विपक्षी नेता वेतन और भत्ता अधिनियम, 1977 द्वारा अधिकारिक मान्यता प्रदान की गई। इस अधिनियम के द्वारा राज्य सभा में विपक्षी नेता, राज्य सभा का एक ऐसा सदस्य होता है, जो कुछ समय के लिए राज्य सभा के सभापति द्वारा यथा मान्य सबसे अधिक सदस्यों वाले दल की सरकार के विपक्ष में होता है। इस प्रकार विपक्ष के नेता को तीन शर्तें पूरी करनी होती हैं, जो निम्नलिखित है:-

(१) उसे सभा का सदस्य होना चाहिए।

(२) सर्वाधिक सदस्यों वाले दल की सरकार के विपक्ष में राज्य सभा का नेता होना चाहिए।

(३) इस आशय से राज्य सभा के सभापति द्वारा उसे मान्यता प्राप्त होनी चाहिए।

वर्तमान समय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के गुलाब नबी आजाद राज्यसभा में विपक्ष के आधिकारिक नेता हैं।


Share it

The post राज्य सभा गठन एवं कार्य:- appeared first on Vinay IAS Academy.

]]>
https://vinayiasacademy.com/?feed=rss2&p=2600 0