बांग्लादेश एवं चीन के बीच तीस्ता नदी समझौता से भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
Vinay singh Vinayiasacademy.com
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के तौर पर बीजिंग दौरे पर तारीक रहमान और चीन के साथ तीस्ता नदी परियोजना पर समझौता हुआ है। बांग्लादेश की इस परियोजना का उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण, सूखे के दौरान पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना और तीस्ता बेसिन का प्रबंधन करना है। इसके तहत नदी की खुदाई की जाएगी जिससे पानी का बहाव सुनिश्चित होगा। बांग्लादेश ने चीन से तिस्ता नदी के अलावा दूसरे नदी के जल प्रबंधन और तकनीक सहयोग के मामले में भी सहायता मांग लिया है। 2005 में इस सिलसिले में चीन और बांग्लादेश के बीच एक समझौता हुआ था। पिछले वर्ष चीनी जल विशेषज्ञ ने बांग्लादेश का दौरा भी किया था, इन्हीं का हवाला देते हुए बीजिंग अब कह रहा है कि जल प्रबंधन के क्षेत्र में दोनों देश के बीच आपसी सहयोग व्यावहारिक होने के साथ-साथ शोध संस्थान के लिए आधारित है। भारत तीस्ता जल बंटवारे को लेकर बांग्लादेश से उसका विवाद चल रहा है। वर्ष 2011 के एक मसौदे के अनुसार भारत को तीस्ता के 42.5 फीसदी और बांग्लादेश को 37.5% पानी देने का प्रस्ताव था, जबकि बांग्लादेश इसके 50% जल पर अपना अधिकार चाहता है। तिस्ता नदी सिक्किम में हिमालय से निकलती है, पश्चिम बंगाल से होकर गुजरती है और बंगाल देश में ब्रह्मपुत्र में जाकर मिल जाती है क्योंकि कई वर्षों से भारत के गाजलडबा बैरेज और ऊपर की तरफ बनी परियोजना ने तीस्ता नदी के बहाव को सख्ती से नियंत्रित किया, ऐसे में चीनी इंजीनियरिंग की मदद से बांग्लादेश अपने यहां तीस्ता के जल की मात्रा तो नहीं बढ़ा सकता है लेकिन भारत की चिंता दूसरी वजह से है। यह नदी दरअसल उस सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब से गुजरती है जिसे चिकन नेक नाम से जाना जाता है। अगर चीन यहां तक पहुंचता है तो पूर्वोत्तर में भारतीय चिंता बढ़ जाएगी, हालांकि चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बिना किसी का नाम लिए कहा है कि चीन बांग्लादेश सहयोग से तीसरे पक्ष के लक्ष्य बनाकर नहीं किया जा रहा है, पर तीस्ता परियोजना में चीन का शामिल होना भारत के लिए चिंताजनक है और भारत बांग्लादेश संबंध का निश्चित रूप से इस पर प्रभाव पड़ेगा।