सुतियाम्बे गढ पर प्रकाश डालिए। पिठुरिया का यह किला क्यों प्रसिद्ध है। नागवंशावली में पुंडरीक नाग का जिक्र क्यों होता है?
Vinay singh Vinayiasacademy.com

पहली शताब्दी में झारखंड की राजधानी रांची के कांके प्रखंड अंतर्गत स्थित सुतियाम्बेगढ़ के नाम से प्रचलित, यह गाँव महाराजा मद्रा मुंडा की राजधानी थी। यह गाँव मुंडाओं की उद्गम स्थली एवं महाराजा मद्रा मुंडा और नागवंश की राजधानी होने के कारण अनेक ऐतिहासिक धार्मिक एवं प्राकृतिक विरासत को अपनी गोद में संजोए हुए हैं। ऐतिहासिक प्रमाण से पता चलता है कि 6000 ईसा पूर्व मुंडा का भारत में आगमन हुआ था। स्वतंत्र एवं शांतिप्रिय मुंडा जनजाति और बाहरी शत्रु का आक्रमण हुआ और वे सुरक्षित स्थल की खोज में पलायन करते रहे। इसी क्रम में रीसा मुंडा के साथ 1000 मुंडा ने झारखंड के उमेडंडा में प्रवेश किया। रिसा मुंडा के बाद सभी मुंडा दो दल में बंट गए। एक दल का नेतृत्व कोरंबा मुंडा और दूसरे दल का नेतृत्व सुतिया मुंडा कर रहे थे। सुतिया मुंडा के द्वारा बसाया गया गाँव की सूतीआम्बे कहलाया। कालांतर में इसी गाँव को महाराजा मद्रा मुंडा ने अपनी राजधानी बना दी। उस समय यह छोटा नागपुर के मुंडा राजा के पढ़हा पंचायत का मुख्य केंद्र था। गाँव में पढ़हा व्यवस्था थी .पढ़हा का प्रधान मुंडा होता था. गए कई गाँव को मिलाकर एक पढ़हा की स्थापना की जाती थी। प्रधान पढ़हा राजा कहलाता था। सभी का प्रधान मान की महाराजा कहलाता था। महाराजा मद्रा मुंडा ने प्रशासनिक सुविधा के लिए अपने क्षेत्र को 12 पढ़हा 22 ,पढ़ाहा छोटा और 24 पढ़ाहा ,झिकपढ़ाहा बांट दिया. कौनकी गाँव के युधिष्ठिर दुबे महाराजा मद्रा मुंडा के मंत्री और पुरोहित थे। इसका यह अर्थ हुआ कि आदिवासी के साथ ब्राह्मण जाति भी एक साथ रह रही थी। जन्मेजय के नाग यज्ञ के आतंक से भागकर पुंडरीक नाग, वाराणसी आ गए और एक ब्राह्मण परिवार में रहने लगे। बाद में ब्राह्मण की कन्या पार्वती से उनका विवाह हो गया। एक दिन पार्वती को शंका हुई उसका पति नाग जाति का है। भेद छिपाने के उद्देश्य से पुंडरीक नाग अपनी पत्नी के साथ तीर्थ यात्रा में निकल पड़ा। पूरी धाम से लौटते समय वह अंधरिया तलाब के पास पहुंचा और एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगा। पार्वती के दिन पूरे हो चुके थे। वह अपने पति से वास्तविक परिचय जानने के लिए हठ कर बैठी पुंडरीक ने उसे अपने नाग स्वरूप का दर्शन कराया और अंधेरिया तालाब में प्रवेश कर गया। भय और आतंक से विकल्प पार्वती ने उसी क्षण बालक जन्म देकर सती हो गई। बालक की असहाय इस स्थिति को देख पुंड्रिक, नाग पुनः प्रकट हुए और उसकी रक्षा करने लगे। यह विवाह पुंड्रिक नाग के मानव रूप को धारण कर लिया। , महाराजा मद्रा मुंडा और पुरोहित दुबे उसी रास्ते से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक बच्चा पड़ा हुआ है उसके मुंह के ऊपर एक नाग अपना फन फैलाए हुए सूर्य से बचा रहा है। पुरोहित जी यह सब देखकर जानकर आश्चर्यचकित हुए और बच्चे को चमत्कारी शिशु जानकर अपने साथ ले आए। उन्हीं दिनों महाराजा मद्रा मुंडा के परिवार में एक पुत्र रत्न का जन्म हुआ। पुरोहित ने उस बालक को उन्हीं के यहां पहुंचा दिया था, ताकि उसका समुचित लालन पालन हो सकें। महाराजा मद्रामुंडा के पुत्र का नाम मणिमुकुट राय था। इस बालक का नाम फणिमुकुट राय रखा गया। यह घटना मद्रा घासीराम के नाग वंशावली, झूमर में 15 माझी का उल्लेख है। मनी मुकुट राय और फनी मुकुट राय जब बड़े हुए तो महाराजा मद्रा मुंडा को चिंता हुई कि दोनों में से किसे अपना उत्तराधिकारी बनाया जाए तब परंपरा के अनुसार उन्होंने पढ़हा पंच की विस्तृत सभा बुलाई कई दिनों तक विचार विमर्श चलता रहा और बाद में पढ़हा पंच की उपस्थिति में पुत्र फनी मुकुट राय और अपने पुत्र मणि मुकुट राय के बीच योग्यता, दक्षता और विद्वता की परीक्षा ली गई। इस परीक्षा में बाल पोस् पुत्र सफल हो गया। नागवंशावली के अनुसार महाराजा फणी मुकुट राय प्रथम नागवंशी महाराजा हुआ और उसकी राजधानी भी सुतियांबे गढ़ रही। इस तरह महाराजा मथुरा मुंडा ने फनी मुकुट राय को अपनी गद्दी पर 83 इ में बैठा दिया। उस समय फनी मुकुट राय की उम्र 19 वर्ष की थी। झालदा के गोविंदवंशी निखर के यहां फनी मुकुट राय का विवाह हुआ। उन्होंने 177 इ तक शासन किया, अपने 94 वर्ष के शासनकाल उन्होने सुत्यम्बेगढ़ में 83वीं में सूर्य मठ की स्थापना की। आज भी मंदिर की मूर्तियाँ खंडित अवस्था में पड़ी हुई है।

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