झारखंड की राज्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में कौन कार्यरत होंगे
अलका तिवारी

  1. पद और नियुक्ति

अलका तिवारी, 1988 बैच की IAS अधिकारी हैं।

उन्हें नवंबर 2024 में झारखंड की मुख्य सचिव (Chief Secretary) बनाया गया।

उनका सेवानिवृत्ति तिथि 30 सितम्बर 2025 है।

  1. शैक्षणिक पृष्ठभूमि

उन्होंने Meerut University से मनोविज्ञान (Psychology) में post-graduation की है और वहाँ उन्हें Governor’s Gold Medal मिला था।

University of Manchester, UK से “Management & Implementation of Development Projects” नामक पाठ्यक्रम में MSc की है, जिसमें उन्होंने उत्त्कृष्ट प्रदर्शन कर गोल्ड मेडल प्राप्त किया।

उन्होंने Ranchi University से विधि (Law) की पढ़ाई भी की है।

इसके अलावा उन्होंने Harvard University और Duke University से वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) और सार्वजनिक वित्त प्रबंधन (Public Fiscal Management) जैसे विषयों पर शॉर्ट-कोर्स किये हैं।

  1. व्यवसायिक अनुभव / महत्वपूर्ण भूमिका

जिलों में उपायुक्त (Deputy Commissioner) के रूप में गुमला और लोहरदगा जिलों की ज़िम्मेदारी संभाली है।

वाणिज्य कर (Commercial Taxes), वन एवं पर्यावरण (Forest & Environment) विभागों में सचिव की भूमिका निभाई है।

केंद्र सरकार में NITI Aayog में सलाहकार (Advisor) रही हैं, तथा उर्वरक विभाग, रसायन एवं दवाओं (Fertilizers, Chemicals & Pharmaceuticals) विभागों में अतिरिक्त सचिव / वित्तीय सलाहकार की भूमिकाएँ निभाई हैं।

CMD, FAGMIL (fertilizer / gypsum-related कंपनी) की भूमिका में उन्होंने गिरावट देखी गयी Gypsum व्यापार को फिर से लाभ-प्रद कंपनी में बदला।

  1. प्रमुख नीतिगत दृष्टिकोण और घोषणाएँ

उन्होंने कहा है कि जनहित में काम करना उनकी प्राथमिकता होगी।

उन्होंने 16वें वित्त आयोग के समक्ष यह बात उठाई है कि झारखंड प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर राज्य है लेकिन आय के मामले में पिछड़ा है — “प्राकृतिक संसाधनों का अभिशाप” की तर्ज पर।

उन्होंने निर्देश दिए हैं कि केंद्र सरकार से मिले फंडों का उपयोगिता प्रमाण पत्र समय रहते देना चाहिए ताकि राज्य के दावे मजबूत हों और वित्तीय अनुशासन बना रहे।

  1. चुनौतियाँ एवं मुद्दे जो उन्होंने उठाये

वन एवं पर्यावरण अनुमतियों की प्रक्रिया, जटिलताएँ और देरी, जिससे योजनाओं की लागत और समय प्रभावित हो रही है।

राज्य को खनिज संपदा के बावजूद पूरा लाभ नहीं मिलना, और भूमि मुआवजा, वायु-जल प्रदूषण, स्वास्थ्य व कृषि उत्पादन संबंधी समस्याएँ भी।

विशेष सहायता योजनाएं, पूंजी निवेश योजनाएँ आदि में देरी या अप्रयुक्त धन के मुद्दे।

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