स्वामी विवेकानंद के विचारों पर चर्चा करें .आज के वर्तमान समय में स्वामी विवेकानंद के विचार कितने प्रासंगिक है इसकी विवेचना भी करें?
Vks Vinayiasacademy.com विवेकानंद एवं रामकृष्ण मिशन का शुरू होना किसी पंतप्रसार का प्रयास नहीं था बल्कि उपनिषद में निहित वेदांत के ज्ञान को जीवन के व्यवहार में उतारने का संकल्प था. विवेकानंद ने अध्यात्म को काम से जोड़ा और सेवा को साधना का स्वरूप दिया .विवेकानंद योगी थे पर वह योग और साधना का रस नहीं बल्कि अनुशासन और अनुभव का विषय मानते थे. वह स्पष्ट कहते थे कि गुरु से प्रत्यास्थ संपर्क के बिना योग का अभ्यास नहीं होता है. यह कथन भारतीय ज्ञान परंपरा की उस मूल भावनाओं को पुनः स्थापित करता है जिसमें ज्ञान पुस्तक से नहीं बल्कि अनुभूति अनुशासन से प्राप्त होता है. उनकी वाणी की गूंज इतनी प्रबल थी कि श्री अरविंद जैसे महान साधक भी उनसे प्रभावित हो गए. श्री अरविंद ने स्वीकार किया कि उनकी योग साधना शास्त्र आधारित न होकर अंतर अनुभूति पर आधारित थी और कारावास के दिनों में विवेकानंद की वाणी उनके लिए आलोक बन गई थी. उन्होंने विवेकानंद को पढ़ा और जाना कि योग और आध्यात्मिक से भारतीय कैसे ऊर्जा प्राप्त करते हैं. विवेकानंद की दृष्टि संकीर्ण नहीं थी बल्कि बड़ी थी. उनके लिए भारत जाति और वर्ग में बंटा नहीं बल्कि पीड़ित और उपेक्षित मनुष्य का साझा परिवार था .वह निर्भीक होकर कहते थे कि अज्ञानी, दरिद्र ,ब्राह्मण और चांडाल सभी उनके भाई है. उनकी प्रार्थना की ईश्वर उन्हें पहले मनुष्य बनाए यह कथन मानवता के उस शाश्वत को उद्धारित करता है जिसे 17th शताब्दी पहले स्वामी रामानंदाचार्य ने गंगा के किनारे काशी में कहा था .रामानंद और विवेकानंद के लिए व्यक्ति महत्वपूर्ण था उसकी जाति नहीं. आज का भारत उनके उपलब्धि के बावजूद कई चुनौतियों से जूझ रहा है. नैतिक मूल्यों का ह्रास हो चुका है. सामाजिक असमानता है. भय का वातावरण भी सामने खड़ा है. ऐसे समय में विवेकानंद का स्मरण केवल उनके श्रद्धांजलि नहीं बल्कि नई दिशा भी देती है. हर वर्ष उनकी जयंती युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है कि भारत अपने भाग्य उदय के मंत्र को ना भूले. विवेकानंद सन्यासी के रूप में हमारे सामने आते हैं. जिसने भारतीय ज्ञान की उजली माटी से विश्व के मस्तक पर चंदन का तिलक लगा दिया. वर्ष 1893 में शिकागो के धर्म संसद में दिया गया उनका भाषण आज भी आत्म गौरव का प्रतीक है. विवेकानंद जी की उपस्थिति देश के हर कोने में अनुभव की जा सकती है. यह कन्याकुमारी से लेकर राजस्थान के मरुभूमि तक सजीव के रूप में दिखता है. कठोपनिषद का अमर उद्घोष यानी कि उठो जागो और शेष जनों के संग ईश्वर को समझो. उनके जीवन में सरकार था वह युवा पीढ़ी के पद प्रदर्शन है क्योंकि उन्होंने पुरातन ज्ञान अधिकता के बीच एक सेतु का निर्माण किया .भाई स्वार्थ और भ्रष्टाचार के दौर में विवेकानंद वट वृक्ष की भांति छाया देते हैं. जब चरित्र संवेदना चिन्ह हो गया है तब वह चरित्र निर्माण को शिक्षा का केंद्र बताते हैं. भगिनी निवेदिता जैसी विदेशी उनके माध्यम से भारत की आत्मा को पहचान कर वेद में निहित आध्यात्मिक की प्रतिष्ठा के बारे में जानकारी हासिल की उनका जीवन सादगी बल और सौंदर्य का एक संगम था. वह ना धन संपत्ति का संचय करते थे ना वैभवपूर्ण मठ बने ,फिर भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में प्रतिष्ठित है क्योंकि उनका प्रेम भारत माता के प्रति निष्कपट था .वह मानते थे की शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका अर्जन नहीं बल्कि चरित्र निर्माण और निर्भय व्यक्तित्व का विकास होना चाहिए .उनकी दृष्टि में सेवा और साधना अलग-अलग नहीं थी बल्कि मानवता की सेवा ईश्वर की सच्ची आराधना थी.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *