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दिल्ली में भारतीय सेना के द्विवार्षिक सम्मेलन की शुरुआत हुई जाने विस्तार पूर्वक?

सेना कमांडरों का सम्मेलन नई दिल्ली में शुरू हो गया। 27 से 29 मई 2020 तक यह सम्मेलन का पहला चरण आयोजित किया जाएगा। सेना कमांडरों का सम्मेलन एक सबसे उच्च स्तर का आयोजन होता है जिसे साल में दो बार आयोजित किया जाता है। इस सम्मेलन को पहले अप्रैल के महीने में वर्ष 2020 में आयोजित किया जाना था, कोविड-19 महामारी के वजह से यह सम्मेलन को स्थगित कर दिया गया था। लेकिन अब इस सम्मेलन को दो चरणों के लिए आयोजित करने की योजना बनाई गई है। इस सम्मेलन का दूसरा चरण वर्ष 2020 जून के महीने के अंतिम सप्ताह में आयोजित किया जाएगा। इस सम्मेलन के पहले चरण में भारतीय सेना का सबसे उच्च स्तर का नेतृत्व परिचालन उसी समूह का मार्गदर्शन और प्रशासनिक मुद्दों से संबंधित कई पहलुओं पर विचार विमर्श करेगा जिसमें रशद और मानव संसाधन से संबंधित अध्ययन शामिल है। इस सम्मेलन में वे मौजूदा उभरती सुरक्षा एवं प्रशासनिक चुनौतियों पर विचार मंथन करेंगे और भारतीय सेना के लिए भविष्य की रूपरेखा तय करेंगे। जिससे कि भारतीय सैनिक कुशल सेनापतियों के नेतृत्व में अपने दुश्मनों के हमले से खुद और देश को सुरक्षित रख सके।
भारत सरकार अपने देश और इस देश से जुड़े सभी क्षेत्र के लोगों को सुरक्षित रखने के लिए उत्तरदायी होती है। भारतीय शस्त्र सेनाओं की सबसे उच्च कमान भारत के राष्ट्रपति के पास है। और राष्ट्र की रक्षा का दायित्व मंत्री मंडल के पास होता है।इसका खर्च रक्षा मंत्रालय द्वारा किया जाता है जो सशस्त्र बल भारतीय सेनाओं को देश की रक्षा के विषय में उनके दायित्व के निर्वहन के लिए नीति संबंधित रूपरेखा और जानकारियाँ प्रदान करती हैं। भारतीय सशस्त्र सेना में तीन मंडल है: भारतीय थल सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना।

भारतीय थल सेना इसकी स्थापना 1 अप्रैल 1895 में 125 वर्ष पहले हुई थी। यह भारतीय सशस्त्र सेनाएं का भाग है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। इसके थलसेनाअध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे है और उप सेनाप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल सरत चंद्र है।भारतीय थल सेना को 13 कोर के सम्मिलित 35 मंडलों में संगठित किया गया है यहाँ का मुख्यालय भारत की राजधानी नई दिल्ली में स्थित है और यह सेना प्रमुख (चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ) की देखरेख में रहती है।वर्तमान में जनरल बिपिन रावत सेना प्रमुख हैं।
इसकी कमान के रचना के लिए सेना की 6 क्रियाशील कमांड और एक प्रशिक्षण कमांड मौजूद रहते हैं। प्रत्येक कमान का नेतृत्व जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ होता है जो कि एक लेफ्टिनेंट जनरल रैंक का अधिकारी होता है। हर कमांड नई दिल्ली में स्थित सेना मुख्यालय से सीधे जुड़ा हुआ है।


भारतीय थलसेना, सेना की भूमि के आधार पर दल की शाखा है और यह भारतीय सशस्त्र बल का सबसे बड़ा अंग है। थलसेना का प्रधान सेनापति भारत का राष्ट्रपति होता है।भारतीय थल के सेना के अध्यक्ष के हाथों में इनकी कमान होती है इनकी पद सबसे उच्च होती है। यह चार सितारा जनरल स्तर के अधिकारी होते हैं। पाँच सितारा रैंक के साथ फील्ड मार्शल की रैंक भारतीय सेना में सबसे श्रेष्ठ सम्मान के औपचारिक स्थिति को बतलाता है। वर्तमान में सिर्फ दो अधिकारियों को ही इससे सम्मानित किया गया है। भारतीय सेना की उत्पत्ति ईस्ट इंडिया कंपनी से हुई, जो कि ब्रिटिश भारतीय सेना के रूप में बदल गया भारत के राज्यों की सेना से हुआ, जो स्वतंत्रता के राष्ट्रीय सेना के रूप में परिवर्तित हुए। भारतीय सेना की टुकड़ी और रेजीमेंट का विविध इतिहास रहा है इसने विश्व के कई युद्ध और अभियानों में भाग लिया है तथा आजादी से पूर्व और इसके पश्चात भी इसे बड़ी संख्या में युद्ध के क्षेत्र में सम्मान प्राप्त हुआ है।
भारतीय सेना का सर्वप्रथम उद्देश्य राष्ट्र को सुरक्षित और राष्ट्रवाद की एकता को बनाए रखना और इसे बाहरी आक्रमण और आंतरिक खतरों से बचाव, इसके साथ ही अपनी सीमाओं पर शांति और सुरक्षा को बनाए रखना है। यह प्राकृतिक आपदाओं और घटनाओं के वक्त मानव के बचाव के लिए कई तरह के अभियान भी चलाते हैं जैसे ऑपरेशन सूर्य आशा, और आंतरिक खतरों के बचाव के लिए यह सरकार से सहायता का अनुरोध भी करते हैं। यह भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के साथ मिलकर राष्ट्र की शक्ति का निर्माण करते हैं। यह सेना वर्तमान में अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ चार युद्ध और चीन के साथ एक युद्ध कर चुका है।ऑपरेशन विजय, ऑपरेशन मेघदूत, और ऑपरेशन कैक्टस जैसे कई विशेष अभियान इनके सेना द्वारा किए गए हैं। इनके सेनाओं ने बहुत संघर्ष किया है और शांति के वक्त कई बड़े अभियान जैसे ऑपरेशन ब्रासस्टैक्स और युद्ध अभ्यास शूरवीर का संचालन किया है। यह सेना कई देशों की संयुक्त राष्ट्र की शांति के मिशन में एक सक्रिय भूमिका निभाई है जिनमें साइप्रस, लेबनान, कांगो, अंगोला, कंबोडिया, वियतनाम, नामीबिया, एल साल्वाडोर, लाइबेरिया, मोजांबिक और सोमालिया जैसे कई देश शामिल है।
भारत की सेना में एक सैन्य दल (रेजीमेंट) प्रणाली है, लेकिन यह बुनियादी क्षेत्र के गठन विभाजित करने के साथ उसे सुचारू रूप से संचालित भी करती है और इसे भौगोलिक रूप में सात कमान में बाँटा गया है। यह एक सर्व स्वयंसेवी बल है यह अपना काम और अपने बल की रक्षा खुद करती हैं। देश में तैनात रक्षा कर्मियों का इसमें योगदान अस्सी प्रतिशत से अधिक है। यह विश्व की दूसरी सबसे बड़ी स्थायी सेना है जो अपने विश्व में 1,200,255 सक्रिय सैनिकों और 909,60 आरक्षित सैनिकों के साथ मिलकर देश की सुरक्षा में अपना योगदान देती हैं। सेना ने सैनिकों को नए जमाने और आधुनिक रूप देने के लिए आधुनिकीकरण कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिसे “फ्यूचरिस्टिक इन्फेंट्री सैनिक एक प्रणाली के रूप में” के नाम से जाना जाता है और इसके अलावा बख्तरबंद, तोपखाने (जहाँ तोप रखने के स्थान जैसे कि गोला बारूद और तोपों का कई विशेष समूह जिसका कवच बख्तर से सुरक्षित रखा जाता है उदाहरण के तौर पर गाड़ी या ऐसी ही कोई और चीज जिस को सुरक्षित रखने के लिए बख्तर की तरह मोटी- मोटी चादरे या तवे जड़ी होती है।) इसके अलावा उड्डयन शाखाओं के लिए नए संसाधनों को संग्रह करके उसको सुरक्षित भी करते हैं ।इन संसाधनों में वे सभी तरह के सुधार करने का प्रयास कर रहे हैं।


भारतीय थल सेना का मुख्य उद्देश्य यही है कि किस प्रकार बड़े स्तर के युद्ध से देश की रक्षा की जाए इसके साथ ही आंतरिक खतरों से बचने और जरूरत पड़ने पर नागरिक के अधिकारों मे सहायता प्रदान की जाए, इसके अलावा प्राकृतिक आपदा जैसे कि भूकंप ,बाढ़ समुद्री तूफान, आग लगने, तथा विस्फोट आदि होने पर देश के नागरिक प्रशासन की मदद की जाए। बाहरी खतरों से बचाव के लिए या युद्ध छेड़ने की स्थिति में शक्ति संतुलन के द्वारा राष्ट्र को सुरक्षित रखा जाए एवं उसके हित और संप्रभुता की रक्षा की जाए क्षेत्र की अखंडता और भारत की एकता को सुरक्षित बनाए रखना उनका मुख्य लक्ष्य है इसलिए पहले होने वाले भारतीय इन्फैंट्री सैन्यदल( पैदल सेना की एक सामान्य शाखा है ) जिनका कार्य पैरों पर सैन्य युद्ध में जुड़ी होती है इस शाखा के सैनिक दुश्मन के साथ काफी करीब से लड़ते हैं इसी वजह से युद्ध के मैदान में अच्छी तरह से प्रशिक्षित सैनिक, जिनमे फिजिकल फिटनेस हो, सैनिकों की नियुक्ति के लिए यह सैन्य दल की जिम्मेदारी होती है। अपने ब्रिटिश और राष्ट्रमंडल की तुलना में सैनिक अपने बटे हुए सैन्यदल के प्रति काफी वफादार और गर्व महसूस करते हैं जहाँ विशेष रूप से उनका पूरा कार्यकाल बितता है।
भारतीय नौसेना – इसकी स्थापना अंग्रेजों के समय मे 5 सितंबर 1612 कोई ही हुई थी ,लेकिन वर्तमान में नेवी डे 4 दिसंबर को हर वर्ष मनाया जाता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है भारतीय नौसेना स्टाफ के प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा है। इन्होंने 21 मई 2016 को एडमिरल आर के धवन के बाद कार्यालय ग्रहण किया और मई 2019 तक अपना पद संभाला। ये स्टाफ कमेटी के प्रमुखों का भी अध्यक्ष( सीओसी) है ।एडमिरल सुनील लांबा भारत के नौसेनाध्यक्ष है।ये भारतीय नौसेना शाखा में कार्यरत हैं। इनका जन्म 17 जुलाई 1957 में पलवल, पंजाब, भारत,(अब हरियाणा में, भारत) में हुआ। लेकिन देश के नए नौसेना अध्यक्ष के रूप में भारत की सरकार ने वाइस एडमिरल करमबीर सिंह को नियुक्त किया है, ये वर्तमान में वाइस एडमिरल सुनील लांबा का स्थान लेंगे। सुनील लांबा का कार्यकाल 31 मई 2019 को समाप्त हो जाएगा और इसके बाद 31 मई 2019 से भारत के वर्तमान नौसेना अध्यक्ष एडमिरल करमबीर सिंह है।इसके साथ ही नौसेना स्टाफ के उपाध्यक्ष एडमिरल अजीत कुमार है और नौसेना स्टाफ के उप प्रमुख वाइस एडमिरल जी अशोक कुमार है।
भारतीय नेवी शुरुआत में सिर्फ अंग्रेजों के जहाजों की रक्षा के लिए थी लेकिन अब यह भारतीय समुद्र की रक्षा का जिम्मा भी लेती है और इसने अपने कार्य को हर क्षेत्र में विकसित कर लिया है।
यह भारतीय सशस्त्र सेनाओं का भाग है अपनी गौरवशाली इतिहास के कारण भारतीय सामुद्रिक सीमा और भारतीय सभ्यता और इसकी संस्कृति की रक्षा भी करता है। यह भारतीय सीमा की सुरक्षा को निभाती है। इसके साथ ही विश्व के दूसरे प्रमुख मित्र राष्ट्रों के साथ सैन्य अभ्यास में भी सम्मिलित होती है ,यह पिछले कुछ वर्षों से निरंतर आधुनिकीकरण के अपने प्रयास से यह विश्व की एक प्रमुख शक्ति बनने की भारत की महत्वाकांक्षाओं को सफल बनाने का प्रयास कर रही है।भारतीय नौसेना सन 1612 ईसवी में ईस्ट इंडिया कंपनी की युद्धकारणी सेना के रूप में इंडियन मेरीन संगठित की गई। सन 1685 में इसका नाम रखा गया “बंबई मेरीन” और यह सन 1830 तक चला। “भारतीय नौसेना अनुशासन अधिनियम” 8 सितंबर 1934 ईस्वी को भारतीय विधानपरिषद द्वारा पारित किया गया, और रॉयल इंडियन नेवी का उत्पत्ति हुआ। नौसेना का विस्तार हुआ द्वितीय विश्व युद्ध के समय और अधिकारी तथा सैनिकों की संख्या बढ़कर दो हजार से तीस हजार तक हो गई, एवं बेड़े में आधुनिक जहाजों की संख्या भी बढ़ने लगी।स्वतंत्रता प्राप्ति के वक्त भारत की नौसेना में वो विशेष बल नहीं था कि वे युद्ध के क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण कार्य कर सकें और इसी वजह से इन्हें विभाजित करने के लिए शर्तों के अनुसार लगभग एक तिहाई सेना पाकिस्तान को दी गई। कुछ अधिक महत्व वाले नौसैनिक संस्थान भी पाकिस्तान के हो गए। भारत सरकार ने नौसेना को विस्तार करने के लिए तुरंत अपनी योजना बनाई और एक वर्ष बीतने के पूर्व ही ग्रेट ब्रिटेन से सात हजार तीस टन का क्रूजर “दिल्ली” खरीदा। इसके पश्चात ध्वंसक “राजपूत”, “राणा”, “रणजीत”, “गोदावरी”,“गंगा” और “गोमती” खरीदे गए।इसके बाद आठ हजार टन का क्रूजर खरीदा गया जिसका नाम मैसूर रखा गया। 1964 ईस्वी तक भारतीय बेड़े (जो कि नाव और जहाजों का समूह होता है) में वायुयानवाहक,“विक्रांत” ( नौसेना का ध्वजपोत )क्रूजर “ दिल्ली” और “ मैसूर” दो ध्वंसक स्क्वाड्रन जो कि थलसेना, नौसेना ,और वायुसेना की टुकड़ी है,जैसे कि कोई नाव को बनाने के लिए लट्ठों लकड़ियों को बाँधकर उसके ऊपर टट्टर बिछाकर बनाई जाती है ) तथा कई प्रकार के फ्रिगेट (जो कि एक युद्धपोत नौका होती है और यह मध्यम आकार का होता है इसे तेज गति और फुरती से दिशा बदलने की दृष्टि से बनाया जाता है इनका उपयोग दूसरी नौकाओं व जहाजों के साथ चलकर उनकी रक्षा करने, उनके लिए सामान और रसद लाने और ले जाने और तेजी से किसी छोटी नौका को पकड़ने के लिए किया जाता है और भारी नौसैनिक युद्ध के लिए यह स्वयं सक्षम नहीं होती) स्क्वाड्रन थे, जिनमें कुछ अत्यधिक वर्तमान के पनडुब्बीनाशक तथा वायुयाननाशक फ्रिगेट को शामिल किया गया था। “ब्रह्मपुत्र”,“व्यास”,“बेतवा”,“खुखरी”,“कृपाण”,
“तलवार”,तथा “त्रिशूल” नए प्रकार के फ्रिगेट है इसे विशेष रीति से बनाया गया है। “ कावेरी”, “कृष्ण”, और “ तीर” पुराने फ्रीगेट है जिनका उपयोग प्रशिक्षण देने के लिए होता है। “ कोंकण”, “ कारवार”, “ काकीनाडा”, “ कणानूर”, “कडलूर”, बसीन तथा बिमलीपट्टम से सुरंग हटाने वाले तीन स्क्वाड्रन तैयार किए गए हैं। छोटे नौसैनिक जहाजों को नए सिरे से निर्माण करने की शुरुआत हो चुकी है और तीन सागरमुख प्रतिरक्षा नौकाएँ “अजय”, “अक्षय”, तथा “अभय”और एक नौबंध “ ध्रुवक” तैयार किए गए हैं। भारतीय नौसेना के प्रशिक्षण संस्थान कोचीन, लोणावला,और जामनगर में है ।इसके साथ ही भारत की नाभिकीय ऊर्जा पनडुब्बी आई एन एस अरिहन्त है।
भारतीय वायु सेना- यह भारतीय सशस्त्र सेना का एक अंग है जो वायु युद्ध , वायु सुरक्षा, एवं वायु चौकसी का महत्वपूर्ण कार्य देश के लिए करता है। इसकी स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को रॉयल इंडियन एयर फोर्स के रूप में की गई थी उस वक्त अंग्रेजों का शासन काल था। भारत की आजादी के बाद जब 1950 मे भारत गणतंत्र बना तब इसके नाम के आगे से रॉयल शब्द हटा दिया गया और सिर्फ इंडियन एयरफोर्स कर दिया गया इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायु सेना है सैनिकों और एयरक्राफ्ट के विषय में। भारतीय वायु सेना ने 1945 के द्वितीय विश्व युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
वायुसेनाध्यक्ष -एयर चीफ मार्शल राकेश कुमार सिंह भदौरिया है। वायु सेना के उप सेनापति – एयरमार्शल है और प्रसिद्ध सेनापति मे वायुसेना के मार्शल अर्जुन सिंह है। एयर चीफ मार्शल प्रताप चंद्र लाल है।एयर मार्शल सुब्रतो मुखर्जी है। लेकिन वर्तमान में वायु सेना का उप प्रमुख नियुक्त किया गया है एयर मार्शल एचएस अरोड़ा को। ये एयर मार्शल कुमार सिंह भदौरिया के स्थान पर नियुक्त किए जाएंगे। एयर मार्शल राकेश कुमार सिंह भदौरिया को वायुसेना का नया चीफ बनाया गया। वो एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ के स्थान पर नियुक्त किए जाएंगे। बीएस धनोआ ( बीरेंद्र सिंह धनोआ) 30 सितंबर को चीफ ऑफ एयर स्टाफ के पद से रिटायर हो रहे हैं और वर्तमान में एयर मार्शल राकेश कुमार सिंह भदौरिया वाइस चीफ ऑफ द एयर स्टाफ है। वो वायु सेना के पहले पायलट है जिनके द्वारा वो राफेल फाइटर जेट को उड़ाया गया। एयर मार्शल भदौरिया हल्के लड़ाकू विमान एलसीए तेजस के आरंभिक नमूनों की उड़ान में व्यापक रूप से शामिल रहे हैं। और उन्होंने 26 विभिन्न लड़ाकू व मालवाहक विमानों की 4,250 घंटे की उड़ान भरी है। भदौरिया वर्तमान में वायु सेना के उप प्रमुख है। वह वर्तमान एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ के 30 सितंबर को सेवानिवृत्त होने पर वायु सेना प्रमुख का कार्यभार संभालेंगे। वायु सेना के विभिन्न विमानों में अपनी कुशलता के अलावा भदौरिया एक एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट , कैट ‘ए’ क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर और पायलट अटैक, इंस्ट्रक्टर है। वायु सेना में वे विभिन्न प्रमुख पदों पर जिनमें जगुआर, स्क्वाड्रन और प्रमुख एयरफोर्स स्टेशन की अगुवाई के साथ-साथ एयरक्राफ्ट और सिस्टम परीक्षण केंद्र में फ्लाइट टेस्ट स्क्वाड्रन की कमान संभालने के साथ हर क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए उसे बहुत अच्छे से निभाया। इसके अलावा वे प्रोजेक्ट डायरेक्टर रह चुके हैं जिनमें प्रमुख परीक्षण पायलट और एलसीए प्रोजेक्ट के राष्ट्रीय उड़ान परीक्षण केंद्र को शामिल किया गया। इन्होंने अपनी सेवा रूस में एयर अटैच के रूप में दी है। इसके साथ ही वह वायुसेना अधिकारी भी रहे हैं, जिसमे राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के कमांडेंट, सेंट्रल एयर कमान के सीनियर एयर स्टाफ ऑफिसर, डिप्टी चीफ ऑफ द एयर स्टाफ और उसके बाद दक्षिणी एयर कमान के कमांडिंग के रूप में कार्यरत थे।
भारतीय वायु सेना आजादी के बाद से ही पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के साथ चार युद्ध और चीन के साथ एक युद्ध में अपना योगदान दे चुका है । इसके साथ ही ऑपरेशन विजय – गोवा का अधिग्रहण, ऑपरेशन मेघदूत, ऑपरेशन कैक्टस, और ऑपरेशन पुमलाई जैसे कई बड़े मिशनों को उसके लक्ष्य तक पहुंचाया है। इसके अलावा कई ऐसे विवादों मे भी भारतीय वायुसेना संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन का भी सक्रिय हिस्सा रही है। भारतीय वायु सेना के कमांडर इन चीफ के रूप में कार्य करते हैं भारत के राष्ट्रपति। वायु सेनाध्यक्ष, एयर चीफ मार्शल, एक चार सितारा कमांडर है और वे अपनी वायु सेना की देखरेख अच्छे तरीके से करते हैं। भारतीय वायु सेना में किसी भी समय एक से अधिक एयर चीफ मार्शल सेवा में कभी नहीं होते हैं।भारतीय वायुसेना का मुख्य उद्देश्य यही है कि किस प्रकार भारत और उसके साथ संबंधित हर क्षेत्र की रक्षा वे कर सके एवं उसके बचाव के लिए पहले से तैयारी ,और ऐसी रणनीति बनाई जाए जिसे युद्ध के समय में अनुकूल किया जा सके। उनके लिए सभी खतरों से भारतीय हवाई क्षेत्र की रक्षा करना, सशस्त्र बलों की दूसरी शाखाओं के साथ मिलकर भारतीय क्षेत्र और राष्ट्र के हित में उनको सुरक्षा प्रदान करना पहला लक्ष्य है।भारतीय वायु सेना युद्ध की भूमि में अपने सैनिकों को हवाई समर्थन के साथ सामरिक और रणनीतिक एयरलिफ्ट करने योग्य बनाता है जिससे कि वे अपने प्रबंधकों को संगठन के लंबे समय तक सोचने में सहायता करती है। जैसे कि कुछ महत्वपूर्ण रणनीतिक योजना वस्तुओं और कदम हैं जिनमें मिशन की दृष्टि से उनके लक्ष्य, बाद में आने वाला महत्वपूर्ण कार्य योजनाएँ को शामिल किया गया है।भारतीय वायु सेना भारतीय सशस्त्र बलों की अन्य शाखाओं के साथ-साथ आपदा राहत कार्यक्रमों में प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को राहत पहुंचाने के लिए खाने की सामग्री भी गिराती है एवं जोखिम लोगों की खोज और उनके बचाव के लिए अभियानों, आपदा क्षेत्रों में सहायता प्रदान करती है। भारतीय वायु सेना राहत ऑपरेशन के रूप में व्यापक सहायता प्रदान करती है उदाहरण के तौर पर इसने 2004 में सुनामी तथा 1998 में गुजरात चक्रवात के दौरान प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए वहाँ के जोखिम लोगों को राहत पैकेज उपलब्ध कराई थी।आजादी के बाद भारत दो भागों ,भारत संघ व डोमिनियन ऑफ पाकिस्तान में बाँट दिया गया। वायु सेना भी दोनों देशों में बाँट दी गई भौगोलिक विभाजन के बाद। भारत की वायु सेना का नाम रॉयल इंडियन एयर फोर्स ही रहा, लेकिन दस में से तीन स्क्वाड्रन और कार्यालय जिसका स्थानांतरण पाकिस्तान में कर दिया गया था वह रॉयल पाकिस्तान एयर फोर्स में शामिल कर लिए गए। रॉयल इंडियन एयर फोर्स का चिन्ह एक अंतरिम ‘चक्र’ अशोक चक्र से यह चिन्ह की उत्पत्ति हुई।
भारतीय वायु सेना ने बदलाव और अपनी क्षमताओं में सुधार करने के लिए 1965 के युद्ध के बाद एक श्रृंखला की शुरुआत की।अपनी रसद आपूर्ति और बचाव कार्य करने की क्षमता में वृद्धि करने के लिए वायु सेना ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स द्वारा एव्रो से प्राप्त लाइसेंस के तहत बनाए गए 72 एचएस 748 विमान शामिल किए गए। भारत ने लड़ाकू विमानों के स्वदेशी निर्माण पर अधिक बल दिया, जिसके कारण प्रसिद्ध जर्मन एयरोस्पेस इंजीनियर कर्ट टैन्क द्वारा डिजाइन किए गए हाल ही में एचएफ-24 मारुति विमान भारतीय वायुसेना का अंग बन गया इसके साथ ही वर्तमान में ( हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) ने भी फोलंड ग्नात विमानों के एक जिसमें उन्नति करने योग्य संस्करण है हाल – अजीत को विकसित करने की शुरुआत कर दी। इसके अलावा भारत ने मार्क-2 (जो कि ध्वनि के रफ्तार से भी दोगुना है) की रफ्तार से उड़ने वाले रूसी मिग-21 और सुखोई सू-7 जैसे लड़ाकू विमान शामिल किए गए थे।

जानिए दिल्ली के बारे में
दिल्ली भारत सरकार और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के केंद्र रूप में कार्य करती है।यह महानगर के अंदर स्थित है और यह दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र के ग्यारह जिलों में से एक है। भारत पर अंग्रेज शासन काल के वक्त सन 1911 तक भारत की राजधानी कोलकत्ता (अब कोलकाता) था। अंग्रेज शासकों ने यह महसूस किया कि देश का शासन बेहतर तरीके से चलाने के लिए कोलकाता की जगह यदि दिल्ली को राजधानी बनाया जाए तो बेहतर होगा । क्योंकि इसके राजधानी बनाने से संचालन अधिक व्यवस्थित तरीके से होगा, इसी विषय पर विचार विमर्श करने के बाद अंग्रेज महाराजा जॉर्ज पंचम ने देश की राजधानी को दिल्ली ले जाने के लिए आदेश दिया। दिल्ली महानगर की जनसंख्या वर्ष 2011 तक 22 लाख थी। जनसंख्या के मामले में इस दुनिया में पांचवीं सबसे अधिक आबादी वाला, और भारत का सबसे बड़ा महानगर बनाती है। दिल्ली दुनिया के बड़े महानगरों में से एक है क्षेत्रफल की दृष्टि से भी।अमीर शहर के मुकाबले इसे मुंबई के बाद दूसरा स्थान दिया गया है , और इसका सकल घरेलू उत्पाद दक्षिण, पश्चिम, और मध्य एशिया के शहरों में दूसरे नंबर पर आता है। यहाँ की चौड़ी सड़कें अनेकों वृक्ष,अच्छे मार्ग और देश के कई उच्च संस्थानों और पर्यटन स्थल के लिए यह प्रसिद्ध है।
दिल्ली दरबार के वक्त वर्ष 1911 में 15 दिसंबर को शहर की नींव भारतीय सम्राट, जॉर्ज पंचम ने रखी, और प्रमुख ब्रिटिश वास्तुकार सर एड्विन लुटयन्स और सर हर्बर्ट बेकर ने इसकी रूपरेखा को तैयार किया। नई दिल्ली का उद्घाटन 13 फरवरी 1931 को ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड इर्विन द्वारा किया गया।दिल्ली प्राचीन भारत और दिल्ली सल्तनत के कई साम्राज्यों के राजनीतिक और वित्तीय केन्द्र के रूप मे रह चुकी थी।विशेष रूप से 1694 से 1857 तक चले मुगल साम्राज्य के शासन के वक्त। सन 1900 की शुरुआत के वक्त, ब्रिटिश प्रशासन को ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की राजधानी पूर्व तट के कोलकाता से, दिल्ली में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव सौंपा गया। उत्तरी भारत के केंद्र में, दिल्ली से भारत का प्रशासन करना अंग्रेजों के लिए आसान होगा यह ब्रिटिश भारत सरकार ने महसूस किया। भूमि अधिग्रहण, भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के अंतर्गत की गई, दिल्ली के नए शहर के निर्माण के लिए।
दिल्ली दरबार के वक्त, कोरोनेशन पार्क, किंग्सवे कैम्प (अब गुरुतेग बहादुर नगर) में वाइसरॉय के निवास के लिए नींव रखते हुए, तत्कालीन भारत के सम्राट, जॉर्ज पंचम तथा उनकी रानी मैरी द्वारा घोषणा की गई कि शासन की राजधानी को कोलकाता से दिल्ली में स्थानांतरित किया जाएगा और यह बात 12 दिसंबर 1911 की है। 15 दिसंबर 1911 को किंगवेज कैम्प में अपनी शाही यात्रा के दौरान, जॉर्ज पंचम और रानी मैरी ने 1911 के दिल्ली दरबार पर नई दिल्ली की नींव रखी। नई दिल्ली के बड़े हिस्सों के निर्माण की योजना एड्विन लुटियंस, जो पहली बार 1912 में दिल्ली आए थे तथा हर्बर्ट बेकर ने की थी, दोनों बीसवीं सदी के ब्रिटिश वास्तुकारों के प्रमुख थे। निर्माण का अनुबंध शोभा सिंह को दिया गया निर्माण का कार्य तुग़लकाबाद मे तुग़लकाबाद के किले शुरू किया जाना था, परंतु यह दिल्ली कोलकाता ट्रक लाइन की वजह से रोक दिया गया। जो कि किले से होकर गुजरती थी। वास्तव में इसके निर्माण का कार्य प्रथम विश्व युद्ध के बाद शुरू हुआ और 1931 में पूरा हुआ। इसके साथ ही शहर का नाम बदलकर “लुटियंस दिल्ली” कर दिया गया, जिसका उद्घाटन 10 फरवरी 1931 को, तत्कालीन भारत के महाराज्यपाल, लॉर्ड इर्विन द्वारा किया गया। एड्विन लुटियंस ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को आधारभूत मानकर शहर के केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्रों का निर्माण किया था। लुटियंस ने दूसरी स्थानों के निर्माण के लिए जल्द ही विचार विमर्श करना शुरू कर दिया। यही वजह है कि दिल्ली को बनाने की योजना में स्थापित दिल्ली टाउन प्लानिंग कमेटी, अध्यक्ष के रूप में जॉर्ज स्विन्टन तथा सदस्यों के रूप में जॉन ए ब्रोडी और एडविन लुटियंस ने उत्तर तथा दक्षिण दोनों जगहों के लिए अपने विचार विर्मश प्रस्तुत किये। लेकिन इसमें अधिक खर्च होने की वजह से वाइसरॉय ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। नई दिल्ली की केंद्रीय धुरी, इंडिया गेट के पूर्व में है, इसे उत्तर दक्षिण धुरी बनाना था, जिसके एक अंत पर राष्ट्रपति भवन तथा दूसरे अंत पर पहाड़गंज से जोड़ने की योजना बनाई गई थी। परियोजना की शुरुआती वर्षों के वक्त, कई पर्यटकों का मानना था यह धरती को स्वर्ग से जोड़ने वाला एक द्वार था।
भारत की राजधानी दिल्ली में स्थानांतरित होने के बाद, वर्ष 1912 में कुछ महीनों के अंदर ही उत्तरी दिल्ली में एक अस्थायी सचिवालय भवन को बनाया गया। नई राजधानी के उद्घाटन के एक दशक पूर्व पुरानी दिल्ली के पुराने सचिवालय से नई राजधानी के अधिकतर सरकारी कार्यालय यहाँ स्थानांतरित कर दिए गए थे। बंगाल प्रेसिडेंसी तथा मद्रास प्रेसिडेंसी के साथ भारत के सुदूर हिस्सों से, कई कर्मचारियों को नई राजधानी मे लाया गया था। इसके साथ ही 1920 के दशक में, गोल मार्केट में उनके रहने के लिए घरों को बनाया गया था। 1940 के दशक में, उच्च स्तरीय सरकारी अधिकारियों के लिए बंगलो का निर्माण लोधी एस्टेट के समीप किया गया। लोधी गार्डन के समीप लोधी कॉलोनी, ब्रिटिश शासन द्वारा बनाया गया अंतिम आवासीय क्षेत्र था।
यह भारत की राजधानी और एक केंद्र शासित प्रदेश है इसमें नई दिल्ली को भी शामिल किया गया जो भारत की राजधानी है राजधानी होने की वजह से केंद्र सरकार की तीनों इकाइयों कार्यपालिका, संसद और न्यायपालिका के मुख्यालय नई दिल्ली और दिल्ली में स्थापित है। भारत में दिल्ली का ऐतिहासिक महत्व है जनसंख्या के आधार पर भारत का दूसरा सबसे बड़ा महानगर है और यहाँ की जनसंख्या भी काफी अधिक है। हिंदी, पंजाबी, उर्दू ,अंग्रेजी यहाँ के बोले जाने वाली मुख्य भाषाएँ हैं। इसके दक्षिण पश्चिम में अरावली पहाड़ियाँ और पूर्व में यमुना नदी है, जिसके किनारे यह स्थित है। कई वर्षों पूर्व गंगा के मैदान से होकर जाने वाले वाणिज्य पथों के रास्ते में पढ़ने वाला मुख्य पहाड़ था। इसके मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल है।और उपराज्यपाल अनिल बैजल है।
इस नगर का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है। क्योंकि यह यमुना के किनारे स्थित है।यह भारत का बहुत ही पुराना और लोकप्रिय नगर है। “सिंधु घाटी की सभ्यता” से जुड़ी हुई इसकी इतिहास की शुरुआत हुई। इस बात का प्रमाण भी मिला है जो कि हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में हुई खुदाई से पता चलता है ।महाभारत काल में इसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया था। दिल्ली सल्तनत के उत्थान के साथ ही दिल्ली एक प्रमुख राजनैतिक,सांस्कृतिक, एवं वाणिज्यिक शहर के रूप में उभरी। पुरातत्व विभागों का मानना है कि यहाँ प्राचीन और मध्यकालीन के कई इमारतों तथा उनके अवशेषों को देखा जा सकता है। स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद कई अलग-अलग क्षेत्र से लोगों का प्रवासन हुआ है इससे दिल्ली के स्वरूप में आमूल परिवर्तन हुआ। अलग-अलग प्रांतों, धर्मो एवं जातियों के लोगों कि दिल्ली में बसे होने के कारण दिल्ली तो आधुनिक शहर के रूप में विकसित हुआ और यहाँ एक मिश्रित संस्कृति ने भी जन्म लिया।
दिल्ली के बारे में बहुत पूर्व समय पहले “महाभारत”नाम के महापुराण में बताया गया है,प्राचीन इंद्रप्रस्थ के रूप में इसका उल्लेख किया गया है। महाभारत काल में पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ थी कई पुरातत्व विभाग को यह प्रमाण भी मिले हैं उससे पता चलता है कि ईसा से दो हजार वर्ष पहले भी दिल्ली तथा उसके आसपास मानव का निवास स्थान हुआ करता था ।मौर्य काल से यहाँ एक नगर का विकास होने की शुरुआत हुई। महाराज पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंद बरदाई की हिंदी रचना पृथ्वीराज रासो में तोमर राजा अनंगपाल को दिल्ली का संस्थापक बताया गया है। और लोगों का यह मानना है कि उसने ही ‘लाल कोट’ को बनवाया था और महरौली के गुप्तकालीन लौह – स्तंभ को दिल्ली लाया। सबसे पहले उदयपुर में प्राप्त शिलालेखों पर ‘दिल्ली’ या ‘दिल्लीका’ शब्द का प्रयोग पाया गया। दिल्ली का अंतिम हिंदू सम्राट महाराज पृथ्वीराज चौहान को माना जाता है। आज की आधुनिक दिल्ली बनने से पहले ऐसा माना गया है कि दिल्ली सात बार उजड़ी और कई स्थानों पर बसी जिनके कुछ अवशेष आधुनिक दिल्ली में अभी देखने को मिलती है। कुछ तत्कालीन शासकों ने दिल्ली के स्वरूप में कई बार परिवर्तन लाया। मुगल बादशाह हुमायूँ ने सरहिंद के समीप युद्ध में अफ़गानों को हराया और बिना कोई विरोध किये दिल्ली पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ की मृत्यु के बाद हेमू विक्रमादित्य के नेतृत्व में अफगानों ने मुगल सेना को हराकर आगरा और दिल्ली पर फिर से अधिकार कर दिया ।मुगल बादशाह अकबर ने अपनी राजधानी को दिल्ली से आगरा स्थानांतरित कर दिया। प्राचीन काल से ही पुरानी दिल्ली पर अनेक राजाओं एवं सम्राटों ने राज्य किया समय-समय पर इसके नाम में भी परिवर्तन किया जाता रहा है। दिल्ली की आखरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर था जिसकी मृत्यु निवार्सन में ही रंगून में हुई। दिल्ली में कई राजाओं के साम्राज्य के उदय और पतन के साक्ष्य आज भी मौजूद है।
दिल्ली हमारे देश के भविष्य,भूतकाल और वर्तमान परिस्थितियों को बतलाता है। तोमर शासकों में दिल्ली की स्थापना का श्रेय अनंगपाल को जाता है।
शाहजहाँ काल में दिल्ली – अकबर के बेटे शाहजहाँ दिल्ली और जमुना किनारे शाहजहानाबाद की नींव बनाई। उसने अपना तख्त-ए- ताऊस बनवाया जिसमें करीब 46 लाख रुपए खर्च किए गए और इसके साथ ही जामा मस्जिद बनवाई। वहाँ चांदनी चौक और मीना बाजार बसा। दिल्ली के बारे में यह बताया गया है कि 1662 मे दिल्ली में हुए भीषण अग्निकांड में करीब साठ हजार और 1716 में भारी वर्षा के कारण मकान ध्वस्त होने से लगभग तेईस हजार लोगों की जानें गई इसके वजह से दिल्ली लगभग उजड़ चुकी थी।
नादिरशाह ने उजाड़ी दिल्ली – दिल्ली को ध्वस्त करने के पीछे नादिरशाह का हाथ है तैमूर लंग की दौर की तरह 1739 में दिल्ली में एक बार फिर हुआ कई लोगों का कत्ल। मुगल शासक मोहम्मद शाह के वक्त ईरान से आए नादिर शाह ने मचाई मारकाट मे दिल्ली के तीस हजार लोगों की जानें गई ।कहा जाता है कि वे जाते वक्त लूट के माल के साथ तख्त -ए- ताऊस भी अपने साथ ले गए।
दिल्ली पृथ्वीराज चौहान की राजधानी थी,जिसका नाम पिथौरागढ़ था, इन्हीं के दरबारी कवि चंद बरदाई ने अपने साहित्य “पृथ्वीराज रासो” में तोमर राजा “अनंगपाल” को दिल्ली का संस्थापक कहा है। दिल्ली पर 900 से 1200 ईसवी तक तोमरो का शासन था।
1947 को भारत की स्वतंत्रता के बाद इसे भारत की राजधानी घोषित किया गया था। यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह शहर क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे विशाल महानगर है,जो लगभग 1484 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।
एनसीआर में दिल्ली से सटे सूबे उत्तर प्रदेश,हरियाणा और राजस्थान के कई शहर को शामिल किया गया है। एनसीआर में चार करोड़ 70 से ज्यादा आबादी रहती है। पूरे एनसीआर में दिल्ली का क्षेत्रफल 1,484 स्क्वेयर किलोमीटर है। देश की राजधानी एनसीआर का 2.9 फ़ीसदी भाग कवर करती है। एनसीआर के तहत आने वाले क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के मेरठ,गाजियाबाद,गौतम बुद्ध नगर(नोएडा),बुलंदशहर,शामली,बागपत,हापुड़और मुजफ्फरनगर ,और हरियाणा के फरीदाबाद,गुड़गांव ,मेवात,रोहतक ,सोनीपत, रेवाड़ी,झज्जर,पानीपत,पलवल,महेंद्रगढ़,भिवाड़ीजिंद और करनाल जैसे जिलों को शामिल किया गया है।राजस्थान से दो जिले भरतपुर और अलवर एनसीआर में शामिल किया गया है।
दिल्ली एक बहुत ही विस्तृत क्षेत्र है। यह अपने चरम पर उत्तर में सरूप नगर से दक्षिण में रजोकरी तक फैला है। पश्चिमतम छोर नजफगढ़ से पहले में यमुना नदी तक ( तुलनात्मक परंपरागत पूर्वी छोर) वैसे शाहदरा,भजनपुरा, आदि इसके पूर्वतम छोर होने के साथ ही बड़े बाजारों में भी आते हैं। दिल्ली की भू- प्राकृति बहुत बदलती हुई है। यह उत्तर में समतल कृषि मैदानों से लेकर दक्षिण में शुष्क अरावली पर्वत के आरंभ तक बदलती हैं। दिल्ली के दक्षिण में बड़ी प्राकृतिक झीलें हुआ करती थी जो अब अधिक खुदाई के वजह से सूखती चली गई है।इनमें से एक है बड़खल झील। यमुना नदी शहर के पूर्वी क्षेत्रों को अलग करती है ये क्षेत्र यमुनापार कहलाते हैं, और यह नई दिल्ली से बहुत से पुलों द्वारा भली-भांति जुड़े हुए हैं। दिल्ली मेट्रो भी अभी दो पुलों द्वारा नदी को पार करती है। यह उत्तर ,पश्चिम और दक्षिण तीन तरफ से हरियाणा राज्य तथा पूर्व में उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा गिरा हुआ है। दिल्ली लगभग पूर्ण रूप से गांगेय क्षेत्र में स्थित है। यह दक्षिण में अरावली पर्वत माला से आरंभ होकर शहर के पश्चिमी,उत्तर पश्चिमी एवं उत्तर पूर्वी क्षेत्र तक फैला हुआ है। यमुना हिंदू धर्म में बहुत पवित्र नदियों में से एक है। एक दूसरी छोटी नदी हिंडन नदी पूर्वी दिल्ली को गाजियाबाद से अलग करती है।


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