Modern history – Vinay IAS Academy https://vinayiasacademy.com Rashtra Ka Viswas Thu, 13 Aug 2020 14:07:50 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=5.3.4 रामकृष्ण मिशन की स्थापना https://vinayiasacademy.com/?p=2857 https://vinayiasacademy.com/?p=2857#respond Sat, 01 Aug 2020 09:52:09 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2857 Share it 1.रामकृष्ण मिशन की स्थापना क्यों की गई? 2.रामकृष्ण मिशन के संस्थापक कौन थे? विश्व भ्रमण करने के दौरान 1897 ईसवी में 4 वर्ष बाद भारत पँहुचे एवं उन्होंने कोलकाता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की । शुरुआत में इसकी स्थापना बारानगर में की गई जिसे बाद में बेलूर में स्थापित किया गया. इसका […]

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1.रामकृष्ण मिशन की स्थापना क्यों की गई? 2.रामकृष्ण मिशन के संस्थापक कौन थे?

विश्व भ्रमण करने के दौरान 1897 ईसवी में 4 वर्ष बाद भारत पँहुचे एवं उन्होंने कोलकाता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की । शुरुआत में इसकी स्थापना बारानगर में की गई जिसे बाद में बेलूर में स्थापित किया गया.
इसका मुख्यालय उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा के मायावती नामक स्थान में भी स्थित है । रामकृष्ण मिशन का उद्देश्य समाज के पीड़ित वर्ग को उन उनकी पीड़ा से मुक्ति दिलाना था जैसे कोई रोगी जिसे चिकित्सा की आवश्यकता है उसका इलाज कराना। जनसाधारण के कष्टों का निवारण करना रोगियों को चिकित्सा प्रदान करना। इसके अलावा यदि कोई अनाथ है तो उसकी देखभाल भी रामकृष्ण मिशन के द्वारा की जाती थी अर्थात रामकृष्ण मिशन का मुख्य उद्देश्य था वर्तमान में पीड़ितों गरीबों अनाथ और रोगियों के कष्टों का निवारण करना। वे सामाजिक कुरीतियों के विरोध के बदले तत्काल में जो व्यक्ति पीड़ा से गुजर रहा है उनकी पीड़ा को दूर करना था।

रामकृष्ण मिशन का नाम रामकृष्ण परमहंस के नाम पर रखा गया। रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद के गुरु थे उनके स्मृति में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की गई।
राम कृष्ण जी के बचपन का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था इनका जन्म कोलकाता में हुआ था। कोलकाता में गंगा नदी के पूर्वी तट पर मां काली के मंदिर जिसे दक्षिणेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है वह इस मंदिर के पुजारी थे, इसीलिए इन्हें दक्षिणेश्वर के नाम से भी पुकारा जाता है। परमहंस तत्कालिक संतोष जैसे तोतापुरी भैरवी आदि से बहुत अधिक प्रभावित थे।
पुनर्जागरण काल में समाज सुधारको में रामकृष्ण परमहंस का नाम भी शुमार है । यह समाज के साथ-साथ लोगों की तकलीफों को अलग नजरिए से देखते थे। उनका मानना था कि सभी धर्म सच्चे हैं वह सभी ईश्वर तक पहुंचने का एक माध्यम है चाहे वह हिंदू धर्म हो ,पारसी ,क्रिश्चियन या मुस्लिम,सभी ईश्वर तक पहुंचने का एक मार्ग हैं।
इसलिए उन्होंने धर्म की एकता और मानव सेवा पर बल दिया। इस प्रकार धर्म की एकता में उन्हें बहुत विश्वास था। मानव सेवा का कार्य भी रामकिशन मिशन द्वारा पूरा किया गया। वह भारतीय संस्कृति व सभ्यता में निष्ठा रखते थे और सभी धर्मों को सत्य मानते थे एवं वह मूर्ति पूजा में विश्वास रखते थे।

राम कृष्ण जी के बचपन का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था इनका जन्म कोलकाता में हुआ था। कोलकाता में गंगा नदी के पूर्वी तट पर मां काली के मंदिर जिसे दक्षिणेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है वह इस मंदिर के पुजारी थे, इसीलिए इन्हें दक्षिणेश्वर के नाम से भी पुकारा जाता है। परमहंस तत्कालिक संतोष जैसे तोतापुरी भैरवी आदि से बहुत अधिक प्रभावित थे।

वे सभी धर्मों को मानते थे। तथा धर्मों को ईश्वर से मिलाने का एक माध्यम मानते थे। वे मानते थे कि जो शाश्वत है सर्वशक्तिमान है उस ईश्वर को पाने का बस एक ही मार्ग है वह है भक्ति और मानव सेवा का। मानवता को ही यह अपना सबसे बड़ा सेवा मानते थे।
उन्होंने तांत्रिक विधि से वैष्णव विधि से ईश्वर की साधना की। साधना के दौरान बुध बुध भगवान कृष्ण ईसा मसीह माता काली आदि देवों का दर्शन किया का दर्शन किया।
अद्वैत साधना में लीन होकर इन्होंने ईश्वर की तपस्या की तभी से इनका नाम परमहंस पड़ा और इसी नाम से यह विख्यात हो गए।
स्वामी विवेकानंद ——- स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 ईस्वी को कोलकाता में हुआ था। इनके बचपन का नाम नरेंद्र दत्त था। इनका भी सभी धर्मों में विश्वास था इन्होंने भारतीय दर्शन के साथ-साथ पश्चात्य दर्शन का भी अध्ययन किया था।
17 वर्ष की उम्र में 18 80 ईस्वी में पहली बार इनकी मुलाकात रामकृष्ण जिसे हुई थी। और कुछ ही समय में विवेकानंद परमहंस के प्रिय शिष्य बन गए। उनसे शिक्षा दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात विवेकानंद जी संपूर्ण भारत की यात्रा पर निकले और 1891 ईस्वी में तमिलनाडु पहुंच गए। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने भारत के गरीबों को पीड़ितों को देखा। जिस से उनको बहुत दुख हुआ और वह उनके दुख को दूर करने के लिए प्रयासरत हो गए। इसी प्रयास के संदर्भ में उन्होंने राम में कृष्ण मिशन की स्थापना की।
भारत भ्रमण के दौरान हैं वे राजस्थान के खेतडी में पहुंच गए। खेतडी के तत्कालिक राजा थे कुंवर अजीत राज सिंह। महाराजा नरेंद्र दत्त के विचारों से बहुत अधिक प्रभावित थे। उन्होंने ही इनका नाम स्वामी विवेकानंद दिया था।
इस प्रकार वे नरेंद्र दत्त से स्वामी विवेकानंद के नाम से मशहूर हो गए। महाराजा अजित राज सिंह ने अपने खर्च पर उन्हें शिकागो भेजा उस समय शिकागो में प्रथम विश्व धर्म सम्मेलन हो रहा था। महाराजा अजीतसिंह जानते थे कि विवेकानंद जी ही भारत की ओर से हिंदू धर्म( सनातन धर्म) का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं ।इसलिए 1893 ईस्वी में हिंदू धर्म के प्रतिनिधित्व करने के लिए उन्हें अमेरिका के शिकागो में भेजा गया।
19 सितंबर 1893 ईस्वी को इन्होंने विश्व धर्म सम्मेलन में बहुत ही ओजपूर्ण भाषण दिया इनके भाषण से वहां पर उपस्थित सभी धर्म ज्ञानी अचंभित हो गए।


अपने भाषन मे उन्होंने कहा जिस प्रकार सभी धाराएं अपने जल को नदी और फिर सागर मैं मिला देती है। ठीक उसी प्रकार यह सभी धर्म मनुष्य को ईश्वर तक पहुंचने का एक मार्ग है।
शिकागो की एक बहुत बड़ी पत्रिका थे जिसका नाम न्यूयॉर्क हरा डल था । ने उनको सुनने के बाद अपने पत्रिका में प्रकाशित किया कि निश्चित रूप से स्वामी विवेकानंद विश्व धर्म संसद के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है। इनको सुनकर उन्होंने कहा इनको सुनने के बाद हम अनुभव करते हैं ऐसे ज्ञान संपन्न देश भारत में हम अपने धर्म प्रचारक को भेजते हैं यह हमारी बहुत बड़ी मूर्खता है।
उसी वक्त विवेकानंद जी ने यह भविष्यवाणी की थी कि एक दिन समस्त विश्व पर सर्वहारा वर्ग और दलित वर्ग का शासन होगा। और ऐसा हुआ भी कुछ दिनों के बाद रूस में लिबरल पार्टी की राज्य हो गई और भारत में भी ऐसा ही दिन आएगा जहां सर्वहारा वर्ग और दलित वर्ग का साम्राज्य होगा।
1896 ईस्वी में उन्होंने न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी की स्थापना की उसी साल उन्होंने कैलिफोर्निया में शांति मठ की स्थापना की।


4 जुलाई 1902 को उनकी मृत्यु हो गई ।
इनका मुख्य उद्देश्य – मानवता की सेवा करना था। इन्हें नव हिंदू जागरण का संस्थापक भी माना जाता है नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का आध्यात्मिक पिता कहा है ।

इनके शिष्य लेडीस मार्गरेट नोबल थी जिन्हें भारत में सिस्टर निवेदिता के नाम से जाना जाता है उनकी मृत्यु उपरांत सिस्टर निवेदिता ने ही रामकृष्ण मिशन के कार्यभार को संभाला और उनके उपदेशों को और आदर्शों को आगे बढ़ाती रही ।
इन्होंने कई पुस्तकें लिखी थी जिसमें प्रमुख था मैं “समाजवादी हूं”, इनके और पुस्तकों में से था राजयोग ,कर्म योग ,भक्ति योग ,और मेरे गुरु,। इनके साथ हैं पुनर्जागरण का काल धीरे-धीरे
समाप्त होता गया । इनके सिद्धांत आज भी हमारे समाज के लिए एक आदर्श है।


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आर्य समाज की स्थापना https://vinayiasacademy.com/?p=2854 https://vinayiasacademy.com/?p=2854#respond Sat, 01 Aug 2020 09:06:56 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2854 Share it आर्य समाज की स्थापना कब हुई ? आर्य समाज के सिद्धांत क्या है? आर्य समाज द्वारा कौन-कौन से मुख्य कार्य किए गए हैं? दयानंद सरस्वती ने 1857 ईसवी में आर्य समाज की स्थापना की। उनका जन्म 1824 ईस्वी में गुजरात के बकराना के शिवपुर नामक ग्राम में हुआ था। उनका बचपन का नाम […]

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  1. आर्य समाज की स्थापना कब हुई ?
  2. आर्य समाज के सिद्धांत क्या है?
  3. आर्य समाज द्वारा कौन-कौन से मुख्य कार्य किए गए हैं?

दयानंद सरस्वती ने 1857 ईसवी में आर्य समाज की स्थापना की। उनका जन्म 1824 ईस्वी में गुजरात के बकराना के शिवपुर नामक ग्राम में हुआ था। उनका बचपन का नाम मूल शंकर था।
21 वर्ष की आयु में ही इन्होंने अपना गृह त्याग कर दिया और 15 वर्षों तक वह ज्ञान की खोज में घूमते रहे। उन्होंने 1860 ईस्वी में मथुरा पहुंच कर स्वामी बृज आनंद से दीक्षा ग्रहण किया था, वही उन्होंने संस्कृत की शिक्षा के साथ-साथ वेदों का ज्ञान भी प्राप्त किया।
वेदों के अध्ययन के बाद उन्हें यह एहसास हुआ कि वेद हमारे संस्कृति की मूल जड़ है जिसके बारें में सभी भारतीयों को जानना अति आवश्यक है, इसलिए उन्होंने “वेदों की ओर लौटो” का नारा दिया ।
आर्य समाज की स्थापना – हिंदू धर्म की वास्तविकता को सामने लाने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थ नामक एक ग्रंथ की रचना की।
जिसमें ज्ञान की वास्तविकता को जानने का अर्थ था छुपे हुए ज्ञान को जानना, जिसे उस समय के भारतीय पूर्ण रूप से अनभिज्ञ थे। उनके बारे में इस ग्रंथ में बताया।
दयानंद सरस्वती का विचार था कि जब तक लोग वेदों का अध्ययन नहीं करेंगे तब तक वह हिंदू धर्म को नहीं समझ सकेंगे। इस प्रकार उन्होंने हिंदू धर्म की वास्तविकता में छुपी हुई ज्ञान को बाहर लाने का प्रयास किया।
1857 ईसवी में मुंबई में दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की जो धीरे-धीरे आर्य समाज की जड़े हिंदुओं में फैलते चली गई एवं 20 वर्ष बाद आर्य समाज के प्रचार प्रसार के लिए 1877 ईसवी में लाहौर गए तथा 1878 ई० में दिल्ली में भी आर्य समाज की स्थापना की गई ।
30 अक्टूबर 1883 ई० में स्वामी दयानंद सरस्वती जी का निधन हो गया।


आर्य समाज के सिद्धांत – उन्होंने वेद सच्चाई को ज्ञान का स्रोत माना एवं उनका मानना था कि वेद का ज्ञान सभी भारतवासियों को होना अति आवश्यक है। वेद का ज्ञान ही लोगों को सच्चे ज्ञान की ओर ले जाता है। जिससे लोगों को फैल रही कुरीतियों को समझने की चेतना जागृत होती है। जिसके कारण नव चेतना से लोग नवजीवन को पुनर्जागरण के तौर पर नए जीवन का प्रारंभ कर सकते हैं।
उन्होंने सृष्टिकारी ईश्वर के बारे में कहा कि ईश्वर अजर ,अमर, निर्विकार, न्याय कारी, दयालु और सर्वशक्तिमान है।
उन्होंने कहा कि ईश्वर का कोई आकार नहीं होता है अर्थात् वे दयालु है वे सभी पर दया करते हैं, वह निर्विकार हैं वह अजर है उनकी ना तो मृत्यु होती है और ना ही जन्म, वह मनुष्य की रचना करते हैं, उन्होंने ही प्रकृति की और हम सब की रचना की है, उन्होंने जगत के सभी जीवो के लिए सुंदर सुंदर चीजें एवं स्थान बनाई है ,सृष्टि की रचना उनके हाथ में है ,इसलिए उन्होंने ईश्वर को सृष्टिकर्ता का नाम दिया।
3)— उनके अनुसार किसी भी कार्य की सत्यता और असत्यता पर विचार करके उस काम को करना चाहिए । आर्य समाज ने हमें संदेश दिया है कि किसी भी कार्य को करने से पहले उसकी सत्यता और सत्यता की जांच जरूर कर लेनी चाहिए।

4)—– सभी को असत्य का त्याग एवं सत्य को ग्रहण करना चाहिए। असत्य का मतलब यह है कि हमें कभी भी किसी प्रकार के झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए हमें सर्वदा सत्य बोलना चाहिए सत्य ही ऐसा मार्ग है जो हमें सत्य की ओर ले जा सकता है और सच्चे ज्ञान दिला सकता है

4)— मानव को केवल अपनी उन्नति स।से ही संतुष्ट नहीं होना चाहिए अर्थात केवल अपनी उन्नति के बारे में नहीं सोच कर दूसरों की उन्नति पर भी ध्यान देना चाहिए। सब की उन्नति को ही अपनी उन्नति समझना चाहिए यही उसकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए

6)—– समस्त मानव समाज को शारीरिक आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। शारीरिक का अर्थ होता है सभी के द्वारा किए गए कार्य ।आत्मिक का अर्थ होता है आत्मा के द्वारा किए गए कार्य। जो सभी के भलाई के लिए हो तथा सामाजिक उन्नति का अर्थ होता है हमारे द्वारा जो कार्य किए जाते हैं वे केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि समाज की उन्नति के लिए भी होना चाहिए। अर्थात हमारे भीतर सामाजिक भावना होनी चाहिए

7)— धर्मा अनुकूल ही आचरण करना मानव का प्रमुख कर्तव्य है। धर्मा अनुकूल कार्य करने में ही अपनी तथा समाज की भी भलाई निहित रहती है। इसके विपरीत हमें कार्य नहीं करना चाहिए यही आर्य समाज का सबसे प्रमुख उद्देश्य था

8)— अविद्या को समाप्त कर विद्या का प्रचार प्रसार करना चाहिए। प्राचीन समय में अधिकतर लोग अशिक्षित थे जिससे समाज पिछड़ा हुआ था। इसलिए उन्होंने विद्या पर जोर दिया और कहा कि अविद्या अर्थात अशिक्षा को छोड़कर ही हम समाज और खुद को उन्नत कर सकते हैं।

9)— स्वयं के हित से संबंधित कार्य में आचरण की स्वतंत्रता रखनी चाहिए परंतु सामाजिक कार्य में आपसे मतभेदों को भुला देना चाहिए। आचरण की स्वतंत्रता का अर्थ होता है हमें आचरण को हमेशा सुंदर रखना चाहिए परंतु सामाजिक कार्यों की जब बात आती है तो सद्भावना के लिए हमें इस प्रकार की भावनाओं को छोड़ देना चाहिए।

10) ज्ञान की प्राप्ति से ही ईश्वर का बोध होता है अर्थात बिना शिक्षा के ,ज्ञान के, हम वेदों का पुराणों का अध्ययन नहीं कर सकते जिससे लोगों को जागृत करना आसान नहीं होगा इस प्रकार हमें ईश्वर की प्राप्ति के लिए ज्ञान की आवश्यकता है।

आर्य समाज के कार्य—— स्वामी दयानंद सरस्वती ने सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में सुधार आदि के कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया जैसे—–
1—- सती प्रथा को समाप्त करने पर जोर दिया
2—- बाल विवाह को सामाजिक बुराई माना गया।

3— विधवा विवाह का समर्थन किया।

4—- जात पात एवं छुआछूत का पूर्णता: विरोध किया।

स्त्री प्रथा में जिस स्त्री के पति का देहांत हो जाता था उसे अपने पति के साथ ही जला दिया जाता था। अर्थात तत्कालीन समाज में स्त्री का खुद का कोई वजूद नहीं था उसके सामाजिक मेहता सुन के बराबर से।
२--बाल विवाह—उस समय कम उम्र में ही बच्चों की शादी कर दी जाती थी। जो अपने आप में एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई थी जिससेकई कुरीतियां उभर कर सामने आई थी। इसलिए बाल विवाह को समाप्त करने का उन्होंने भरपूर प्रयास किया ०
किसी स्त्री के पति के मरने के बाद या तो स्त्री को सती होना पड़ता था या जीवन पर्यंत उसे विधवा बनकर ही रहना होता था। उस समय एक विधवा कर समाज में बहुत ही दयनीय स्थिति थी जिंदा होकर भी वह पशु के समान जीवन व्यतीत करते थे उस पर बहुत सारे सामाजिक व्यवस्थाओं को लाभ दिया जाता था बहुत सारी बंदिशे थी। जिसे वाहन करते हुएअपनी जिंदगी व्यतीत करती थी ।

जात पात__जात पात छुआछूत का मतलब था कि उस काल में जात-पात की जड़े बहुत गहराई तक फैली हुई थी पूर्णविराम उस जाति के लोग निम्न जाति का बुरी तरह से शोषण किया करते थे। इन कुरीतियों कोहटाने के लिए ही उन्होंने अथक प्रयास किया।

३–—शिक्षा का विकास__स्त्रियों को समाज में आदर मिले इसके लिए स्त्री शिक्षा पर जोर दिया इससे शिक्षा अनिवार्य होना चाहिए ताकि उन्हें समानता का अधिकार मिले। उनका विश्वास था कि यदि स्त्री शिक्षित रहेगी तो समाज और अपने घर की उन्नति वह भली प्रकार से कर सकती है।

वैदिक शिक्षा का प्रचार प्रसार—–वैदिक शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने जगह-जगह गुरुकुल स्थापित करवाएं। ताकि लोग वैदिक शिक्षा का ग्रहण कर अपने मूल जड़े अर्थात हिंदुत्व की ओर आसानी से लौट सके और समझ सके कि उनकी वास्तविकता क्या है इसलिए उन्होंने वैदिक शिक्षा और पुराणों की शिक्षा के लिए गुरुकुल स्थापित किए।

एकेश्वरवाद——आर्य समाज ने वेद वेदों की ओर लौटो का नारा दिया तथा बहुत देवार और अवतारवाद का खंडन किया उनका कहना था कि ईश्वर अलग-अलग रूप में अवतार ना लेकर बल्कि एक ही है और एक ही ईश्वर की हमें पूजा करनी चाहिए जिससे समाज में व्याप्त आडंबर को दूर किया जा सके।
४—–अंधविश्वास तथा मूर्ति पूजा का विरोध कर एक ईश्वर की आराधना करने का संदेश दिया।

५-_—–प्राचीन आर्य संस्कृति और सभ्यता को सामने लाकर भारतीयों में आत्म सम्मान व गौरव पैदा करने का काम किया

६—-स्वामी जी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया। उस समय भारत में ब्रिटिश ब्रिटिश शासन था इसलिए विदेश विदेशों से ब्रिटिश सामान भारत में आयात किया जाता था जिससे भारतीयों का भरपूर शोषण होता था अर्थात वह सामान भारतीयों द्वारा में उपयोग में लाई जाती थी . जिसे भाग जिसे ब्रिटिशर्स भारत में आया करते थे वहीं दूसरी तरफ भारत में बने सामान काभारत में खपत नहीं हो पाता था। इस तरह धीरे-धीरे भारतीय कुटीर और लघु उद्योग समाप्त होते गए और विदेशी सामान का भारत में भरपूर उपयोग होने लगा। इसी वजह से उन्होंने विदेशी सामान का पूर्ण बहिष्कार किया और देसी उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास किया।

७——–भारतीयों को पुनर जागृत करने का काम किया। सत्य प्रकाश में उन्होंने लिखा था कि अच्छे से अच्छे विदेशी शासन की तुलना स्वदेशी शासन से नहीं की जा सकती। क्योंकि कोई भी विदेशी दूसरे प्रशासन तभी करता है जब उसका उसे शोषण करना होता है। इस प्रकार विदेशी केवल देश का शोषण ही करते हैं।

८—–वे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि भारत भारत वासियों के लिए है। अर्थात भारत में जो विदेशी शासन आए हैं तथा उनके साथ जो विदेशी संस्कृति आई है उसे पूर्णता समाप्त करना चाहिए तथा विदेशियों को अपने देश से खदेड़ देना चाहिए।
इस प्रकार देश की आर्थिक संस्कृतिक और सामाजिक विकास के लिए उन्होंने बहुत सारे कार्य के।


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भारत में आधुनिक, धार्मिक ,सामाजिक सुधार आंदोलन भूमिका https://vinayiasacademy.com/?p=2842 https://vinayiasacademy.com/?p=2842#respond Sat, 01 Aug 2020 05:41:25 +0000 https://vinayiasacademy.com/?p=2842 Share it1.भारत में आधुनिक धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन की क्या भूमिका थी? 2.ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की ? 3.धार्मिक आंदोलन के क्षेत्रों में शुरू हुई थी? 4.ब्रह्म समाज का विघटन कब हुआ था ? भारत में आधुनिक ,धार्मिक, सामाजिक सुधार आंदोलन भूमिका या पृष्ठभूमि –हर काल में चाहे वह प्राचीन काल हो मध्य […]

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1.भारत में आधुनिक धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन की क्या भूमिका थी? 2.ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की ? 3.धार्मिक आंदोलन के क्षेत्रों में शुरू हुई थी? 4.ब्रह्म समाज का विघटन कब हुआ था ?

भारत में आधुनिक ,धार्मिक, सामाजिक सुधार आंदोलन भूमिका या पृष्ठभूमि –हर काल में चाहे वह प्राचीन काल हो मध्य काल हो या आधुनिक काल हो समाज में कुछ ना कुछ बदलाव होता है जिसे हम कुर्तियां करते हैं इन कृतियों के फलस्वरूप समाज में एक वितरा धर्म रूढ़िवादिता समाहित हो जाती है इसे हटाने के लिए धर्म सुधार आंदोलन चलाया जाता है प्राचीन काल में धर्म सुधार के लिए गौतम बुद्ध आगे आएं, मध्यकाल में गुरु नानक संत कबीर आदि धर्म सुधारक आगे आएं, जिन्होंने सामाजिक और धार्मिक सुधार के लिए उपदेश दिए। इसी प्रकार आधुनिक काल में भी हिंदू समाज में कुरीतियां ऐसे चौराहे में पहुंच गया जहां जाकर समाज में विभिन्न कुर्तियां समाहित हो गई थी । जिससे कई विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गई थी। धर्म के नाम पर समाज उच्च और निम्न भागों में विभाजित हो गया । ऊंची जाति द्वारा निम्न जाति पर सामाजिक भेदभाव आर्थिक भेदभाव किए जा रहे थे जिसका परिणाम यह निकला कि आपस में जो लगाव था वह खत्म होने के कगार पर थे, इसी समय में भारत में विभिन्न यूरोपीय देशों से और ब्रिटिश से लोग आए और पादरी भी साथ में आए जो इन परिस्थितियों का फायदा उठाकर इन्हीं निम्न जातियों जनजातियों को मिशनरी धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभन देने लगे और उन्हें मिशनरी धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करने लगे। इस क्रम में एक धार्मिक उन्माद का वातावरण उत्पन्न होने लगा। इस समय भारत में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरकर सामने आता है और सामाजिक धार्मिक सुधार का भरसक प्रयास करते हैं उस क्रम में जो विभिन्न सामाजिक धार्मिक सुधार के प्रणेता रहे हैं जैसे राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद, केशव चंद्र सेन, दयानंद सरस्वती आदि।
धार्मिक सामाजिक सुधार में होता क्या है-समाज के जो कुर्तियां थी वह धर्म से जुड़ी थी तथा धर्म की जो कुरीतियां थी उनकी जगह समाज से जुड़ी थी इस कारण दोनों स्तर पर बदलाव लाने की पहल की गई शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया उनके प्रयासों के फलस्वरूप यह सुधार आंदोलन सामने आया जिन्हेंसामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन के नाम से जाना जाता है
सुधार आंदोलन के प्रमुख क्षेत्र– भारत में तीन प्रमुख प्रेसिडेंसी क्षेत्र जो ब्रिटिश के समय भारत में थे इन्हीं तीन केंद्रों से सुधार आंदोलन की लहर पूरे भारत में फैलने शुरू हुई। क्षेत्र थे मुंबई कोलकाता और मद्रास।

आखिर ऐसा क्या था कि इन्हीं तीन क्षेत्रों से सुधार आंदोलन का प्रारंभ हुआ।

वास्तविकता यह है कि ब्रिटिशर्स जहां इकट्ठा हुए वह जगह व्यापारिक केंद्र बन गया जो प्रेसिडेंसी के रूप में विकसित हुआ था। जँहां शिक्षा का विकास सबसे पहले हुआ। इसी शिक्षा के विकास ने एक मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवियों का वर्ग उत्पन्न किया।
बुद्धिजीवी मध्यम वर्ग ने पूरे धार्मिक सामाजिक सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया और यही कारण है कि बंगाल में कोलकाता, बंबई और मद्रास में यह तीनों क्षेत्र से विकसित हुए जहां से धार्मिक सामाजिक सुधार आंदोलन की लहर वही जो धीरे-धीरे पूरे हिंदुस्तान में फैल गई ।
जिसमें सबसे अग्रेन राजा राममोहन राय। इन्हें धार्मिक सुधार आंदोलन के नेता या अग्रदूत भी कहा जाता है।
राजा राममोहन राय-। राजा राममोहन राय जी प्रारंभ से ही मूर्ति पूजा, बहू देव और आदि के विरोध में थे। उनका जन्म 1774 ईसवी तथा इनकी मृत्यु 1833 ईस्वी में हुई।
नवजागरण-। नवजागरण को पुनर्जागरण भी कहा जाता है।नवजागरण या पुनर्जागरण के अग्रदूत या आधुनिक भारत के पिता के नाम से भी राजा राममोहन राय को जाना चाहता हैै

वह विभिन्न भाषाओं के ज्ञाता थे जैसे इंग्लिश, संस्कृत, फारसी, हिंदी। 7 भाषाओं में यह पारंगत है इतनी शिक्षा प्राप्त करने के कारण है इनकी बुद्धिमता का स्तर काफी ऊपर था।
वह एक आम आदमी से हटकर रूढ़िवादी सोचो से ऊपर उठकर मूर्ति पूजा के विरोध के रूप में और सामाजिक समानता के पक्षधर के रूप में उभर कर सामने आए थे।
उनके कार्यों को तीन खंड में विभाजित करते हैं।
१-। धार्मिक सुधार की दिशा के क्षेत्र में
२-। शिक्षा के क्षेत्र में,
३-। पत्रकारिता के क्षेत्र में

१_। धार्मिक क्षेत्र-– राजा राममोहन राय जी ने सबसे पहले फारसी में एक ग्रंथ लिखी इस पुस्तक का नाम
तोहफा त-उ ल – मोहेदि इ, पुस्तक में उन्होंने पहली बार मूर्ति पूजा का विरोध किया।
इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद होता है एकेश्वरवाद को उपहार अर्थात वह बहुदेवबाद विरोधी थे। धीरे धीरे धार्मिक सुधार को लेकर प्रयत्न करना शुरू किया इस संदर्भ में सर्वप्रथम
1815 में आत्मीय सभा नाम की एक संगठन स्थापित की इस सभा का उद्देश्य धार्मिक सुधार से जुड़ा हुआ था।
1816 ईस्वी में वेदांत सोसाइटी नाम की सभा स्थापित की।
1820 ईसवी में इन्होंने एक प्रमुख कार्य किया जो ईसाई धर्म पर आधारित एक पुस्तक था जिसका नाम पृष्ठ ऑफ जीसस था। जिसमें उन्होंने ईसाई धर्म पर कटाक्ष किया। ईसाई धर्म के बुराइयों के भी विरोधी थे। इस पुस्तक में उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि किस प्रकार से ईसा मसीह को चमत्कारिक शक्ति का व्यक्ति बताया गया है । परंतु वास्तव में ऐसा नहीं हो सकता। इस प्रकार ईसाई धर्म में दिखावा पन था उसे भी उजागर करने की कोशिश की।

1823 में जॉन हिंडोन के प्रयासों से लंदन में प्रकाशित किया गया
1828 ईस्वी- उनका जो प्रमुख सुधार माना जाता है वह 1828 इसमें में ब्रह्म समाज का गठन जिसका मूल उद्देश्य हिंदू धर्म में आए कुर्तियों को दूर करना था। बाद में यही ब्रह्मसमाज के नाम से जाना जाने लगा। ब्रह्म समाज और भ्रम सभा की स्थापना का श्रेय भी राजा राम मोहन राय को जाता है उन्होंने इन सभी प्रयासों से धर्म में एकेश्वरवाद लाने का प्रयास किया मूर्ति पूजा बहुदेवबाद तथा समाज में व्याप्त भेदभाव का भी विरोध किया।
शिक्षा के क्षेत्र में सुधार- 1829 ईस्वी में कोलकाता में हिंदू कॉलेज की स्थापना देवीधर के सहयोग से की थी 1825 ईस्वी में वेदांत कॉलेज की स्थापना की।
पत्रकारिता के क्षेत्र में सुधार– राजा राम राजा राम मोहन राय को भारतीय पत्रकारिता का अग्रदूत भी कहा जा जाता है वह कई भाषा के जानकार थे इसलिए उन्होंने विभिन्न भाषाओं में पत्रकारिता का भार लिया और समाचार पत्र छापे। उनमें प्रमुख है1
1– 1821 ईस्वी में संवाद कुमुदिनी बांग्ला भाषा में छपी
2– 1822 में मीरात उल अखबार फारसी भाषा में छपी।

3-‘ 1823 ईस्वी में ब्रह्मनिकल मैगजीन इंग्लिश में प्रकाशित की यह तीन प्रमुख कार्य पत्रकारिता के क्षेत्र में थे।
सामाजिक क्षेत्र में योगदान– वे जातिवाद के विरोधी थे महिलाओं के उत्थान के पक्षधर थे। उन्हीं के प्रयासों ने के फल स्वरुप 1829 ईस्वी में Lord William Bentinck की सहायता से सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। वे सामाजिक समानता के पक्षधर थे सती प्रथा पर प्रतिबंध 1829 में बंगाल में तथा 1830 में मद्रास और मुंबई में इस प्रथा पर प्रतिबंध लगा।
सती प्रथा हटाना यह उनका एक महत्वपूर्ण सामाजिक सहयोग माना जाता है
राजा की उपाधि1830 ईस्वी में बादशाह अकबर द्वितीय उनके संपर्क में आए और उन्हें राजा की उपाधि दी अपने एक दूत के रूप में ब्रिटेन भेजा जिसमें भारतीय राजाओं के साथ अच्छे व्यवहार के गुजारिश की गई थी उस समय समुद्र को पार करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। 1833 ईस्वी में England के ब्रेस्टन शहर में उनकी मृत्यु हो गई।

1830 ईस्वी में उनके इंग्लैंड जाने के बाद राजा रामचंद्र बीघा बग्गी स्को ब्रह्मसमाज की कार्यभार दिया गया परंतु 1833 ईस्वी में राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद द्वारिका नाथ द्वारा इसे संभाला गया। 1843 ईस्वी में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र देवेंद्र नाथ टैगोर के द्वारा ब्रह्म समाज को संभाला गया।

ब्रह्म समाज का विघटन— केशव चंद्र सेन ने देवेंद्र नाथ को आचार्य के पद पर स्थापित किया केशव चंद्र जी काफी उदारवादी थे फल स्वरुप वह विभिन्न धर्मों को जोड़ने का प्रयास करने लगे जिससे ब्रह्म समाज काफी उदास उदारवादी हो गया। परिणाम स्वरूप 1865 ईस्वी में उन्हें आचार्य के पद से निष्कासित कर दिया गया। जिससे ब्रह्म समाज दो भागों में बट गया
1– ब्रह्म समाज
2– आदि ब्रह्म समाज या भारतीय ब्रह्म समाज
ब्रह्म समाज का नेतृत्व देवेंद्र नाथ के द्वारा किया गया। जबकि आदि ब्रह्म समाज का नेतृत्व केशव चंद्र सेन के द्वारा किया गया। भारतीय ब्रह्म समाज ज्यादा चर्चित रहे वनस्पति के ब्रह्म समाज के। उनके द्वारा ब्रह्म विवाह को एक act के रूप में पारित करवाया गया।
परंतु जैसा जाना जाता है किसी भी संस्था में धीरे-धीरे कुर्तियां पर अपने लगती है उसी प्रकार 1878 ईस्वी में चंद्रसेन बाबू जिस कृतियों का विरोध करते थे वे उसे खुद करते हुए बिहार के राजा से अपने 12 वर्ष की पुत्री का विवाह कर देते हैं परिणाम स्वरूप आदि ब्रह्म समाज पुनः दो भागों में विभाजित हो जाता है इस प्रकार ब्रह्मसमाज धीरे धीरे बहुत खंडों में विभाजित हो जाता है जिसका पुनर्गठन किसी भी बड़े नेता द्वारा संभव नहीं हो पाता और ब्रह्मसमाज मुख्यधारा से हट जाता है और नए धार्मिक संगठन का उद्भव होने लगता है।


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